भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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विसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् १४७ ह्—रामो हसति । | झ्—वृक्षो झम्भया पतितः । य्—बालो याति । | भ्—सूर्यो भाति । व्—शिवो वन्द्यः । | घ्—घोरा घोणिनो घोणा । र्—बालो रोति । | ढ्—बालो ढक्कानादं शृणोति । ल्—बुधो लिखति । | ध्—पर्वतो धौतः । व्—बालो वकारं पश्यति । | ज्—अगदो ज्वरघ्नः । म्—मूर्खो मुह्यति । | ब्—को बालः । ङ्—जनो ङादिशब्दं न विन्दति । | ग्—नरो गच्छति । ण्—को णोपदेशो धातुः ? | ड्—काको डिडये । न्—भक्तो नमतीश्वरम् । | द्—नृपो दास्यति । ससजुषो रुँः (१०५) से किया रुँत्व यहां भी वचनसामर्थ्य से असिद्ध नहीं होता । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१०८) भो-भगो-अघो-अ-पूर्वस्य योऽशि ।८।३।१७॥ एतत्पूर्वस्य रोर्यादेशोऽशि । देवा इह, देवायिह । भोस्, भगोस्, अघोस् —इति सान्ता निपाताः । तेषां रोर्यत्वे कृते— अर्थः—अश् प्रत्याहार परे होने पर भो, भगो, अघो तथा अवर्ण पूर्व वाले रुँ के स्थान पर यकार आदेश होता है । व्याख्या—भोभगोअघोअपूर्वस्य ।६।१। रोः ।६।१। (रोः सुँपि से)। यः ।१।१। (यकारादकार उच्चारणार्थः)। अशि ।७।१। समासः—भोश्च भगोश्च अघोश्च अञ्च =भोभगो-अघो-आः, इतरेतरद्वन्द्वः । सन्ध्यभावः सौत्रः । भो-भगो-अघो-आः पूर्वे यस्मात् स भो-भगो-अघो-अपूर्वस्तस्य, बहुव्रीहि-समासः । अर्थः—(भो-भगो-अघो-अपूर्वस्य) भो- पूर्वक, भगोपूर्वक, अघोपूर्वक तथा अवर्णपूर्वक (रोः) रुँ के स्थान पर (यः) य् आदेश हो जाता है (अशि) अश् परे हो तो । उदाहरण यथा— देवास् + इह = देवारुँ + इह (ससजुषो रुँः) = ‘देवाय् + इह’ यहां ‘इह’ शब्द का आदि इकार = अश् परे है अतः अवर्णपूर्वक रुँ को य् हो—‘देवाय् + इह’ बना । अब लोपः शाकल्यस्य (३०) सूत्र से यकार का वैकल्पिक लोप करने से—‘देवा इह’ तथा ‘देवायिह’ ये दो रूप सिद्ध होते हैं । ध्यान रहे कि लोपपक्ष में लोप (८.३.१६) के असिद्ध होने से आद् गुणः (६.१.८४) सूत्र द्वारा गुण नहीं होता । भोस्, भगोस् तथा अघोस् ये सकारान्त निपात हैं; अर्थात् चादिगण में पाठ होने से इन की चादयोऽसत्त्वे (५३) सूत्र द्वारा निपातसञ्ज्ञा है । निपातसञ्ज्ञा होने से स्वरादिनिपातमव्ययम् (२६७) सूत्र से इनकी अव्ययसञ्ज्ञा भी हो जाती है । यहां सूत्र में इन के एकदेश [भो, भगो अघो] का ग्रहण किया गया है । ये सब सम्बोधन [सर्व- साधारण के सम्बोधन में भोस्, भगवान् के सम्बोधन में भगोस् तथा पापी के सम्बोधन में अघोस् का प्रायः प्रयोग देखा जाता है] में प्रयुक्त होते हैं । उदाहरण यथा— भोस् + देवाः (हे देवताओ ! ), भगोस् + नमस्ते (हे भगवन् ! आप को नमस्कार