लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(१०३) के नित्य प्राप्त होने पर यह उस का अपवाद आरम्भ किया जाता है। शर् परे होने पर विसर्ग—विसर्गरूप से विकल्प से अवस्थित रहता है और पक्ष में पूर्व सूत्र से विसर्ग को स् भी हो जाता है। उदाहरण यथा— हरि + शेते (विष्णु अथवा शेर सोता है)। यहां शर्=शकार परे है अतः प्रकृतसूत्र से विसर्ग को विसर्ग होकर—हरिः शेते। पक्ष में विसर्जनीयस्य स (१०३) सूत्र से विसर्ग को सकार होकर स्तोः श्चुना श्चु (६२) से शकार के योग में उसे शकार हो जाता है—हरिश्शेते। इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं। इसी तरह—सर्पः सरति, सर्पस्सरति। रामः षष्ठः, रामष्षष्ठः [ष्टुना ष्टुः (६४)]। इत्यादि। खर् प्रत्याहार में 'क्, ख्, च्, छ्, ट्, ठ्, त्, थ्, प्, फ्, श्, ष्, स्' इतने वर्ण आते हैं। इन में 'श्, ष्, स्' परे होने पर वा शरि (१०४) तथा 'क्, ख्, प्, फ्' परे होने पर कुप्वोः ᳵक ᳶपौ च (६८) प्रवृत्त हो जाता है। शेष बचे 'च्, छ्, ट्, ठ्, त्, थ्' वर्णों के परे होने पर ही विसर्जनीयस्य स (१०३) सूत्र प्रवृत्त होता है। विसर्ज- नीयस्य स (१०३) से स् होने पर भी केवल 'त्, थ्' परे होने पर ही वह अविकृत= विकाररहित=वैसे का वैसा रहता है, क्योंकि 'च्, छ्' में उसे स्तोः श्चुना श्चुः (६२) से 'श्' और 'ट्, ठ्' में उसे ष्टुना ष्टुः (६४) से 'ष्' हो जाता है। ग्रन्थकार ने 'विष्णु- स्त्राता' यह उदाहरण 'त्' का दिया है। संस्कृत साहित्य में प्रायः थकारादि शब्द के न मिलने के कारण उन्होंने थकार परे का उदाहरण नहीं दिया। थकार परे के 'बाल- स्थूत्करोति' आदि उदाहरण हैं। इन सब की विवरण-तालिका निम्नलिखित प्रकार से जाननी चाहिये— ख् नर ᳵखादति, नरः खादति । कुप्वोः ᳵक ᳶपौ च (६८) । फ् वृक्ष ᳶफलति, वृक्षः फलति । कुप्वोः ᳵक ᳶपौ च (६८) । छ् वृक्षश्छादयति । विसर्जनीयस्य सः, स्तोः श्चुना श्चुः (६२)। ठ् देवष्ठक्कुरः । विसर्जनीयस्य स, ष्टुना ष्टुः (६४)। थ् बालस्थूत्करोति । विसर्जनीयस्य स (१०३) । च् पुष्पश्चिनोति । विसर्जनीयस्य स, स्तोः श्चुना श्चुः । ट् युष्ट्टीकते । विसर्जनीयस्य सः, ष्टुना ष्टुः (६४)। त् रामस्त्राता । विसर्जनीयस्य स (१०३)। क् बाल ᳵकरोति, बालः करोति । कुप्वोः ᳵक ᳶपौ च (६८)। प् नृप ᳶपाति, नृपः पाति । कुप्वोः ᳵक ᳶपौ च (६८)। श् पुरुषः शेते, पुरुषश्शेते । वा शरि, विसर्जनीयस्य स, स्तोः श्चुना ० । ष् नृपः षष्ठः, नृपष्षष्ठः । वा शरि, विसर्जनीयस्य स, ष्टुना ष्टुः । स् सर्पः सरति, सर्पस्सरति । वा शरि, विसर्जनीयस्य स (१०३) । नोट—कुप्वोः ᳵक ᳶपौ च (६८) सूत्र भी विसर्ग-सन्धि के प्रकरण का है, सन्धि में प्रमादवश लिखा गया था।