भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 160

विसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् १४५ [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१०५) स-सजुषो रुँः ।८।२।६६॥ पदान्तस्य सस्य सजुषश्च रुँः स्यात् ॥ अर्थः—पदान्त सकार तथा सजुष्शब्द के षकार के स्थान पर रुँ आदेश हो । व्याख्या—ससजुपोः ।६।२। (सूत्र में रो रि द्वारा रेफ का लोप हुआ है)। रुँः ।१।१। पदस्य ।६।१। (यह पीछे से अधिकृत है) । समासः—सश्च सजूष्च = ससजुपौ, (सकारादकार उच्चारणार्थः), तयोः = ससजुपोः । इतरेतरद्वन्द्वः । 'पदस्य' इस विशेष्य का 'ससजुपोः' यह विशेषण है अतः इस मे तदन्तविधि हो जाती है । अर्थः —(ससजुपोः) सकारान्त और सजुष्शब्दान्त (पदस्य ) पद के स्थान पर (रुँः) 'रुँ' आदेश हो जाता है । यहां सम्पूर्ण पद के स्थान पर विहित 'रुँ' आदेश अलोऽन्त्यस्य (२१) सूत्र से अन्त्य अल् अर्थात् सकारान्त पद के सकार को तथा सजुष्शब्दान्त पद के षकार को होगा ।¹ यह सूत्र विसर्ग की उत्पत्ति में कारण है । पदान्त सकार को जब यह रुँ आदेश कर देता है तो उकार की इत्सञ्ज्ञा हो कर 'र्' शेष रह जाता है । उस रेफ के स्थान पर अवसान में तथा खर् परे होने पर खरवसानयोर्विसर्जनीयः (६३) से विसर्ग आदेश हो जाता है । तदनन्तर विसर्ग के स्थान पर यथायोग्य जिह्वामूलीय आदि आदेश हुआ करते हैं । इन सब का विवरण हम पीछे लिख चुके हैं । अब 'खर्' से भिन्न अक्षर यदि 'र्' से परे हो तो रेफ के स्थान पर क्या २ आदेश होते हैं ? इसे बतलाने के लिये यह प्रकरण आरम्भ किया जाता है । 'रुँ' में उकार अनुनासिक होने से उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) सूत्र द्वारा इत्- सञ्ज्ञक है । उकार के इत् करने का फल आगे कहा जायेगा । 'शिवस् = अर्च्यः' (शिव जी पूजनीय हैं) यहां सुंवन्त होने से 'शिवस्' पद है अतः इस सूत्र से पदान्त सकार को रुँ, पुनः रुँ के उकार की इत्सञ्ज्ञा तथा लोप हो कर 'शिवर् + अर्च्यः' हुआ । अब अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् —(१०६) अतो रोरप्लुतादप्लुते ।६।१।११३॥ अप्लुतादतः परस्य रोरुः स्यादप्लुतेऽति । शिवोऽर्च्यः ॥ अर्थः—अप्लुत अत् से परे रुँ को 'उ' आदेश हो जाता है अप्लुत अत् परे हो तो । व्याख्या—अतः ।५।१। अप्लुतात् ।५।१। रोः ।६।१। उत् ।१।१। (ऋत उत् सूत्र से)। अप्लुते ।७।१। अति ।७।१। (एङः पदान्तादति से)। न प्लुतः—अप्लुतः, तस्मात् = अप्लुतात्, नञ्तत्पुरुषसमासः । अर्थः—(अप्लुतात्) अप्लुत (अतः) अत् से परे (रोः) रुँ के स्थान पर (उत्) उत् हो (अप्लुते) अप्लुत (अति) अत् परे हो तो । यहां अत् उत् में तपर करने से ह्रस्व अकार उकार लिये जाते हैं । १. सजुष् (मित्र) शब्द का उदाहरण—सजूः । सजुष्शब्द से प्रथमैकवचन सकार का हल्ङ्यादिलोप हो षकार को प्रकृतसूत्र से रुँत्व, र्वोरुपधाया दीर्घ इकः (३५१) से उपधादीर्घ तथा रेफ को विसर्ग करने से 'सजूः' सिद्ध होता है । इस शब्द का पूर्ण विवेचन हलन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण में देखें । ल० प्र० (१०)