भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 163

१४८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

हो), अघोस् + याहि (हे पापिन् ! दूर हो)। इन सब स्थानो पर ससजुषो रुँ.(१०५) सूत्र से सकार को रुँ आदेश हो, उकार की इत् सञ्ज्ञा और उसका लोप करने पर— 'भोर् + देवा भगोर् + नमस्ते, अघोर् + याहि' रूप बने । अब इस प्रवृत्त सूत्र से रुँ को य् आदेश करने से—भोय् + देवा, भगोय् + नमस्ते, अघोय् + याहि—इस प्रकार स्थिति हुई । अब अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् —(१०६) हलि सर्वेषाम् ।८।३।२२॥ भो-भगो-अघो-अ-पूर्वस्य यस्य लोप स्याद्धलि । भो देवा । भगो नमस्ते । अघो याहि ॥ अर्थ —हल् परे होने पर भो, भगो, अघो तथा अवर्ण पूर्व वाले यकार का लोप हो जाता है । व्याख्या—भो-भगो-अघो-अ-पूर्वस्य ।६।१। (भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि से)। यस्य ।६।१। (व्योर्लघुप्रयत्नतरः शाकटायनस्य से वचनविपरिणाम कर के) । लोपः ।१।१। (लोपः शाकल्यस्य से)। हलि ।७।१। सर्वेषाम् ।६।३। अर्थ —(भोभगोअघोअ- पूर्वस्य) भोपूर्वक भगोपूर्वक, अघोपूर्वक तथा अवर्णपूर्वक (यस्य) यकार का (हलि) हल् परे होने पर (लोप ) लोप हो जाता है (सर्वेषाम्) सब आचार्यों के मत मे । इस सूत्र से यकार का नित्यलोप हो कर 'भो देवा, भगो नमस्ते, अघो याहि' ये रूप सिद्ध हो जाते हैं । ग्रन्थकार ने इस सूत्र के अवर्णपूर्वक यकार के लोप का उदाहरण नही दिया । 'देवा हसन्ति' आदि स्वयम् उदाहरण ढूंढ लेने चाहियें । ध्यान रहे कि हल् परे होने पर ही यकार का नित्यलोप होगा परन्तु यदि अच् परे होगा तो लोपः शाकल्यस्य (३०) से लोप वा विकल्प हो जायेगा । यथा—देवा इच्छन्ति, देवायिच्छन्ति । बाल इच्छति, बालविच्छति । अभ्यास (२४) (१) सूत्रसमन्वय करते हुए सन्धिविच्छेद करें— १ बाला आगच्छन्ति । २ नरो हन्ति । ३. चाण्डालोऽभिजायते । ४. भो देवदत्त ! सर्वेऽत्र मूर्खास्सन्ति । ५ अघो याहि । ६. भो (?) परमात्मन् । ७ कदागुरोकमो भवन्त (भवन्त ओवसः=गृहात् कदा अगु ? आप घर से कब गये ?) । ८. वोऽदात् । ६. दुष्टौ जिह्वा डहासीत् । १० त्रैगुण्यविषया वेदाः । ११. धीरो न शोचति । १२ मृग एति । १३. छात्रायिच्छति । १४ पण्डिता भाग्यवन्तः । १५. नृपा ददति । (२) सूत्र निर्देश-पूर्वक सन्धि करें— १. कविस् + करोति । २. हरिस् + निष्ठति । ३. रविस् + उदेति । ४. लक्ष्मीस् + इच्छति । ५ तमस् + आसुव । ६ हनस् + अत्र । ७ गौस्