लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
१३८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां ध्मानीय सदा क्रमशः कवर्ग पवर्ग के ही आश्रित रहते हैं। कुश्च पुश्च=कुपू तयो = कुप्वोः, इतरेतरद्वन्द्व । अर्थ—(कुप्वोः) कवर्ग पवर्ग परे होने पर (विसर्जनीयस्य) विसर्ग के स्थान पर क्रमशः (≍क≍पो) जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय हो जाते हैं। (च) किञ्च पक्ष में विसर्ग भी बना रहता है¹। सम्पूर्ण कवर्ग पवर्ग में विसर्ग प्राप्त नहीं हो सकते । विसर्ग केवल क्, ख्, प्, फ् इन चार वर्णों के परे होने पर ही मिल सकते हैं। क्योंकि विसर्ग विधान करने वाला खरवसानयो ० (६३) यही एक सूत्र है। यह सूत्र खर् परे होने पर ही विसर्ग आदेश करता है। खर् प्रत्याहार में कवर्ग पवर्ग का इन चार वर्णों के सिवाय अन्य कोई वर्ण नहीं आता, अतः यह सूत्र 'क्, ख्, प्, फ्' परे होने पर ही विसर्गों को जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय करता है । 'नूॅ + पाहि, नृ + पाहि' यहां पकार परे होने से विसर्गों को उपध्मानीय हो कर—नूॅ≍पाहि, नृ≍पाहि । विसर्गपक्ष में— नूॅ पाहि, नृ पाहि । जहां नॄन्पे (६७) सूत्र से रुँ आदेश नहीं होता उस पक्ष में—नॄन्पाहि । इस प्रकार कुल मिला कर पञ्च रूप सिद्ध होते हैं। एवम्—'नूॅ≍पश्य' इत्यादि । नोट—विसर्ग, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय आदि का पाठ अट् तथा शल् प्रत्या- हार में स्वीकार किया जाता है । अतः इन के यर्प्रत्याहारान्तर्गत होने के कारण अनचि च (१८) सूत्र से इन को वैकल्पिक द्वित्व भी हो जाता है। इस से— नूॅ≍ ≍पाहि, नूॅ पाहि' इत्यादि प्रकारेण द्वित्व वाले रूप भी बना करते हैं । विशेष—शर्परे विसर्जनीय (८ ३ ३५)—शर् परे वाला खर् परे हो तो विसर्जनीय का विसर्जनीय ही रहता है अन्य कोई परिवर्तन नहीं होता । इस बाधकसूत्र के कारण—'अतः क्षन्तव्य, वासः क्षौमम्, नापित क्षुरमाधत्स्व' इत्यादि में प्रकृतसूत्र से जिह्वामूलीय नहीं होता । इसीप्रकार—'वालेः प्सात्मोदनम्' आदि में उपध्मानीय तथा 'विलशणः त्सरु' आदि में विसर्जनीयस्य स (६६) द्वारा प्राप्त सकार आदेश का भी बाध हो जाता है । [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(६६) तस्य परमाम्रेडितम् ।८।१।२॥ द्विरुक्तस्य परम् आम्रेडित स्यात् ॥ अर्थ —दो बार कहे गये का परला रूप 'आम्रेडित' सञ्ज्ञक हो ! व्याख्या—तस्य ।६।१। परम् ।१।१। आम्रेडितम् ।१।१। इस सूत्र से पूर्व सर्वस्य द्वे इस प्रकार द्वित्व का अधिकार किया गया है, अतः यहां 'तस्य' पद से 'द्विरुक्तस्य' का ग्रहण हो जाता है। अर्थ —(तस्य) उस दो बार पढ़े गये का (परम्) परला रूप (आम्रेडितम्) आम्रेडित सञ्ज्ञक होता है । यथा 'किम्' शब्द के द्वितीयाविभक्ति के १ चकार-ग्रहण से शर्परे विसर्जनीय (८ ३ ३५) सूत्र से 'विसर्जनीय' पद की अनु- वृत्ति आ जाती है। इस से पक्ष में विसर्जनीय भी रहता है। यदि सूत्र में 'च' न कह कर 'वा' कहते तो पक्ष में (६६) सूत्र से स् हो कर अनिष्ट हो जाता ।
हल्-सन्धि-प्रकरणम् १३६ बहुवचन 'कान्' पद को नित्यवीप्सयोः (८.१.४) सूत्र से द्वित्व किया तो 'कान् कान्' बना। यहां दूसरा 'कान्' शब्द आम्रेडित-सञ्ज्ञक है। अब आम्रेडित-सञ्ज्ञा का इस रुँ-प्रकरण में उपयोग दर्शाते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१००) कानाम्रेडिते ।८।३।१२॥ कान्नकारस्य रुँः स्यादाने्रडिते । काँस्कान्, कांस्कान् ॥ अर्थः—आम्रेडित परे होने पर कान् शब्द के नकार को रुँ आदेश हो। व्याख्या—कान् ।६।१। (यहां 'किम्' शब्द के द्वितीया के बहुवचन 'कान्' शब्द का अनुकरण किया गया है। इस से परे षष्ठी के एकवचन का लुक् हुआ है)। आम्रे- डिते ।७।१। रुँः ।१।१। (मतुवसो रुँ० से) । अर्थः—(आम्रेडिते) आम्रेडित परे होने पर (कान्) कान् शब्द के स्थान पर रुँ आदेश हो। अलोऽन्त्यस्य (२१) परिभाषा से कान् के अन्त्य अल् नकार को ही रुँ आदेश होगा। उदाहरण यथा— 'कान्+कान्' यहां दूसरा कान् शब्द आम्रेडित परे है; अतः प्रथम कान् शब्द के नकार को रुँ आदेश हो कर पूर्ववत् अनुनासिकादेश, अनुस्वारागम, रेफ को विसर्ग तथा जिह्वामूलीय का बाध कर सम्पुङ्कानां सो वक्तव्यः (वा० १५) से विसर्ग को सकार आदेश करने पर 'काँस्कान्, कांस्कान्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। नोट—ध्यान रहे कि 'ताँस्तान्' मे नश्छव्यप्रशान् (६५) प्रवृत्त होता है।
- अभ्यास (२२) (१) रुँप्रकरणोक्त अनुस्वार और अनुनासिक में कौन आदेश और कौन आगम है ? (२) 'पुमाँश्छली' में पुमः खय्यम्परे से (?) रुँत्व कर कैसे सिद्धि करेंगे ? (३) सम्पुङ्कानां सो वक्तव्यः वार्त्तिक का सोदाहरण विवेचन करें। (४) सूत्र- समन्वय-पूर्वक निम्नलिखित प्रयोगों में सन्धिच्छेद करें— १. विद्वांश्च्यवनः । २. नूँ ᳶ पाठयति । ३. पुंस्खञ्जः । ४. कस्मिंश्चित् । ५. पुंश्छिद्राणि । ६. पुंस्प्रवृत्तिः । ७. सँस्कृतम् । ८. महांस्तुन्दिलः । ९. पुंस्पुत्रः । १०. पुंष्टिट्टिभः । ११. सूर्य ᳵ खेचर-चक्रवर्त्ती । १२. भवांश्छिनत्ति । १३. पुंस्क्रोधः । १४. नूँ ᳶ पालयस्व । १५. संस्करोति । १६. काँस्कान् । १७. पुंश्चली । १८. भास्वांश्चरति । १६. पुंस्त्वम् । २०. बुद्धिमाँश्छागः । (५) सूत्र-समन्वय करते हुए अधोलिखित प्रयोगों में सन्धि करें— १. पुम् + प्लीहा । २. पुम् + चर्चा । ३. सम् + कारः । ४. रूपवान् + ठक्कुरः । १ ५. पुम् + फेरु । ६. नॄन् + पिपर्त्ति । ७. महान् + तिरस्कारः । ८. कान् + कान् । ६. तान् + तान् । १०. पुम् + चरित्र । ११. रामः + १. पूर्वोक्त रुँत्वविधि (८.३.७) की दृष्टि में श्चुत्व-ष्टुत्वविधि (८.४.३६-४०) त्रिपादी में पर होने से असिद्ध है।
. १४० | भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
प्रजा + पालयामास । १२ तस्मिन् + च । १३ बाल + थूत्करोति । १४ पुम् + चेष्टा । १५ चञ्चुमान् + टिट्टिभ । १६ प्रशान् + चरति । १७ नॄन् + प्रति । १८ पुम् + टिप्पणी । १९ पुम् + तर । २० य + क्षत्रिय । (६) 'हन्ति' में नश्छव्यप्रशान् सूत्र से तथा 'पुंदारा' में पुमः खय्यम्परे सूत्र से रुँत्व क्यों नहीं होता ? (७) सूत्रों की सोदाहरण व्याख्या करें— अनुनासिकात्परो०, नश्छव्यप्रशान्, पुमः खय्यम्०, कुप्वो ≍क ≍पौ च । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१०१) छे च ।६।१।७३॥ ह्रस्वस्य छे तुक् । शिवच्छाया ॥ अर्थ—छकार परे होने पर ह्रस्व को अवयव तुँक् हो जाता है। व्याख्या—ह्रस्वस्य ।६।१। तुँक् ।१।१। (ह्रस्वस्य पिति कृति तुँक् से) । छे ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । संहितायाम् ।६।१। (यह अधिकृत है)। अर्थ—(संहितायाम्) संहिता के विषय में (ह्रस्वस्य) ह्रस्व का अवयव (तुँक्) तुँक् हो जाता है (छे) छकार परे हो तो। तुँक् कित् है अतः आद्यन्तौ टकितौ (८५) के अनुसार वह ह्रस्व का अन्तावयव होता है। उदाहरण यथा— शिव+छाया' (शिव की छाया । शिवस्य छायेति विग्रह, षष्ठी-तत्पुरुष- समास ) यहां वकारोत्तर ह्रस्व अवर्ण से छकार परे है और समास होने से संहिता का विषय भी है, अतः आद्यन्तौ टकितौ (८५) के अनुसार वकारोत्तर अकार का अन्तावयव तुँक् हो कर उँक् के चले जाने पर—शिवत् + छाया । अब स्तोः श्चुना श्चुः (८ ४ ३६) के असिद्ध होने से झलां जशोऽन्ते (८ २ ३६) द्वारा तकार को दकार हो— शिवद् + छाया । पुनः स्तोः श्चुना श्चुः (८ ४ ३६) के प्रति शर्परे च (८ ४ ५४) के असिद्ध होने से प्रथम श्चुत्व अर्थात् दकार को जकार पश्चात् चर्त्व अर्थात् जकार को चकार किया तो—शिवच्छाया । अब 'सुँ' विभक्ति ला कर हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) से उस का लोप हो—'शिवच्छाया' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि यहां ष्टोः ष्टुः (३०६) द्वारा षवर्ग आदेश नहीं होगा, क्योंकि जश्त्व, श्चुत्व और चर्त्व तीनों उसकी दृष्टि में असिद्ध हैं। उसे तो 'त्' ही दीखता है। इस सूत्र के अन्य उदाहरण अभ्यास में देखें। [लघु०] विधि सूत्रम्—(१०२) पदान्ताद्वा ।६।१।७४॥ दीर्घात् पदान्ताच्छे तुंग्वा । लक्ष्मीच्छाया, लक्ष्मीछाया ॥ अर्थ—पदान्त दीर्घ से छकार परे हो तो विकल्प से तुँक् का आगम हो। व्याख्या—दीर्घात् ।५।१। (दीर्घात् सूत्र से) । पदान्तात् ।५।१। छे ।७।१। (छे च सूत्र से) । तुँक् ।१।१। (ह्रस्वस्य पिति कृति तुँक् से)। वा इत्यव्ययपदम्। अर्थ— (दीर्घात्) दीर्घ (पदान्तात्) पदान्त से (छे) छकार परे होने पर (वा) विकल्प कर
हल्-सन्धि-प्रकरणम् १४१ के (तुँक्) तुँक् का आगम होता है। तुँक् किस का अवयव हो ? पदान्त दीर्घ का हो या छकार का ? यह यहां प्रश्न है। उभयनिर्देशे पञ्चमीनिर्देशो बलीयान् के अनुसार तो छकार का अवयव होना चाहिये। पर ऐसा नहीं होना; यह दीर्घ का ही अवयव होता है। इस का कारण यह है कि यदि यह छकार का अवयव होना तो कित् होने से छकार के अन्त में होना चाहिये था, परन्तु विभाषा सेना-सुराच्छाया-शाला-निशा- नाम् (२.४.२५) सूत्र में तो छकार के आदि अर्थात् दीर्घ से परे देखा जाता है अतः यह दीर्घ का ही अन्तावयव है यह सुतरां सिद्ध होता है। उदाहरण यथा— 'लक्ष्मी + छाया' (लक्ष्मी की छाया। लक्ष्म्याश्छायेति विग्रहः, षष्ठी-तत्पुरुषः) यहां समास में पदान्त दीर्घ ईकार से छकार परे विद्यमान है अतः दीर्घ ईकार को विकल्प कर के तुँक् का आगम हो कर पूर्ववत् उँक् के चले जाने पर जश्त्व = दकार, श्चुत्व = जकार तथा चर्त्व = चकार हो कर विभक्ति लाने से—'लक्ष्मीच्छाया, लक्ष्मी- छाया' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। स्मरण रहे कि पहला सूत्र पदान्त अपदान्त कुछ नहीं कहता था इस लिये वह दोनों में प्रवृत्त होता था। परन्तु यह सूत्र पदान्त में ही प्रवृत्त होता है; वह भी तब जब पदान्त दीर्घ होगा। पदान्त—समस्त, व्यस्त दोनों अवस्थाओं में हो सकता है। ग्रन्थकार ने समस्तावस्था (समास अवस्था) का उदाहरण दिया है। व्यस्तावस्था (समासरहित अवस्था) के उदाहरण—'कुलटाच्छिन्ननासिका' आदि अभ्यास में देखें। नोट—यदि आङ् और माङ् अव्ययों से परे छकार होगा तो दीर्घ पदान्त होते हुए भी तुँक् का आगम नित्य होगा; तब पदान्ताद्वा (१०२) सूत्र प्रवृत्त नहीं होगा। इस के लिये नित्य तुँक् विधानार्थ आङ्माङोश्च (६.१.७२) यह नया सूत्र बनाया गया है। यथा—आच्छादयति, माच्छैत्सीः। इसे सिद्धान्त-कौमुदी में देखें। सूचना—'मूर्च्छना, मूर्च्छा' आदि में तुँक् नहीं समझना चाहिये, किन्तु अचो रहाभ्यां द्वे (६०) से वैकल्पिक द्वित्व हो कर खरि च (७४) से चर्त्व हुआ है। किञ्च 'वाञ्छति' आदि में चकार जोड़ना अशुद्ध है, क्योंकि तुँक् प्राप्त नहीं। [लघु०] इति हल्सन्धि-प्रकरणम् ॥ अर्थः—यहां हलों की सन्धि का प्रकरण समाप्त होता है। व्याख्या—सन्धि एक प्रकार का वर्णविकार ही है। यदि वह विकार अच् के स्थान पर हो तो 'अच्सन्धि', हल् के स्थान पर हो तो 'हल्सन्धि' कहाता है। इसी प्रकार विसर्ग-सन्धि के विषय में भी जान लेना चाहिये। लोक में प्रायः यह प्रचलित है और हम भी लोकवाद का अनुसरण करते हुए पीछे यही लिख आये हैं कि अच् का अच् के साथ मेल = विकृति 'अच्सन्धि' और हल् का हल् के साथ मेल 'हल्सन्धि' कहाता है। पर ध्यान देने से यह ठीक प्रतीत नहीं होता। क्योंकि ऐसा मानने से वान्तो यि प्रत्यये (२४) आदि अच्सन्धि के सूत्रों तथा ङमो ह्रस्वादचि ङमुँन्नित्यम् (८६) आदि हल्सन्धि के सूत्रों में व्यवस्था न बन सकेगी। अतः यही उचित प्रतीत
१४२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् होता है कि जहां अच् के स्थान पर सन्धि अर्थात् संयोगजन्य वर्णविकार करें चाहे उस का निमित्त अच् या हल् जो भी हो वहां 'अच्सन्धि' और जहां हल् के स्थान पर सन्धि अर्थात् संयोगजन्य वर्णविकार करें चाहे उस का निमित्त अच् या हल् जो भी हो वहां 'हल्सन्धि' होती है । [ अचा स्थाने सन्धि = अच्सन्धि , हला स्थाने सन्धि = हल्सन्धि ] । अच्सन्धि में झलां जश् झशि (१६) आदि सूत्र प्रसङ्ग वश लिये गये हैं । इसी प्रकार हल्सन्धि म विसर्जनीयस्य स (६६), कुप्वो ᳵकᳵपौ च (६८) प्रभृति विसर्गसन्धि के सूत्र तथा कुछ अन्य भी प्रसङ्ग वश लिये गये समझने चाहियें । अभ्यास (२३) (१) निम्नलिखित प्रयोगों में सूत्रसमन्वय करते हुए सन्धिविच्छेद करें— १ इच्छति । २ द्यूतच्छलेन । ३ कुटीच्छन्ना । ४ दन्तच्छद । ५ असिच्छिन्न । ६ मङ्गलच्छाय । ७ रथाच्छिन्नवा । ८ स्वच्छातप । ६ वैदिकच्छन्दांसि । १० नवच्छिद्राणि । ११ गच्छति । १२ नूतनच्छात्र । १३ चिच्छेद । १४ गूढाच्छेद्योक्ति । १५ माच्छिद । १६ तीक्ष्णाच्छुरिका । १७ स्वच्छन्द । १८ यज्ञच्छाग । १६ गुच्छच्छेद । २० कुलटाच्छिन्ननासिका । (२) निम्नस्थ रूपों में सूत्रसमन्वयपूर्वक सन्धि करें— १ आ+छिद्यते । २ कुमारी+छेत्स्यति । ३. पद+छेद । ४ भूपति +छाया । ५ बाले+छिद्यते । ६ मधु+छन्दस् । ७ वनानि+ छित्त्वा । ८ मा स्म+छिद् । ६ भूधव+छेद । १० शीतला+ छाया । ११ य+छति । १२ इ+छा । १३ सन्ति+छिद्राणि । १४ मा+छित्था । १५ नो+छेद । १६ वि+छेद । (३) गच्छति, इच्छति—आदि में तुँक् करने पर जश्त्व, चत्त्वं होंगे या नहीं ? (४) पदान्ताद्वा द्वारा विहित तुँक् किस का अवयव है ? स्पष्ट करें । (५) क्या 'महाविद्यालयछात्र ' प्रयोग शुद्ध है ? (६) 'उच्छेद' में तुँक् (?) किस सूत्र से होगा ? (७) यदि 'मूर्च्छा' शुद्ध है तो 'वाञ्छति' क्यों नहीं ? सहेतुक लिखें । (८) अच्सन्धि-हल्सन्धि शब्दों का विवेचन कर 'सन्धि' पर टिप्पण लिखें । इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु- सिद्धान्तकौमुद्यां हल्सन्धि- प्रकरणं समाप्तम् ॥
अथ विसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् अब विसर्ग-सन्धि का प्रकरण आरम्भ किया जाता है। इस प्रकरण के नाम- करण पर सन्धि-प्रकरण के अन्त में प्रकाश डाला गया है वहीं देखें। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१०३) विसर्जनीयस्य सः ।८।३।३४॥ खरि विसर्जनीयस्य सः स्यात् । विष्णुस्त्राता ॥ अर्थः—खर् परे होने पर विसर्जनीय के स्थान पर सकार आदेश हो । व्याख्या—खरि ।७।१। (खरवसानयोर्विसर्जनीयः से 'खरि' अंश)। विसर्जनी- यस्य ।६।१। सः ।१।१। सकारादकार उच्चारणार्थः । अर्थः—(खरि) खर् परे होने पर (विसर्जनीयस्य) विसर्जनीय के स्थान पर (सः) स् आदेश हो जाता है । उदाहरण यथा—विष्णुः+त्राता = विष्णुस्त्राता (भगवान् विष्णु रक्षक है) । यहां तकार खर् परे होने से विसर्ग को स् हुआ है। यह सूत्र हल्सन्धि में प्रसङ्गतः आया था; वस्तुतः यह विसर्ग-सन्धि का ही है। ध्यान रहे कि पदान्त 'स्' को रुँ हो कर विसर्ग बनते हैं और विसर्ग को खर् परे होने पर पुनः 'स्' हो जाता है; यह सब ससजुषो रुँः (१०५) सूत्र पर स्पष्ट करेंगे । शङ्का—'विष्णुस्त्राता' यहां विसर्ग को सकार आदेश कर देने पर ससजुषो रुँः (१०५) से पुनः 'रुँ' आदेश क्यों नहीं हो जाता ? समाधान—ससजुषो रुँः (८.२.६६) के प्रति विसर्जनीयस्य सः (८.३.३४) सूत्र असिद्ध है; अतः पुनः 'रुँ' आदेश नहीं होता । टिप्पणी—विसर्जनीय और विसर्ग पर्याय हैं। पर्यायशब्दों में गौरव-लाघव का विचार नहीं किया जाता । अतः विसर्गस्य सः न कह कर आचार्य के विसर्जनीयस्य सः कहने में भी किसी प्रकार के गौरव की आशङ्का नहीं करनी चाहिये । कहा भी है— पर्यायशब्दानां लाघवगौरवचर्चा नाऽऽद्रियते (परिभाषा) । इसी प्रकार आचार्य द्वारा अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः (६१७) आदि सूत्रों में 'आदि' की जगह 'प्रभृति' शब्द के प्रयोग में तथा 'वा' के स्थान पर 'अन्यतरस्याम्' आदि शब्दों के प्रयोग में भी जानना चाहिये । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१०४) वा शरि ।८।३।३६॥ शरि विसर्गस्य विसर्गो वा स्यात् । हरिः शेते, हरिशेते ॥ अर्थः—शर् परे होने पर विसर्ग के स्थान पर विकल्प से विसर्ग हो । व्याख्या—शरि ।७।१। विसर्जनीयस्य ।६।१। (विसर्जनीयस्य सः से)। विसर्ज- नीयः ।१।१। (शर्परे विसर्जनीयः से)। वा इत्यव्ययपदम् । अर्थः—(शरि) शर् परे होने पर (विसर्जनीयस्य) विसर्ग के स्थान पर (वा) विकल्प से (विसर्जनीयः) विसर्ग आदेश होता है । शर् प्रत्याहार, खर् प्रत्याहार के अन्दर आ जाता है; अतः विसर्जनीयस्य सः
(१०३) के नित्य प्राप्त होने पर यह उस का अपवाद आरम्भ किया जाता है। शर् परे होने पर विसर्ग—विसर्गरूप से विकल्प से अवस्थित रहता है और पक्ष में पूर्व सूत्र से विसर्ग को स् भी हो जाता है। उदाहरण यथा— हरि + शेते (विष्णु अथवा शेर सोता है)। यहां शर्=शकार परे है अतः प्रकृतसूत्र से विसर्ग को विसर्ग होकर—हरिः शेते। पक्ष में विसर्जनीयस्य स (१०३) सूत्र से विसर्ग को सकार होकर स्तोः श्चुना श्चु (६२) से शकार के योग में उसे शकार हो जाता है—हरिश्शेते। इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं। इसी तरह—सर्पः सरति, सर्पस्सरति। रामः षष्ठः, रामष्षष्ठः [ष्टुना ष्टुः (६४)]। इत्यादि। खर् प्रत्याहार में 'क्, ख्, च्, छ्, ट्, ठ्, त्, थ्, प्, फ्, श्, ष्, स्' इतने वर्ण आते हैं। इन में 'श्, ष्, स्' परे होने पर वा शरि (१०४) तथा 'क्, ख्, प्, फ्' परे होने पर कुप्वोः ᳵक ᳶपौ च (६८) प्रवृत्त हो जाता है। शेष बचे 'च्, छ्, ट्, ठ्, त्, थ्' वर्णों के परे होने पर ही विसर्जनीयस्य स (१०३) सूत्र प्रवृत्त होता है। विसर्ज- नीयस्य स (१०३) से स् होने पर भी केवल 'त्, थ्' परे होने पर ही वह अविकृत= विकाररहित=वैसे का वैसा रहता है, क्योंकि 'च्, छ्' में उसे स्तोः श्चुना श्चुः (६२) से 'श्' और 'ट्, ठ्' में उसे ष्टुना ष्टुः (६४) से 'ष्' हो जाता है। ग्रन्थकार ने 'विष्णु- स्त्राता' यह उदाहरण 'त्' का दिया है। संस्कृत साहित्य में प्रायः थकारादि शब्द के न मिलने के कारण उन्होंने थकार परे का उदाहरण नहीं दिया। थकार परे के 'बाल- स्थूत्करोति' आदि उदाहरण हैं। इन सब की विवरण-तालिका निम्नलिखित प्रकार से जाननी चाहिये— ख् नर ᳵखादति, नरः खादति । कुप्वोः ᳵक ᳶपौ च (६८) । फ् वृक्ष ᳶफलति, वृक्षः फलति । कुप्वोः ᳵक ᳶपौ च (६८) । छ् वृक्षश्छादयति । विसर्जनीयस्य सः, स्तोः श्चुना श्चुः (६२)। ठ् देवष्ठक्कुरः । विसर्जनीयस्य स, ष्टुना ष्टुः (६४)। थ् बालस्थूत्करोति । विसर्जनीयस्य स (१०३) । च् पुष्पश्चिनोति । विसर्जनीयस्य स, स्तोः श्चुना श्चुः । ट् युष्ट्टीकते । विसर्जनीयस्य सः, ष्टुना ष्टुः (६४)। त् रामस्त्राता । विसर्जनीयस्य स (१०३)। क् बाल ᳵकरोति, बालः करोति । कुप्वोः ᳵक ᳶपौ च (६८)। प् नृप ᳶपाति, नृपः पाति । कुप्वोः ᳵक ᳶपौ च (६८)। श् पुरुषः शेते, पुरुषश्शेते । वा शरि, विसर्जनीयस्य स, स्तोः श्चुना ० । ष् नृपः षष्ठः, नृपष्षष्ठः । वा शरि, विसर्जनीयस्य स, ष्टुना ष्टुः । स् सर्पः सरति, सर्पस्सरति । वा शरि, विसर्जनीयस्य स (१०३) । नोट—कुप्वोः ᳵक ᳶपौ च (६८) सूत्र भी विसर्ग-सन्धि के प्रकरण का है, सन्धि में प्रमादवश लिखा गया था।
विसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् १४५ [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१०५) स-सजुषो रुँः ।८।२।६६॥ पदान्तस्य सस्य सजुषश्च रुँः स्यात् ॥ अर्थः—पदान्त सकार तथा सजुष्शब्द के षकार के स्थान पर रुँ आदेश हो । व्याख्या—ससजुपोः ।६।२। (सूत्र में रो रि द्वारा रेफ का लोप हुआ है)। रुँः ।१।१। पदस्य ।६।१। (यह पीछे से अधिकृत है) । समासः—सश्च सजूष्च = ससजुपौ, (सकारादकार उच्चारणार्थः), तयोः = ससजुपोः । इतरेतरद्वन्द्वः । 'पदस्य' इस विशेष्य का 'ससजुपोः' यह विशेषण है अतः इस मे तदन्तविधि हो जाती है । अर्थः —(ससजुपोः) सकारान्त और सजुष्शब्दान्त (पदस्य ) पद के स्थान पर (रुँः) 'रुँ' आदेश हो जाता है । यहां सम्पूर्ण पद के स्थान पर विहित 'रुँ' आदेश अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र से अन्त्य अल् अर्थात् सकारान्त पद के सकार को तथा सजुष्शब्दान्त पद के षकार को होगा ।¹ यह सूत्र विसर्ग की उत्पत्ति में कारण है । पदान्त सकार को जब यह रुँ आदेश कर देता है तो उकार की इत्सञ्ज्ञा हो कर 'र्' शेष रह जाता है । उस रेफ के स्थान पर अवसान में तथा खर् परे होने पर खरवसानयोर्विसर्जनीयः (६३) से विसर्ग आदेश हो जाता है । तदनन्तर विसर्ग के स्थान पर यथायोग्य जिह्वामूलीय आदि आदेश हुआ करते हैं । इन सब का विवरण हम पीछे लिख चुके हैं । अब 'खर्' से भिन्न अक्षर यदि 'र्' से परे हो तो रेफ के स्थान पर क्या २ आदेश होते हैं ? इसे बतलाने के लिये यह प्रकरण आरम्भ किया जाता है । 'रुँ' में उकार अनुनासिक होने से उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) सूत्र द्वारा इत्- सञ्ज्ञक है । उकार के इत् करने का फल आगे कहा जायेगा । 'शिवस् = अर्च्यः' (शिव जी पूजनीय हैं) यहां सुंवन्त होने से 'शिवस्' पद है अतः इस सूत्र से पदान्त सकार को रुँ, पुनः रुँ के उकार की इत्सञ्ज्ञा तथा लोप हो कर 'शिवर् + अर्च्यः' हुआ । अब अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् —(१०६) अतो रोरप्लुतादप्लुते ।६।१।११३॥ अप्लुतादतः परस्य रोरुः स्यादप्लुतेऽति । शिवोऽर्च्यः ॥ अर्थः—अप्लुत अत् से परे रुँ को 'उ' आदेश हो जाता है अप्लुत अत् परे हो तो । व्याख्या—अतः ।५।१। अप्लुतात् ।५।१। रोः ।६।१। उत् ।१।१। (ऋत उत् सूत्र से)। अप्लुते ।७।१। अति ।७।१। (एङः पदान्तादति से)। न प्लुतः—अप्लुतः, तस्मात् = अप्लुतात्, नञ्तत्पुरुषसमासः । अर्थः—(अप्लुतात्) अप्लुत (अतः) अत् से परे (रोः) रुँ के स्थान पर (उत्) उत् हो (अप्लुते) अप्लुत (अति) अत् परे हो तो । यहां अत् उत् में तपर करने से ह्रस्व अकार उकार लिये जाते हैं । १. सजुष् (मित्र) शब्द का उदाहरण—सजूः । सजुष्शब्द से प्रथमैकवचन सकार का हल्ङ्यादिलोप हो षकार को प्रकृतसूत्र से रुँत्व, र्वोरुपधाया दीर्घ इकः (३५१) से उपधादीर्घ तथा रेफ को विसर्ग करने से 'सजूः' सिद्ध होता है । इस शब्द का पूर्ण विवेचन हलन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण में देखें । ल० प्र० (१०)
१४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'शिवर् + अर्च्य' यहां अप्लुत अत् से परे रुँ है और उस से परे 'अर्च्य' का अकार अलुप्त अत् विद्यमान है अत रुँ के स्थान पर 'उ' हो—शिव उ + अर्च्य । पुन आद् गुण (२७) से अ + उ मिल कर 'ओ' गुण हुआ तो—शिवो + अर्च्य । अब एड पदान्तादति (४३) से पूर्वरूप करने पर— 'शिवोऽर्च्य' प्रयोग सिद्ध होता है । यद्यपि ससजुषो रुँ (८ २ ६६) सूत्र के असिद्ध होने से उत्वविधि (६ १.१०६) के प्रति रुत्वविधि असिद्ध होनी चाहिये थी तथापि वचनसामर्थ्य से असिद्ध नहीं होती; क्योकि यदि रुँत्वविधि को असिद्ध मानें तो सारे व्याकरण में रुँ कही नही मिल सकेगा, अत इस व्याकरण म उत्वोपयोगी रुँत्व करने वाला यही एक सूत्र है । ध्यान रहे कि रुँ के स्थान पर उत नही होना, किन्तु उकार की इत् सञ्ज्ञा हो लोप हो जाने पर शेष बचे र् के स्थान पर ही उत् होना है । सूत्र मे रुँ के कथन का यह तात्पर्य है कि रुँ के र् को ही उत्व हो अन्य र् को न हो । यथा—प्रातर् + अत्र = प्रातरत्र, धातर् + अत्र = धातरात्र, लङि—अजागर् + अत्र = अजागरत्र । इत्यादि मे रुँ के रेफ के न होने से उत्व नही होता । यहा 'अप्लुत' ग्रहण का प्रयोजन बालको के लिए अनुपयोगी जान नही लिखते । इस का सिद्धान्त-कौमुदी मे सविस्तर विचार किया गया है वही देखें । इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा— १ बालोऽत्र । २ सोऽपि । ३ पुरुषोऽधुना । ४ मानुषोऽद्य । ५ शुद्धोऽहम् । ६ छात्रोऽयम् । ७ हस्तोऽस्य । ८ रामोऽस्मि । ६ नूतनोऽभ्यागत । १० ग्रामोऽम्यर्ण । ११ राज्ञोऽभिषेक । १२ सोऽपवाद । १३ ततोऽन्यथा । १४ समाचारोऽन्तिम । १५ मोऽनुस्वार । १६ ज्येष्ठोऽनुज । १७ शान्तोऽनल । १८ वचनोऽनुनासिक । १६ सुबोधोऽसि । २० न्यूनोऽसि । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१०७) हशि च ।६।१।११०॥ तथा । शिवो वन्द्य ॥ अर्थ —हश् परे हो तो अप्लुत अत् से परे रुँ के स्थान पर उत् आदेश हो । व्याख्या—अप्लुतात् ।५।१। अत ।५।१। रो ।६।१। (अतो रोरप्लुतादप्लुते से) । उत् ।१।१। (ऋत उत् से) । हशि ।७।१। च इत्यव्ययपदम् । अर्थ —(अप्लुतात्) अप्लुत (अत ) अत् से परे (रो ) रुँ के स्थान पर (उत्) ह्रस्व उकार आदेश होता है (हशि) हश् परे हो तो । उदाहरण यथा— 'शिवस् + वन्द्य' (शिव जी वन्दनीय हैं) यहा ससजुषो रुँ (१०५) सूत्र से सकार को रुँ हो, उकार की इत्सञ्ज्ञा तथा लोप करने से— 'शिवर् + वन्द्य' बना । अब वकार = हश् परे रहते अप्लुत अत् से परे रेफ को उकार आदेश हो— 'शिव उ + वन्द्य' हुआ । पुन आद् गुण' (२७) से गुण एकादेश किया तो 'शिवो वन्द्य' प्रयोग सिद्ध हुआ । इस सूत्र के सम्पूर्ण उदाहरण यथा—
विसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् १४७ ह्—रामो हसति । | झ्—वृक्षो झम्भया पतितः । य्—बालो याति । | भ्—सूर्यो भाति । व्—शिवो वन्द्यः । | घ्—घोरा घोणिनो घोणा । र्—बालो रोति । | ढ्—बालो ढक्कानादं शृणोति । ल्—बुधो लिखति । | ध्—पर्वतो धौतः । व्—बालो वकारं पश्यति । | ज्—अगदो ज्वरघ्नः । म्—मूर्खो मुह्यति । | ब्—को बालः । ङ्—जनो ङादिशब्दं न विन्दति । | ग्—नरो गच्छति । ण्—को णोपदेशो धातुः ? | ड्—काको डिडये । न्—भक्तो नमतीश्वरम् । | द्—नृपो दास्यति । ससजुषो रुँः (१०५) से किया रुँत्व यहां भी वचनसामर्थ्य से असिद्ध नहीं होता । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१०८) भो-भगो-अघो-अ-पूर्वस्य योऽशि ।८।३।१७॥ एतत्पूर्वस्य रोर्यादेशोऽशि । देवा इह, देवायिह । भोस्, भगोस्, अघोस् —इति सान्ता निपाताः । तेषां रोर्यत्वे कृते— अर्थः—अश् प्रत्याहार परे होने पर भो, भगो, अघो तथा अवर्ण पूर्व वाले रुँ के स्थान पर यकार आदेश होता है । व्याख्या—भोभगोअघोअपूर्वस्य ।६।१। रोः ।६।१। (रोः सुँपि से)। यः ।१।१। (यकारादकार उच्चारणार्थः)। अशि ।७।१। समासः—भोश्च भगोश्च अघोश्च अञ्च =भोभगो-अघो-आः, इतरेतरद्वन्द्वः । सन्ध्यभावः सौत्रः । भो-भगो-अघो-आः पूर्वे यस्मात् स भो-भगो-अघो-अपूर्वस्तस्य, बहुव्रीहि-समासः । अर्थः—(भो-भगो-अघो-अपूर्वस्य) भो- पूर्वक, भगोपूर्वक, अघोपूर्वक तथा अवर्णपूर्वक (रोः) रुँ के स्थान पर (यः) य् आदेश हो जाता है (अशि) अश् परे हो तो । उदाहरण यथा— देवास् + इह = देवारुँ + इह (ससजुषो रुँः) = ‘देवाय् + इह’ यहां ‘इह’ शब्द का आदि इकार = अश् परे है अतः अवर्णपूर्वक रुँ को य् हो—‘देवाय् + इह’ बना । अब लोपः शाकल्यस्य (३०) सूत्र से यकार का वैकल्पिक लोप करने से—‘देवा इह’ तथा ‘देवायिह’ ये दो रूप सिद्ध होते हैं । ध्यान रहे कि लोपपक्ष में लोप (८.३.१६) के असिद्ध होने से आद् गुणः (६.१.८४) सूत्र द्वारा गुण नहीं होता । भोस्, भगोस् तथा अघोस् ये सकारान्त निपात हैं; अर्थात् चादिगण में पाठ होने से इन की चादयोऽसत्त्वे (५३) सूत्र द्वारा निपातसञ्ज्ञा है । निपातसञ्ज्ञा होने से स्वरादिनिपातमव्ययम् (२६७) सूत्र से इनकी अव्ययसञ्ज्ञा भी हो जाती है । यहां सूत्र में इन के एकदेश [भो, भगो अघो] का ग्रहण किया गया है । ये सब सम्बोधन [सर्व- साधारण के सम्बोधन में भोस्, भगवान् के सम्बोधन में भगोस् तथा पापी के सम्बोधन में अघोस् का प्रायः प्रयोग देखा जाता है] में प्रयुक्त होते हैं । उदाहरण यथा— भोस् + देवाः (हे देवताओ ! ), भगोस् + नमस्ते (हे भगवन् ! आप को नमस्कार
१४८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
हो), अघोस् + याहि (हे पापिन् ! दूर हो)। इन सब स्थानो पर ससजुषो रुँ.(१०५) सूत्र से सकार को रुँ आदेश हो, उकार की इत् सञ्ज्ञा और उसका लोप करने पर— 'भोर् + देवा भगोर् + नमस्ते, अघोर् + याहि' रूप बने । अब इस प्रवृत्त सूत्र से रुँ को य् आदेश करने से—भोय् + देवा, भगोय् + नमस्ते, अघोय् + याहि—इस प्रकार स्थिति हुई । अब अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् —(१०६) हलि सर्वेषाम् ।८।३।२२॥ भो-भगो-अघो-अ-पूर्वस्य यस्य लोप स्याद्धलि । भो देवा । भगो नमस्ते । अघो याहि ॥ अर्थ —हल् परे होने पर भो, भगो, अघो तथा अवर्ण पूर्व वाले यकार का लोप हो जाता है । व्याख्या—भो-भगो-अघो-अ-पूर्वस्य ।६।१। (भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि से)। यस्य ।६।१। (व्योर्लघुप्रयत्नतरः शाकटायनस्य से वचनविपरिणाम कर के) । लोपः ।१।१। (लोपः शाकल्यस्य से)। हलि ।७।१। सर्वेषाम् ।६।३। अर्थ —(भोभगोअघोअ- पूर्वस्य) भोपूर्वक भगोपूर्वक, अघोपूर्वक तथा अवर्णपूर्वक (यस्य) यकार का (हलि) हल् परे होने पर (लोप ) लोप हो जाता है (सर्वेषाम्) सब आचार्यों के मत मे । इस सूत्र से यकार का नित्यलोप हो कर 'भो देवा, भगो नमस्ते, अघो याहि' ये रूप सिद्ध हो जाते हैं । ग्रन्थकार ने इस सूत्र के अवर्णपूर्वक यकार के लोप का उदाहरण नही दिया । 'देवा हसन्ति' आदि स्वयम् उदाहरण ढूंढ लेने चाहियें । ध्यान रहे कि हल् परे होने पर ही यकार का नित्यलोप होगा परन्तु यदि अच् परे होगा तो लोपः शाकल्यस्य (३०) से लोप वा विकल्प हो जायेगा । यथा—देवा इच्छन्ति, देवायिच्छन्ति । बाल इच्छति, बालविच्छति । अभ्यास (२४) (१) सूत्रसमन्वय करते हुए सन्धिविच्छेद करें— १ बाला आगच्छन्ति । २ नरो हन्ति । ३. चाण्डालोऽभिजायते । ४. भो देवदत्त ! सर्वेऽत्र मूर्खास्सन्ति । ५ अघो याहि । ६. भो (?) परमात्मन् । ७ कदागुरोकमो भवन्त (भवन्त ओवसः=गृहात् कदा अगु ? आप घर से कब गये ?) । ८. वोऽदात् । ६. दुष्टौ जिह्वा डहासीत् । १० त्रैगुण्यविषया वेदाः । ११. धीरो न शोचति । १२ मृग एति । १३. छात्रायिच्छति । १४ पण्डिता भाग्यवन्तः । १५. नृपा ददति । (२) सूत्र निर्देश-पूर्वक सन्धि करें— १. कविस् + करोति । २. हरिस् + निष्ठति । ३. रविस् + उदेति । ४. लक्ष्मीस् + इच्छति । ५ तमस् + आसुव । ६ हनस् + अत्र । ७ गौस्
+गच्छति । ८. अश्वास्+धावन्ति । ६. अपिपर्+अयम्¹ । १०. कृष्णमेघः+तिरस्+दधे । ११. नार्थस्+ऌकारोपदेशेन² । १२. रामस्+अब्रवीत् । १३. भगोस्+परमात्मन् । १४. पुनर्+हसति । १५. ह्यास्+धावन्ति । (३) उत्वविधि के प्रति रुत्वविधि सिद्ध है या असिद्ध ? सकारण लिखें। (४) अर्धमात्रालाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणाः तथा पर्यायशब्दानां लाघवगौरवचर्चा नाद्रियते इन परिभाषाओं का सोदाहरण विवेचन करें। ———::०::——— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(११०) रोऽसुपि ॥८।२।६९॥ अह्नो रेफादेशो न तु सुंपि । अहरहः । अहर्गणः ॥ **अर्थः—**अहन् शब्द के अन्त्य नकार के स्थान पर रेफ आदेश होता है। परन्तु सुँप् परे होने पर नहीं होता। **व्याख्या—**अहन् ।६।१। (अहन् सूत्र का अनुवर्त्तन होता है, यहां षष्ठी-विभक्ति का लुक् समझना चाहिये) । रः ।१।१। रेफादकार उच्चारणार्थः । असुपि ।७।१। अर्थः—(अहन्) अहन् शब्द के स्थान पर (रः) र् आदेश होता है (असुपि) परन्तु सुँप् परे होने पर नहीं होता । अलोऽन्त्यपरिभाषा से अहन् के अन्त्य नकार को ही रेफ आदेश होगा । उदाहरण यथा— अहन्+अहन् = अहर्+अहर् = अहरहः (प्रतिदिन) । 'अहन् सुँ' इस पद को 'नित्यवीप्सयोः (८८६) से द्वित्व हो—'अहन् सुँ अहन् सुँ' बना । पुनः स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से दोनों सुँप्रत्ययों का लुक् करने से—'अहन् अहन्' । अब यहां न लुमताङ्गस्य (१६१) से प्रत्ययलक्षण के निषेध हो जाने से सुं=सुँप् के परे न होने के कारण नकार को रेफ आदेश हो—अहरहन् । दूसरे में भी लुक् होने से असुँप् होने कारण रोऽसुपि सूत्र से नकार को रेफ तथा अवसान में उसे विसर्ग आदेश करने पर— 'अहरहः' प्रयोग सिद्ध होता है । दूसरा उदाहरण—अहन्+गण = अहर्+गण = अहर्गणः (दिनों का समूह; अह्नां गणः= अहर्गणः, षष्ठीतत्पुरुषसमासः ।) 'अहन्+आम् गण+सुँ' इस अलौकिक- विग्रह में विभक्तियों का लुक् हो—अहन्+गण । अब यहां न लुमताङ्गस्य (१६१) से प्रत्ययलक्षण के निषेध होने से आम् = सुँप् के परे न होने के कारण नकार को रेफ आदेश हो—अहर्गण । विभक्ति लाने से—'अहर्गणः' प्रयोग सिद्ध होता है । यह सूत्र अहन् (३६३; पदान्त में अहन् के नकार को रुँ आदेश हो) सूत्र का अपवाद है; अर्थात् उस सूत्र से रुँ प्राप्त होने पर इस सूत्र से रेफ आदेश विधान
१. पृ पालनपूरणयोः (जुहो०) इति धातोर्लङि प्रथमपुरुषैकवचनमिदम् । २. यहां रुँ को य् हो कर उस का वैकल्पिक लोप होगा ।
किया जाता है। यदि रुँ आदेश होता तो 'अहरह' में अतो रोरप्लुतादप्लुते (१०६) सूत्र द्वारा तथा अहर्गण' में हशि च (१०७) सूत्र द्वारा उत्व हो कर अनिष्ट रूप बन जाता। अत रेफ आदेश करने से उत्व न होगा। इस कारण 'अहरहरत्र, अहरहर्दीप्ति, अहरहर्गच्छति' इत्यादि प्रयोग बनेंगे, 'अहोऽहोऽत्र' आदि नही। यही रुँत्व न वह कर रेफ आदेश करने का प्रयोजन है। शङ्का—आप ने रोऽसुपि सूत्र को अहन् (३६३) सूत्र का अपवाद माना है, परन्तु यह उचित प्रतीत नही होना, क्योकि अपवाद के विषय मे उत्सर्ग की प्राप्ति अवश्य हुआ करती है परन्तु यहा रोऽसुपि के उदाहरणा मे अहन् (३६३) सूत्र प्राप्त नही हो सकता। तथाहि रोऽसुपि सूत्र क 'अहन् + अहन्, अहन् + गण' इत्यादि उदाहरण है। इन मे सुँप् का लुक् होने स न लुमताङ्गस्य (१६१) द्वारा प्रत्ययलक्षण न हो सकने के कारण पदसञ्ज्ञा न हो सकेगी। पदसञ्ज्ञा न हो सकने से अहन् (३६३) सूत्र प्राप्त नही हो सकेगा। अत प्रतीत होता है कि यह सूत्र अहन् (३६३) का अपवाद नही किन्तु स्वतन्त्रतया रेफ आदेश विधान करने वाला है। समाधान—आप को न लुमताङ्गस्य (१६१) सूत्र के अर्थ में भ्रान्ति हो गई है। उस का अय है— लुक्, श्लु, लुप शब्दा से प्रत्यय का अदर्शन करने पर उस को मान कर अङ्ग के स्थान पर कार्य नही होते' यहा स्पष्ट अङ्ग को कार्य करने का निषेध है। पदसञ्ज्ञा अङ्ग काय नही, क्योकि वह अङ्ग और प्रत्यय दोनो को मिला कर की जाती है। अत लुक् आदि शब्दों द्वारा सुँप् प्रत्यय का लुक् हो जाने पर भी पदसञ्ज्ञा सिद्ध हो जाती है और उसके हो जाने से तदाश्रित कार्य भी बेरोकटोक प्राप्त होते हैं। यथा— 'राजपुरुष' यहा ङस् का लुक् होने पर पदसञ्ज्ञा हो जाने के कारण न लोपः प्राति- पदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से पद के अन्त वाले नकार का लोप सिद्ध हो जाता है। इसी प्रकार अहरह, अहर्गण' आदिया में सुँप् का लुक् हो जाने पर भी पदसञ्ज्ञा होती थी और उस के होने से अहन् (३६३) सूत्र द्वारा रुँत्व प्राप्त था। उम के प्राप्त होने पर यह रोऽसुपि सूत्र बनाया गया है, अत यह उस का अपवाद है। इस के प्रवृत्त होने मे न लुमताङ्गस्य (१६१) सूत्र स सुँप् का अभाव हो जाता है क्योकि यह अङ्ग के स्थान पर रेफ आदेश करता है। 'असुंपि' यहा प्रसज्यप्रतिषेध है। अत सुँप् परे न हो, और चाहे जो हो, यह सूत्र प्रवृत्त होगा। यदि यहा पर्युदास-प्रतिषेध मानें तो सुँप् से भिन्न तत्सदृश अर्थात् प्रत्यय परे होने पर ही यह सूत्र प्रवृत्त हो सकेगा, 'अहर्भाति, अहरह, अहर्गण' इत्यादि स्थानो पर जहा प्रत्यय परे नही प्रवृत्त न हो सकेगा, केवल 'अहर्वान्' इत्यादि स्थानो पर ही प्रवृत्त होगा। अत यहा पर्युदास प्रतिषेध मानना उचित नही, प्रसज्यप्रतिषेध मानना ही युक्त है। सुँप् का निषेध इस लिये किया गया है कि 'अहोभ्याम्, अहोभि' इत्यादि स्थानो पर रेफ न हो कर अहन् (३६३) से रुँत्व हो जाये। यदि यहा रेफ आदेश होता तो 'अहा रम्यम्' की तरह हशि च (१०७) से उत्व न हो सकता और उम के न होने मे गुण भी न हो पाता।
विसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् १५१ इस सूत्र के अन्य उदाहरण यथा—‘अहरिदम्, अहरिदानीम्, अहरत्र, अहरदः, अहर्भाति, अहर्गच्छति’ प्रभृति जान लेने चाहियें। विशेष—इस सूत्र पर एक अपवाद वार्त्तिक है—वा०—रूपरात्रिरथन्तरेषु रुत्वं वाच्यम्। अर्थात् रूप रात्रि और रथन्तर शब्दों के परे होने पर अहन् के नकार को रुँ आदेश हो। अहोरूपम्, गतमहो रात्रिरेषा, अहोरथन्तरम्। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१११) रो रि।८।३।१४॥ रेफस्य रेफे परे लोपः ॥ अर्थः—रेफ का रेफ परे होने पर लोप होता है। व्याख्या—रः ।६।१। रि ।७।१। लोपः ।१।१। (ढो ढे लोपः से) अर्थः—(रः) रेफ का (रि) रेफ परे होने पर (लोपः) लोप हो जाता है। इसी प्रकार का एक सूत्र—ढो ढे लोपः (५५०) है। इस का अर्थ—(ढः।६।१) ढ् का (ढे ।७।१) ढ् परे होने पर (लोपः।१।१) लोप हो जाता है। इन दोनों सूत्रों का उपयोग अग्रिम सूत्र के उदाहरणों में किया जायेगा। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(११२) ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः।६।३।११०॥ ढरेफयोर्लोपनिमित्तयोः पूर्वस्याणो दीर्घः स्यात्। पुना रमते। हरी रम्यः। शम्भू राजते। अणः किम्? तृढः। वृढः ॥ अर्थः—ढकार और रेफ के लोप में निमित्तभूत जो ढकार और रेफ उन के परे होने पर पूर्व अण् के स्थान पर दीर्घ हो जाता है। व्याख्या—ढ्रलोपे ।७।१। पूर्वस्य ।६।१। अणः ।६।१। दीर्घः ।१।१। समासः— ढ् च रश्च = ढ्रौ, इतरेतरद्वन्द्वः। रेफादकार उच्चारणार्थः। ढ्रौ लोपयतीति ढ्रलोपः, ण्यन्तात् कर्मण्युपपदेऽण्प्रत्ययः। ढकार और रेफ का लोप करने वाले इस व्याकरण में ढो ढे लोपः (५५०) तथा रो रि (१११) में क्रमशः ढकार और रेफ ही है। अर्थः—(ढ्रलोपे) ढकार और रेफ का लोप करने वाले अर्थात् ढ् वा र् के परे होने पर (पूर्वस्य) पूर्व (अणः) अ, इ, उ वर्णों के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ हो जाता है। तात्पर्य यह है कि जब ढकार के परे रहते ढकार का लोप हो जाये अथवा रेफ के परे रहते रेफ का लोप हो जाये तो पूर्व अण् (अ, इ, उ) को दीर्घ हो जाता है। उदाहरण यथा— (१) 'पुनर्+रमते' (फिर खेलता है) यहां 'रमते' के आदि रेफ को मान कर 'पुनर्' के रेफ का रो रि (१११) सूत्र से लोप हो जाता है। पुनः इस रेफलोप में निमित्त 'रमते' वाले रेफ के परे होने पर नकारोत्तर अकार = अण् को दीर्घ हो कर—'पुना रमते' प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार— (२) 'हरिस्+रम्यः' (हरि सुन्दर है) यहां ससजुषो रुः (१०५) से पदान्त सकार को रुँ आदेश हो उकार इत् के चले जाने पर—हरिर्+रम्यः। अब रो रि (१११) से रेफ का लोप तथा ढ्रलोपे० (११२) से पूर्व अण् (इ) को दीर्घ करने से—'हरी रम्यः' प्रयोग सिद्ध होता है।
१५२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां (३) 'शम्भुस् + राजत' (शिवजी शोभित होते हैं) यहा भी पूर्ववत् पदान्त सकार को रुँत्व, रो रि (१११) स रेफलोप तथा ढूलोपे० (११२) से पूर्व अण्(उ) को दीर्घ करने स - शम्भू राजते' प्रयोग सिद्ध होता है । इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा— १ अहा रम्यम् । २ ना रम्य (नर् + रम्य', नृशब्दस्य सबोधने) । ३. अन्ता- राष्ट्रिय । ४ सवितू रश्मय । ५ नीरक् । ६. लीढाम् (लिह् + ढाम्; वह चाटे) । ७ भूपती रक्षति । ८ फेरू रोति । ६ नीरस । १० दाशरथी राम । इत्यादि । इस सूत्र मे अण् प्रत्याहार पीछे (११) सूत्र पर कह अनुसार पूर्व णकार (अ इ उ ण्)स ही लिया जायेगा, इस स 'तृढ' (मारा गया), 'वृढ' (तैयार, उद्यत) यहा पूर्व ऋकार का दीर्घ न होगा । तथाहि—'तृद्+ढ, वृद्+ढ' यहा ढो ढे लोप. (५५०] सूत्र स ढकार का लाप हो कर—'तृढ, वृढ' प्रयोग सिद्ध होते हैं। ढलोप का उदाहरण मूल म नही दिया गया, इस मे—लिह् + ढ = लि + ढ = 'लीढ' प्रभृति उदाहरण हैं । यहा 'पूर्वस्य' ग्रहण का प्रयोजन सिद्धान्त-कौमुदी मे देखना चाहिये । नोट— पुना रमते' मे 'पुनस् + रमते' यह छेद अशुद्ध है, क्योकि 'पुनर्'—यह रेफान्त अव्यय है, सकारान्त नहीं । वैसा होने पर 'मनोरथ.' की तरह 'पुनो रमते' बन जाता । हरिम् + रम्य, शम्भुस् + राजत' ये छेद तो शुद्ध है, लकारपूर्व न होने स इन म हशि च (१०७) प्राप्त नही। [लघु०] 'मनस् + रथ' इत्यत्र रुँत्वे कृते 'हशि च' (१०७) इत्युत्वे 'रो रि' (१११) इति लोपे च प्राप्ते— अर्थ - 'मनस् + रथ' यहा ससजुषो रु. से सकार को रुँ किया तो हशि च से उत्व तथा रो रि म रेफ का लोप दोनों प्राप्त हुए [इस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है]। व्याख्या - यहा उत्व और रेफ-लोप युगपत् (इकट्ठे) प्राप्त होते है । इन दोनो मे से कौन-सा हो ? इस शङ्का की निवृत्ति के लिये अग्रिम-सूत्र लिखते हैं— [लघु०] परिभाषा सूत्रम्—(११३) विप्रतिषेधे परं कार्यम् ।१।४।२।। तुल्यबलविरोघे परं कार्यं स्यात् । इति लोपे प्राप्ते 'पूर्वत्राऽसिद्धम्' (३१) इति 'रो रि' (१११) इत्यस्यासिद्धत्वादुत्त्वमेव । मनोरथ ॥ अर्थ - तुल्यबल वाला का विरोध होने पर परकार्य होता है । व्याख्या—विप्रतिषेधे ।७।१। परम्।१।१। कार्यम् ।१।१। अर्थ —(विप्रतिषेधे) विप्रतिषेध होने पर (परम्) पर (कार्यम्) कार्य होता है। अन्यत्रान्यत्रलब्धाव- काशयोरकत्र प्राप्तिस्तुल्यबलविरोध. । तुल्यबल वाले दो कार्यों के विरोध को विप्रति- षेध कहते हैं । पृथक्-पृथक् स्थानो (जहा वे परस्पर प्राप्त नही हो सकते) पर चरि- तार्थ होने वाले सूत्र तुल्यबल वाले कहलाते हैं। इन तुल्यबल वालो का यदि विरोध हो
विसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् १५३ जाये तो इन में जो अष्टाध्यायी में परे पढ़ा गया है वही प्रवृत्त होगा । यथा—हशि च सूत्र 'शिवो वन्द्यः' आदि स्थानों पर चरितार्थ हो चुका है इन स्थानों पर रो रि सूत्र प्रवृत्त नहीं हो सकता और 'रो रि' सूत्र 'हरी रम्यः' आदि स्थानों पर चरितार्थ हो चुका है इन स्थानों पर हशि च सूत्र प्राप्त नहीं हो सकता; तो इस प्रकार हशि च और रो रि तुल्यबल वाले हैं अब इन तुल्यबल वालों का 'मनर् + रथ' में विरोध उत्पन्न हो गया है । तो यहां वही कार्य होगा जो अष्टाध्यायी में परे पढ़ा गया होगा । अष्टाध्यायी में हशि च (६.१.११०) सूत्र से रो रि (८.३.१४) सूत्र परे पढ़ा गया है अतः रो रि द्वारा रेफलोप की प्राप्ति हुई । परन्तु रो रि सूत्र त्रिपादीस्थ होने के कारण हशि च की दृष्टि में असिद्ध है [देखो—पूर्वत्रासिद्धम् (३१)] अतः हशि च की दृष्टि में रो रि का अस्तित्व ही नहीं रहता, इस से हशि च से उत्व हो कर—मन+ उ+रथ । अब आद् गुणः (२७) सूत्र से गुण एकादेश कर विभक्ति लाने से—'मनो- रथः' प्रयोग सिद्ध होता है । मनसो रथः=मनोरथः (अभिलाषा) । इसी प्रकार—१. बालो रोदिति । २. राघवो रामः । ३. काको रौति । ४. भूयो रमते । ५. ईश्वरो रचयति । ६. धर्मो रक्षति । ७. देवो राजते । ८. भूभृतो रोपः । आदि । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(११४) एतत्तदोः सुँलोपोऽकोरनञ्समासे हलि ।६।१।१२८॥ अककारयोरेतत्तदोर्यः सुँस्तस्य लोपः स्याद्धलि, न तु नञ्समासे । एष विष्णुः । स शम्भुः । अकोः किम् ? एषको रुद्रः । अनञ्समासे किम् ? असः शिवः । हलि किम् ? एषोऽत्र ।। अर्थः—ककार से रहित एतद् और तद् शब्द के सुँ का हल् परे होने पर लोप हो जाता है, परन्तु नञ्समास में नहीं होता । व्याख्या—एतत्तदोः ।६।२। सुँलोपः ।१।१। अकोः ।६।२। अनञ्समासे ।७।१। हलि ।७।१। समासः—एतच्च तच्च=एतत्तदौ, तयोः=एतत्तदोः, इतरेतरद्वन्द्वः । सोर्लोपः=सुँलोपः, षष्ठीतत्पुरुषः¹ । न नञ्समासः=अनञ्समासः, तस्मिन्=अनञ्स- मासे, नञ्तत्पुरुषः । अविद्यमानः क्=ककारो ययोस्तौ=अकौ, तयोः=अकोः, बहुव्रीहि- समासः । अर्थः— (अकोः) ककाररहित (एतत्तदोः) एतद् और तद् शब्द के (सुँलोपः) सुँ का लोप होता है (हलि) हल् परे हो तो । परन्तु (अनञ्समासे) नञ्समास में नहीं होता । 'सुँ' से यहां प्रथमैकवचन अभिप्रेत है । उदाहरण यथा—एषस्+विष्णुः=एष विष्णुः (यह विष्णु है) । यहां वकार =हल् परे होने से एतद् शब्द से परे 'सुँ' प्रत्यय के सकार का लोप हो जाता है । सस्+शम्भुः=स शम्भुः । यहां शकार=हल् परे होने से तद् शब्द से परे 'सुँ' प्रत्यय के सकार का लोप हो जाता है । १. यहां 'सुँ' का सम्बन्ध 'एतत्तदोः' के साथ होने के कारण सौत्रत्वात् असमर्थ समास समझना चाहिये । अथवा 'सुँ' को लुप्तषष्ठ्यन्त पृथक् पद मानना चाहिये ।
१५४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां एतद् और तद् शब्द की टि से पूर्व जब अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक्टे (१२२६) सूत्र से अकच् प्रत्यय हो जाता है तब इन में ककार आ जाता है । तब हल् परे होने पर भी इन से परे ‘सुं’ प्रत्यय का लोप नही हुआ करता । यथा—‘एषकस् + रुद्र’ यहां सुं का लोप न हो कर ससजुषो रुं (१०५) से रुंत्व, हशि च (१०७) से उत्व तथा आद् गुण. (२७) से गुण एकादेश करने से ‘एषको रुद्र’ प्रयोग सिद्ध होता है । इसी प्रकार—सकस् + रुद्र = सको रुद्र, सकस् + शिव = सक शिव इत्यादि में हल् परे होने पर भी सुं का लोप नहीं होना, क्योकि तद् शब्द ककार से रहित नहीं है ।१ ‘अनञ्समासे’ यहां प्रसज्यप्रतिषेध है अर्थात् नञ्समास न हो और चाहे समास हो या न हो सुं का लोप हो जायेगा । यदि यहां पर्युदासप्रतिषेध मानें तो नञ्समास से भिन्न तत्सदृश अर्थात् समास का ग्रहण होने से ‘एष रुद्र, स शिव’ आदि में सुं का लोप न हो सकेगा, अतः प्रसज्यप्रतिषेध मानना ही युक्त है । नञ्समास में सुँलोप नही होता । यथा—‘अस शिव, अनेष शिव’ (न स = अस, न एष = अनेष) यहां सुँ को रुँ और रुँ को विसर्ग हो वा शरि (१०४) से विकल्प करके विसर्ग आदेश होगा । पक्ष में विसर्जनीयस्य सः (१०३) से सकार आदेश हो जायेगा— असश्शिव, अनेषश्शिव । हल् परे होने पर सुं का लोप कहा गया है इस से अच् परे होने पर सुँलोप न होगा । यथा—एषस् + अत्र = एषरुँ + अत्र = एषर् + अत्र = एषउ + अत्र = एषो
- अत्र = एषोऽत्र । यहां अतो रोरप्लु० (१०६) से उत्व, आद् गुण (२७) से गुण तथा एडः पदान्तादति (४३) से पूर्वरूप हो जाता है । इसी प्रकार—‘सोऽत्र’ यहां भी सुँलोप न होगा । इस सूत्र के अन्य उदाहरण यथा— ह्—स हसति । एष हसति । | व्—स वकार । एष वकार । य्—स याति । एष याति । | म्—स मुह्नाति । एष मुह्नाति । व्—स वमति । एष वमति । | ड्—स डकार । एष डकार । र्—स रमते । एष रमते । | ण्—स णकार । एष णकार । ल्—स लुनाति । एष लुनाति । | न्—स नमति । एष नमति ।
१. प्रश्न—एतद् और तद् में जब अकच् प्रत्यय मध्य में आ जाता है तो एकद् और तक्द् ये भिन्न शब्द बन जाते हैं एतद् और तद् नहीं रहते । तब ‘अको’ यह निषेध व्यर्थ है । उत्तर—इसी निषेध से एक परिभाषा निकलती है—तन्मध्यपतितस्तद्ग्रहणेन गृह्यते । अकच् टि से पूर्व होता है अत ‘तन्मध्यपतित’ है इस से उसे वही शब्द माना जाता है । इसीलिये ‘उभकौ’ इस अकच् प्रत्यय में उभशब्द होने से ही द्विवचन सिद्ध हो जाता है। यदि यहां ‘क’ प्रत्यय कर दें तो वह मध्यपतित न होगा तब भिन्न शब्द माना जायेगा फिर उस में द्विवचन भी न होगा और अयच् हो जायेगा ।
विसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् १५५ भ्—स झणत्कारः । एष झणत्कारः । छ्—स छादयति । एष छादयति । भ्—स भाति । एष भाति । ठ्—स ठक्कुरः । एष ठक्कुरः । घ्—स घोप. । एष घोपः । थ्—स थूत्करोति । एष थूत्करोति । ढ्—स ढकारः । एष ढकारः । च्—स चलति । एष चलति । ध्—स धावति । एष धावति । ट्—स टिट्टिभः । एष टिट्टिभः । ज्—स जयति । एष जयति । त्—स तरति । एष तरति । व्—स वध्नाति । एष वध्नाति । क्—स करोति । एष करोति । ग्—स गच्छति । एष गच्छति । प्—स पठति । एष पठति । ड्—स ड्डिये । एष ड्डिये । श्—स शेते । एष शेते । द्—स ददाति । एष ददाति । ष्—स षण्ढः । एष षण्ढः । ख्—स खनति । एष खनति । स्—स सर्पति । एष सर्पति । फ्—स फलति । एष फलति । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(११५) सोऽचि लोपे चेत्पादपूरणम् ।६।१।१३०॥ सस् इत्यस्य सोर्लोपः स्यादचि, पादश्चेल्लोपे सत्येव पूर्य्येत । सेमाम- विड्ढि प्रभृतिम् (ऋ० २.२४ १) । सैष दाशरथी रामः ॥ अर्थः—यदि केवल लोप होने से ही पाद पूरा होता हो तो अच् परे होने पर तद् शब्द के 'सुं' का लोप हो जाता है । व्याख्या—सः ।६।१। (तद् शब्द का प्रथमा के एकवचन में 'सस्' रूप बनता है, उस का यहां अनुकरण किया गया है । इस के आगे षष्ठी के एकवचन का छन्दोवत् सूत्राणि भवन्ति इस कथन से छन्दोवत् होने के कारण सुपां सुलुक्० सूत्र से लुक् हो जाता है) । सुंलोपः ।१।१। (एतत्तदोः सुंलोपः० से) । अचि ।७।१। लोपे ।७।१। चेत् इत्यव्ययपदम् । एव इत्यप्यव्ययपदम् (स्यश्छन्दसि बहुलम् सूत्र से 'बहुलम्' की अनुवृत्ति आती है । उस से यहां 'एव' पद का ही ग्रहण किया जाता है) । अर्थः—(सः) 'सस्' के (सुंलोपः) सुं का लोप हो जाता है (अचि) अच् परे होने पर (चेत्) यदि (लोपे) लोप होने पर (एव) ही (पाद-पूरणम्) पादपूर्त्ति होती हो तो । श्लोक आदि के एक विशेष भाग को छन्दःशास्त्र में 'पाद' कहते हैं; उसी का यहां ग्रहण समझना चाहिये । उदाहरण यथा— सेमामविङ्ढि प्रभृतिं य ईशिषे ऽया विधेम नवया महा गिरा । यथा नो मीढ्वान्त्स्तवते सखा तव वृहस्पते सीषधः सोत नो मतिम् ॥ यह ऋग्वेद के द्वितीय मण्डल के चौबीसवें सूक्त का प्रथम मन्त्र है । यहां वैदिक जगती छन्द है । जगती छन्द के प्रत्येक पाद में बारह १२ अक्षर होते हैं । सेमाम- विङ्ढि प्रभृति य ईशिषे यह जगती छन्द का एक पाद है । इस में 'सस् + इमाम्' इस अवस्था में सकार का लोप हो कर गुण हो जाने से बारह अक्षरों का पाद पूरा हो जाता है । यदि यहां इस सूत्र से सकार का लोप न करते तो सकार को रुँ, रुँ को
१५६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां य् (१०८) और य् का वैकल्पिक लोप (३०) हो—'स इमामविद्धि प्रभृति य ईशिषे' इस प्रकार तेरह अक्षरों वाला पाद हो जाता, क्योंकि यकारलोप के असिद्ध होने से गुण प्राप्त नहीं हो सकता था । अब यहां इस सूत्र द्वारा विहित सकारलोप के त्रैपादिक न होने के कारण सिद्ध होने से गुण के निर्बाध हो जाने के कारण बारह अक्षर पूरे हो जाते हैं कोई दोष नहीं आता । द्वितीय उदाहरण यथा— सैष दाशरथी' रामः, सैष राजा युधिष्ठिरः । सैष कर्णो महात्यागी, सैष भीमो महाबलः ॥ [ये वे भगवान् दशरथनन्दन श्रीराम हैं। ये वे राजा युधिष्ठिर हैं। ये वे महादानी कर्ण हैं । ये वे महाबली भीम हैं।] यह 'अनुष्टुम्' (पद्यावक्त्र) छन्द है। अनुष्टुभ् छन्द के चार पाद और प्रत्येक पाद में आठ २ अक्षर होते हैं। इन सब पादों में 'सस् + एष' यहां प्रकृत सूत्र से स् का लोप हो वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि करने पर 'सैष' प्रयोग सिद्ध होता है । इस से आठ २ अक्षरों वाले सब पाद पूरे हो जाते हैं। यदि यहां इस सूत्र से स् का लोप न करते तो सकार को रुँ, रुँ को य् और य् का वैकल्पिक लोप हो कर त्रैपादिकतामूलक असन्धि होने से—'स एष' या 'सयेष' इस प्रकार रूप हो जाते । इस से प्रत्येक पाद में नौ २ अक्षर हो कर छन्दोभङ्ग हो जाता । अतः यहां पादपूर्ति का—सिवाय इस के कि स् का सिद्ध लोप किया जाये, अन्य कोई उपाय नहीं, इसलिये स् का लोप किया गया है । 'बहुलम्' की अनुवृत्ति से 'एव' इसलिये ग्रहण किया गया है कि यदि किसी अन्य उपाय से पाद पूरा हो सकता हो तो स् का लोप न हो । किन्तु जब पादपूर्ति का अन्य कोई उपाय न सूझता हो तब लोप करना चाहिये । यथा— सोऽहमाजन्मशुद्धानाम्, आफलोदयकर्मणाम् । आसमुद्रक्षितीशानाम्, आनाकरथवर्त्मनाम् ॥ (रघु० १ ५) यहां 'सस्+ अहम्' में सकार का लोप करने पर 'साहम्' बन जाने से पाद की पूर्ति हो जाती है। परन्तु यह पादपूर्ति अतो रोरप्लुतादप्लुते (१०६) द्वारा उत्व कर गुण और पूर्वरूप करने पर भी हो सकती है। अतः यहां स् का लोप न कर उत्व आदि ही करेंगे। आचार्य वामन इस सूत्र के 'पाद' शब्द से ऋग्वेद के पाद का ही ग्रहण करते हैं। उन का कथन है कि यदि ऋग्वेद के पाद की पूर्ति होती होगी तो सकार का लोप हो जायेगा। परन्तु सूत्र में किसी विशेष स्थान के पाद का उल्लेख न होने से सर्वत्र लोक अथवा वेद में इस की प्रवृत्ति होती है—ऐसा अन्य लोग मानते हैं । ग्रन्थकार ने दोनों मत दिखाने के लिये दोनों उदाहरण दे दिये हैं। [लघु०] इति विसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् ॥ अर्थः—यहां विसर्ग-सन्धि का प्रकरण समाप्त होता है । १. अत्र रो रि (१११) इति रेफलोपे ढ्रलोपे० (११२) इति पूर्वस्याणो दीर्घः ।
विसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् १५७ व्याख्या—तनिक ध्यान देने से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह सम्पूर्ण प्रकरण विसर्गसन्धि का नहीं है। अतो रोरप्लुतादप्लुते (१०६), हशि च (१०७), रोऽसुपि (११०), एतत्तदोः० (११४) आदि सूत्रों का—अवसान अथवा खर् परक न होने से विसर्गों के साथ कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। किञ्च यदि इस सम्पूर्ण प्रकरण को विसर्ग- सन्धिप्रकरण मानें तो पञ्चसन्धिप्रकरण यह कथन असङ्गत हो जाता है क्योंकि तब चार ही प्रकरण होते हैं—१ अच्सन्धि-प्रकरण। २ प्रकृतिभाव-प्रकरण। ३ हल्सन्धि- प्रकरण। ४ विसर्गसन्धि-प्रकरण। अतः हमारे विचार में यहां दो प्रकरण ही होने चाहियें। वा शरि (१०४) तक विसर्गसन्धि-प्रकरण और इस से आगे स्वादिसन्धि- प्रकरण। वा शरि (१०४) सूत्र से आगे जितने सूत्र कहे गये हैं उन सब का सुँ आदि प्रत्ययों के साथ सम्बन्ध है अतः आगे 'स्वादिसन्धि-प्रकरण' कहना ही अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। 'सिद्धान्त-कौमुदी' में ऐसा किया भी गया है। इस प्रकार पञ्च- सन्धि-प्रकरण भी ठीक हो जाते हैं। प्रतीत होता है कि लिपिकरों की भूल से यहां दो प्रकरणों का एक प्रकरण कर दिया गया है। [लघु०] समाप्तञ्चेदं पञ्च-सन्धि-प्रकरणम् ॥ अर्थः—यहां पञ्चसन्धिप्रकरण समाप्त होता है। व्याख्या—(१) अच्सन्धि-प्रकरण, (२) प्रकृतिभाव-प्रकरण, (३) हल्सन्धि- प्रकरण, (४) विसर्गसन्धि-प्रकरण, (५) स्वादिसन्धि-प्रकरण ये पञ्च सन्धि प्रकरण हैं। यहां कई लोग प्रकृतिभावप्रकरण को सन्धिप्रकरण नहीं मानते। उन का कथन है कि 'हरी एतौ' आदि में प्रकृतिभाव अर्थात् सन्धि का अभाव ही विधान किया गया है किसी सन्धि का विधान नहीं; अतः प्रकृतिभावप्रकरण को सन्धिप्रकरण में गिनना भूल है। 'पञ्च-सन्धि-प्रकरणम्' इस की सङ्गति लगाने के लिये वे अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः (७६), वा पदान्तस्य (८०) द्वारा विधान की गई एक अनुस्वार-सन्धि की कल्पना करते हैं। परन्तु हमारी सम्मति में 'प्रकृतिभावप्रकरण' के अन्दर मय उञो वो वा (५८), इकोऽसवर्णे० (५६), ऋत्यकः (६१) आदि सन्धि करने वाले सूत्र पाए जाते हैं; अतः प्रकृतिभावप्रकरण भी एक प्रकार का सन्धिप्रकरण ही है। नवीन अनुस्वारसन्धि की कल्पना करना ग्रन्थकार के आशय से विपरीत जान पड़ता है। आगे विद्वज्जन स्वयं युक्तायुक्त का विचार कर लें। अभ्यास (२५) (१) तुल्यवलविरोध किसे कहते हैं ? उदाहरण दे कर समन्वय करें । (२) रोऽसुंपि सूत्र किस का और कैसे अपवाद है ? (३) सोऽचि लोपे० सूत्र में 'एव' पद लाने की क्या आवश्यकता है ? (४) पञ्च सन्धिप्रकरण कौन से हैं ? क्या प्रकृतिभावप्रकरण भी सन्धि- प्रकरण है ?