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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

१४८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

हो), अघोस् + याहि (हे पापिन् ! दूर हो)। इन सब स्थानो पर ससजुषो रुँ.(१०५) सूत्र से सकार को रुँ आदेश हो, उकार की इत् सञ्ज्ञा और उसका लोप करने पर— 'भोर् + देवा भगोर् + नमस्ते, अघोर् + याहि' रूप बने । अब इस प्रवृत्त सूत्र से रुँ को य् आदेश करने से—भोय् + देवा, भगोय् + नमस्ते, अघोय् + याहि—इस प्रकार स्थिति हुई । अब अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् —(१०६) हलि सर्वेषाम् ।८।३।२२॥ भो-भगो-अघो-अ-पूर्वस्य यस्य लोप स्याद्धलि । भो देवा । भगो नमस्ते । अघो याहि ॥ अर्थ —हल् परे होने पर भो, भगो, अघो तथा अवर्ण पूर्व वाले यकार का लोप हो जाता है । व्याख्या—भो-भगो-अघो-अ-पूर्वस्य ।६।१। (भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि से)। यस्य ।६।१। (व्योर्लघुप्रयत्नतरः शाकटायनस्य से वचनविपरिणाम कर के) । लोपः ।१।१। (लोपः शाकल्यस्य से)। हलि ।७।१। सर्वेषाम् ।६।३। अर्थ —(भोभगोअघोअ- पूर्वस्य) भोपूर्वक भगोपूर्वक, अघोपूर्वक तथा अवर्णपूर्वक (यस्य) यकार का (हलि) हल् परे होने पर (लोप ) लोप हो जाता है (सर्वेषाम्) सब आचार्यों के मत मे । इस सूत्र से यकार का नित्यलोप हो कर 'भो देवा, भगो नमस्ते, अघो याहि' ये रूप सिद्ध हो जाते हैं । ग्रन्थकार ने इस सूत्र के अवर्णपूर्वक यकार के लोप का उदाहरण नही दिया । 'देवा हसन्ति' आदि स्वयम् उदाहरण ढूंढ लेने चाहियें । ध्यान रहे कि हल् परे होने पर ही यकार का नित्यलोप होगा परन्तु यदि अच् परे होगा तो लोपः शाकल्यस्य (३०) से लोप वा विकल्प हो जायेगा । यथा—देवा इच्छन्ति, देवायिच्छन्ति । बाल इच्छति, बालविच्छति । अभ्यास (२४) (१) सूत्रसमन्वय करते हुए सन्धिविच्छेद करें— १ बाला आगच्छन्ति । २ नरो हन्ति । ३. चाण्डालोऽभिजायते । ४. भो देवदत्त ! सर्वेऽत्र मूर्खास्सन्ति । ५ अघो याहि । ६. भो (?) परमात्मन् । ७ कदागुरोकमो भवन्त (भवन्त ओवसः=गृहात् कदा अगु ? आप घर से कब गये ?) । ८. वोऽदात् । ६. दुष्टौ जिह्वा डहासीत् । १० त्रैगुण्यविषया वेदाः । ११. धीरो न शोचति । १२ मृग एति । १३. छात्रायिच्छति । १४ पण्डिता भाग्यवन्तः । १५. नृपा ददति । (२) सूत्र निर्देश-पूर्वक सन्धि करें— १. कविस् + करोति । २. हरिस् + निष्ठति । ३. रविस् + उदेति । ४. लक्ष्मीस् + इच्छति । ५ तमस् + आसुव । ६ हनस् + अत्र । ७ गौस्

+गच्छति । ८. अश्वास्+धावन्ति । ६. अपिपर्+अयम्¹ । १०. कृष्णमेघः+तिरस्+दधे । ११. नार्थस्+ऌकारोपदेशेन² । १२. रामस्+अब्रवीत् । १३. भगोस्+परमात्मन् । १४. पुनर्+हसति । १५. ह्यास्+धावन्ति । (३) उत्वविधि के प्रति रुत्वविधि सिद्ध है या असिद्ध ? सकारण लिखें। (४) अर्धमात्रालाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणाः तथा पर्यायशब्दानां लाघवगौरवचर्चा नाद्रियते इन परिभाषाओं का सोदाहरण विवेचन करें। ———::०::——— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(११०) रोऽसुपि ॥८।२।६९॥ अह्नो रेफादेशो न तु सुंपि । अहरहः । अहर्गणः ॥ **अर्थः—**अहन् शब्द के अन्त्य नकार के स्थान पर रेफ आदेश होता है। परन्तु सुँप् परे होने पर नहीं होता। **व्याख्या—**अहन् ।६।१। (अहन् सूत्र का अनुवर्त्तन होता है, यहां षष्ठी-विभक्ति का लुक् समझना चाहिये) । रः ।१।१। रेफादकार उच्चारणार्थः । असुपि ।७।१। अर्थः—(अहन्) अहन् शब्द के स्थान पर (रः) र् आदेश होता है (असुपि) परन्तु सुँप् परे होने पर नहीं होता । अलोऽन्त्यपरिभाषा से अहन् के अन्त्य नकार को ही रेफ आदेश होगा । उदाहरण यथा— अहन्+अहन् = अहर्+अहर् = अहरहः (प्रतिदिन) । 'अहन् सुँ' इस पद को 'नित्यवीप्सयोः (८८६) से द्वित्व हो—'अहन् सुँ अहन् सुँ' बना । पुनः स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से दोनों सुँप्रत्ययों का लुक् करने से—'अहन् अहन्' । अब यहां न लुमताङ्गस्य (१६१) से प्रत्ययलक्षण के निषेध हो जाने से सुं=सुँप् के परे न होने के कारण नकार को रेफ आदेश हो—अहरहन् । दूसरे में भी लुक् होने से असुँप् होने कारण रोऽसुपि सूत्र से नकार को रेफ तथा अवसान में उसे विसर्ग आदेश करने पर— 'अहरहः' प्रयोग सिद्ध होता है । दूसरा उदाहरण—अहन्+गण = अहर्+गण = अहर्गणः (दिनों का समूह; अह्नां गणः= अहर्गणः, षष्ठीतत्पुरुषसमासः ।) 'अहन्+आम् गण+सुँ' इस अलौकिक- विग्रह में विभक्तियों का लुक् हो—अहन्+गण । अब यहां न लुमताङ्गस्य (१६१) से प्रत्ययलक्षण के निषेध होने से आम् = सुँप् के परे न होने के कारण नकार को रेफ आदेश हो—अहर्गण । विभक्ति लाने से—'अहर्गणः' प्रयोग सिद्ध होता है । यह सूत्र अहन् (३६३; पदान्त में अहन् के नकार को रुँ आदेश हो) सूत्र का अपवाद है; अर्थात् उस सूत्र से रुँ प्राप्त होने पर इस सूत्र से रेफ आदेश विधान


१. पृ पालनपूरणयोः (जुहो०) इति धातोर्लङि प्रथमपुरुषैकवचनमिदम् । २. यहां रुँ को य् हो कर उस का वैकल्पिक लोप होगा ।

किया जाता है। यदि रुँ आदेश होता तो 'अहरह' में अतो रोरप्लुतादप्लुते (१०६) सूत्र द्वारा तथा अहर्गण' में हशि च (१०७) सूत्र द्वारा उत्व हो कर अनिष्ट रूप बन जाता। अत रेफ आदेश करने से उत्व न होगा। इस कारण 'अहरहरत्र, अहरहर्दीप्ति, अहरहर्गच्छति' इत्यादि प्रयोग बनेंगे, 'अहोऽहोऽत्र' आदि नही। यही रुँत्व न वह कर रेफ आदेश करने का प्रयोजन है। शङ्का—आप ने रोऽसुपि सूत्र को अहन् (३६३) सूत्र का अपवाद माना है, परन्तु यह उचित प्रतीत नही होना, क्योकि अपवाद के विषय मे उत्सर्ग की प्राप्ति अवश्य हुआ करती है परन्तु यहा रोऽसुपि के उदाहरणा मे अहन् (३६३) सूत्र प्राप्त नही हो सकता। तथाहि रोऽसुपि सूत्र क 'अहन् + अहन्, अहन् + गण' इत्यादि उदाहरण है। इन मे सुँप् का लुक् होने स न लुमताङ्गस्य (१६१) द्वारा प्रत्ययलक्षण न हो सकने के कारण पदसञ्ज्ञा न हो सकेगी। पदसञ्ज्ञा न हो सकने से अहन् (३६३) सूत्र प्राप्त नही हो सकेगा। अत प्रतीत होता है कि यह सूत्र अहन् (३६३) का अपवाद नही किन्तु स्वतन्त्रतया रेफ आदेश विधान करने वाला है। समाधान—आप को न लुमताङ्गस्य (१६१) सूत्र के अर्थ में भ्रान्ति हो गई है। उस का अय है— लुक्, श्लु, लुप शब्दा से प्रत्यय का अदर्शन करने पर उस को मान कर अङ्ग के स्थान पर कार्य नही होते' यहा स्पष्ट अङ्ग को कार्य करने का निषेध है। पदसञ्ज्ञा अङ्ग काय नही, क्योकि वह अङ्ग और प्रत्यय दोनो को मिला कर की जाती है। अत लुक् आदि शब्दों द्वारा सुँप् प्रत्यय का लुक् हो जाने पर भी पदसञ्ज्ञा सिद्ध हो जाती है और उसके हो जाने से तदाश्रित कार्य भी बेरोकटोक प्राप्त होते हैं। यथा— 'राजपुरुष' यहा ङस् का लुक् होने पर पदसञ्ज्ञा हो जाने के कारण न लोपः प्राति- पदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से पद के अन्त वाले नकार का लोप सिद्ध हो जाता है। इसी प्रकार अहरह, अहर्गण' आदिया में सुँप् का लुक् हो जाने पर भी पदसञ्ज्ञा होती थी और उस के होने से अहन् (३६३) सूत्र द्वारा रुँत्व प्राप्त था। उम के प्राप्त होने पर यह रोऽसुपि सूत्र बनाया गया है, अत यह उस का अपवाद है। इस के प्रवृत्त होने मे न लुमताङ्गस्य (१६१) सूत्र स सुँप् का अभाव हो जाता है क्योकि यह अङ्ग के स्थान पर रेफ आदेश करता है। 'असुंपि' यहा प्रसज्यप्रतिषेध है। अत सुँप् परे न हो, और चाहे जो हो, यह सूत्र प्रवृत्त होगा। यदि यहा पर्युदास-प्रतिषेध मानें तो सुँप् से भिन्न तत्सदृश अर्थात् प्रत्यय परे होने पर ही यह सूत्र प्रवृत्त हो सकेगा, 'अहर्भाति, अहरह, अहर्गण' इत्यादि स्थानो पर जहा प्रत्यय परे नही प्रवृत्त न हो सकेगा, केवल 'अहर्वान्' इत्यादि स्थानो पर ही प्रवृत्त होगा। अत यहा पर्युदास प्रतिषेध मानना उचित नही, प्रसज्यप्रतिषेध मानना ही युक्त है। सुँप् का निषेध इस लिये किया गया है कि 'अहोभ्याम्, अहोभि' इत्यादि स्थानो पर रेफ न हो कर अहन् (३६३) से रुँत्व हो जाये। यदि यहा रेफ आदेश होता तो 'अहा रम्यम्' की तरह हशि च (१०७) से उत्व न हो सकता और उम के न होने मे गुण भी न हो पाता।

विसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् १५१ इस सूत्र के अन्य उदाहरण यथा—‘अहरिदम्, अहरिदानीम्, अहरत्र, अहरदः, अहर्भाति, अहर्गच्छति’ प्रभृति जान लेने चाहियें। विशेष—इस सूत्र पर एक अपवाद वार्त्तिक है—वा०—रूपरात्रिरथन्तरेषु रुत्वं वाच्यम्। अर्थात् रूप रात्रि और रथन्तर शब्दों के परे होने पर अहन् के नकार को रुँ आदेश हो। अहोरूपम्, गतमहो रात्रिरेषा, अहोरथन्तरम्। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१११) रो रि।८।३।१४॥ रेफस्य रेफे परे लोपः ॥ अर्थः—रेफ का रेफ परे होने पर लोप होता है। व्याख्या—रः ।६।१। रि ।७।१। लोपः ।१।१। (ढो ढे लोपः से) अर्थः—(रः) रेफ का (रि) रेफ परे होने पर (लोपः) लोप हो जाता है। इसी प्रकार का एक सूत्र—ढो ढे लोपः (५५०) है। इस का अर्थ—(ढः।६।१) ढ् का (ढे ।७।१) ढ् परे होने पर (लोपः।१।१) लोप हो जाता है। इन दोनों सूत्रों का उपयोग अग्रिम सूत्र के उदाहरणों में किया जायेगा। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(११२) ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः।६।३।११०॥ ढरेफयोर्लोपनिमित्तयोः पूर्वस्याणो दीर्घः स्यात्। पुना रमते। हरी रम्यः। शम्भू राजते। अणः किम्? तृढः। वृढः ॥ अर्थः—ढकार और रेफ के लोप में निमित्तभूत जो ढकार और रेफ उन के परे होने पर पूर्व अण् के स्थान पर दीर्घ हो जाता है। व्याख्या—ढ्रलोपे ।७।१। पूर्वस्य ।६।१। अणः ।६।१। दीर्घः ।१।१। समासः— ढ् च रश्च = ढ्रौ, इतरेतरद्वन्द्वः। रेफादकार उच्चारणार्थः। ढ्रौ लोपयतीति ढ्रलोपः, ण्यन्तात् कर्मण्युपपदेऽण्प्रत्ययः। ढकार और रेफ का लोप करने वाले इस व्याकरण में ढो ढे लोपः (५५०) तथा रो रि (१११) में क्रमशः ढकार और रेफ ही है। अर्थः—(ढ्रलोपे) ढकार और रेफ का लोप करने वाले अर्थात् ढ् वा र् के परे होने पर (पूर्वस्य) पूर्व (अणः) अ, इ, उ वर्णों के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ हो जाता है। तात्पर्य यह है कि जब ढकार के परे रहते ढकार का लोप हो जाये अथवा रेफ के परे रहते रेफ का लोप हो जाये तो पूर्व अण् (अ, इ, उ) को दीर्घ हो जाता है। उदाहरण यथा— (१) 'पुनर्+रमते' (फिर खेलता है) यहां 'रमते' के आदि रेफ को मान कर 'पुनर्' के रेफ का रो रि (१११) सूत्र से लोप हो जाता है। पुनः इस रेफलोप में निमित्त 'रमते' वाले रेफ के परे होने पर नकारोत्तर अकार = अण् को दीर्घ हो कर—'पुना रमते' प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार— (२) 'हरिस्+रम्यः' (हरि सुन्दर है) यहां ससजुषो रुः (१०५) से पदान्त सकार को रुँ आदेश हो उकार इत् के चले जाने पर—हरिर्+रम्यः। अब रो रि (१११) से रेफ का लोप तथा ढ्रलोपे० (११२) से पूर्व अण् (इ) को दीर्घ करने से—'हरी रम्यः' प्रयोग सिद्ध होता है।

१५२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां (३) 'शम्भुस् + राजत' (शिवजी शोभित होते हैं) यहा भी पूर्ववत् पदान्त सकार को रुँत्व, रो रि (१११) स रेफलोप तथा ढूलोपे० (११२) से पूर्व अण्(उ) को दीर्घ करने स - शम्भू राजते' प्रयोग सिद्ध होता है । इस सूत्र के कुछ अन्य उदाहरण यथा— १ अहा रम्यम् । २ ना रम्य (नर् + रम्य', नृशब्दस्य सबोधने) । ३. अन्ता- राष्ट्रिय । ४ सवितू रश्मय । ५ नीरक् । ६. लीढाम् (लिह् + ढाम्; वह चाटे) । ७ भूपती रक्षति । ८ फेरू रोति । ६ नीरस । १० दाशरथी राम । इत्यादि । इस सूत्र मे अण् प्रत्याहार पीछे (११) सूत्र पर कह अनुसार पूर्व णकार (अ इ उ ण्)स ही लिया जायेगा, इस स 'तृढ' (मारा गया), 'वृढ' (तैयार, उद्यत) यहा पूर्व ऋकार का दीर्घ न होगा । तथाहि—'तृद्+ढ, वृद्+ढ' यहा ढो ढे लोप. (५५०] सूत्र स ढकार का लाप हो कर—'तृढ, वृढ' प्रयोग सिद्ध होते हैं। ढलोप का उदाहरण मूल म नही दिया गया, इस मे—लिह् + ढ = लि + ढ = 'लीढ' प्रभृति उदाहरण हैं । यहा 'पूर्वस्य' ग्रहण का प्रयोजन सिद्धान्त-कौमुदी मे देखना चाहिये । नोट— पुना रमते' मे 'पुनस् + रमते' यह छेद अशुद्ध है, क्योकि 'पुनर्'—यह रेफान्त अव्यय है, सकारान्त नहीं । वैसा होने पर 'मनोरथ.' की तरह 'पुनो रमते' बन जाता । हरिम् + रम्य, शम्भुस् + राजत' ये छेद तो शुद्ध है, लकारपूर्व न होने स इन म हशि च (१०७) प्राप्त नही। [लघु०] 'मनस् + रथ' इत्यत्र रुँत्वे कृते 'हशि च' (१०७) इत्युत्वे 'रो रि' (१११) इति लोपे च प्राप्ते— अर्थ - 'मनस् + रथ' यहा ससजुषो रु. से सकार को रुँ किया तो हशि च से उत्व तथा रो रि म रेफ का लोप दोनों प्राप्त हुए [इस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है]। व्याख्या - यहा उत्व और रेफ-लोप युगपत् (इकट्ठे) प्राप्त होते है । इन दोनो मे से कौन-सा हो ? इस शङ्का की निवृत्ति के लिये अग्रिम-सूत्र लिखते हैं— [लघु०] परिभाषा सूत्रम्—(११३) विप्रतिषेधे परं कार्यम् ।१।४।२।। तुल्यबलविरोघे परं कार्यं स्यात् । इति लोपे प्राप्ते 'पूर्वत्राऽसिद्धम्' (३१) इति 'रो रि' (१११) इत्यस्यासिद्धत्वादुत्त्वमेव । मनोरथ ॥ अर्थ - तुल्यबल वाला का विरोध होने पर परकार्य होता है । व्याख्या—विप्रतिषेधे ।७।१। परम्।१।१। कार्यम् ।१।१। अर्थ —(विप्रतिषेधे) विप्रतिषेध होने पर (परम्) पर (कार्यम्) कार्य होता है। अन्यत्रान्यत्रलब्धाव- काशयोरकत्र प्राप्तिस्तुल्यबलविरोध. । तुल्यबल वाले दो कार्यों के विरोध को विप्रति- षेध कहते हैं । पृथक्-पृथक् स्थानो (जहा वे परस्पर प्राप्त नही हो सकते) पर चरि- तार्थ होने वाले सूत्र तुल्यबल वाले कहलाते हैं। इन तुल्यबल वालो का यदि विरोध हो

विसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् १५३ जाये तो इन में जो अष्टाध्यायी में परे पढ़ा गया है वही प्रवृत्त होगा । यथा—हशि च सूत्र 'शिवो वन्द्यः' आदि स्थानों पर चरितार्थ हो चुका है इन स्थानों पर रो रि सूत्र प्रवृत्त नहीं हो सकता और 'रो रि' सूत्र 'हरी रम्यः' आदि स्थानों पर चरितार्थ हो चुका है इन स्थानों पर हशि च सूत्र प्राप्त नहीं हो सकता; तो इस प्रकार हशि च और रो रि तुल्यबल वाले हैं अब इन तुल्यबल वालों का 'मनर् + रथ' में विरोध उत्पन्न हो गया है । तो यहां वही कार्य होगा जो अष्टाध्यायी में परे पढ़ा गया होगा । अष्टाध्यायी में हशि च (६.१.११०) सूत्र से रो रि (८.३.१४) सूत्र परे पढ़ा गया है अतः रो रि द्वारा रेफलोप की प्राप्ति हुई । परन्तु रो रि सूत्र त्रिपादीस्थ होने के कारण हशि च की दृष्टि में असिद्ध है [देखो—पूर्वत्रासिद्धम् (३१)] अतः हशि च की दृष्टि में रो रि का अस्तित्व ही नहीं रहता, इस से हशि च से उत्व हो कर—मन+ उ+रथ । अब आद् गुणः (२७) सूत्र से गुण एकादेश कर विभक्ति लाने से—'मनो- रथः' प्रयोग सिद्ध होता है । मनसो रथः=मनोरथः (अभिलाषा) । इसी प्रकार—१. बालो रोदिति । २. राघवो रामः । ३. काको रौति । ४. भूयो रमते । ५. ईश्वरो रचयति । ६. धर्मो रक्षति । ७. देवो राजते । ८. भूभृतो रोपः । आदि । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(११४) एतत्तदोः सुँलोपोऽकोरनञ्समासे हलि ।६।१।१२८॥ अककारयोरेतत्तदोर्यः सुँस्तस्य लोपः स्याद्धलि, न तु नञ्समासे । एष विष्णुः । स शम्भुः । अकोः किम् ? एषको रुद्रः । अनञ्समासे किम् ? असः शिवः । हलि किम् ? एषोऽत्र ।। अर्थः—ककार से रहित एतद् और तद् शब्द के सुँ का हल् परे होने पर लोप हो जाता है, परन्तु नञ्समास में नहीं होता । व्याख्या—एतत्तदोः ।६।२। सुँलोपः ।१।१। अकोः ।६।२। अनञ्समासे ।७।१। हलि ।७।१। समासः—एतच्च तच्च=एतत्तदौ, तयोः=एतत्तदोः, इतरेतरद्वन्द्वः । सोर्लोपः=सुँलोपः, षष्ठीतत्पुरुषः¹ । न नञ्समासः=अनञ्समासः, तस्मिन्=अनञ्स- मासे, नञ्तत्पुरुषः । अविद्यमानः क्=ककारो ययोस्तौ=अकौ, तयोः=अकोः, बहुव्रीहि- समासः । अर्थः— (अकोः) ककाररहित (एतत्तदोः) एतद् और तद् शब्द के (सुँलोपः) सुँ का लोप होता है (हलि) हल् परे हो तो । परन्तु (अनञ्समासे) नञ्समास में नहीं होता । 'सुँ' से यहां प्रथमैकवचन अभिप्रेत है । उदाहरण यथा—एषस्+विष्णुः=एष विष्णुः (यह विष्णु है) । यहां वकार =हल् परे होने से एतद् शब्द से परे 'सुँ' प्रत्यय के सकार का लोप हो जाता है । सस्+शम्भुः=स शम्भुः । यहां शकार=हल् परे होने से तद् शब्द से परे 'सुँ' प्रत्यय के सकार का लोप हो जाता है । १. यहां 'सुँ' का सम्बन्ध 'एतत्तदोः' के साथ होने के कारण सौत्रत्वात् असमर्थ समास समझना चाहिये । अथवा 'सुँ' को लुप्तषष्ठ्यन्त पृथक् पद मानना चाहिये ।

१५४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां एतद् और तद् शब्द की टि से पूर्व जब अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक्टे (१२२६) सूत्र से अकच् प्रत्यय हो जाता है तब इन में ककार आ जाता है । तब हल् परे होने पर भी इन से परे ‘सुं’ प्रत्यय का लोप नही हुआ करता । यथा—‘एषकस् + रुद्र’ यहां सुं का लोप न हो कर ससजुषो रुं (१०५) से रुंत्व, हशि च (१०७) से उत्व तथा आद् गुण. (२७) से गुण एकादेश करने से ‘एषको रुद्र’ प्रयोग सिद्ध होता है । इसी प्रकार—सकस् + रुद्र = सको रुद्र, सकस् + शिव = सक शिव इत्यादि में हल् परे होने पर भी सुं का लोप नहीं होना, क्योकि तद् शब्द ककार से रहित नहीं है ।१ ‘अनञ्समासे’ यहां प्रसज्यप्रतिषेध है अर्थात् नञ्समास न हो और चाहे समास हो या न हो सुं का लोप हो जायेगा । यदि यहां पर्युदासप्रतिषेध मानें तो नञ्समास से भिन्न तत्सदृश अर्थात् समास का ग्रहण होने से ‘एष रुद्र, स शिव’ आदि में सुं का लोप न हो सकेगा, अतः प्रसज्यप्रतिषेध मानना ही युक्त है । नञ्समास में सुँलोप नही होता । यथा—‘अस शिव, अनेष शिव’ (न स = अस, न एष = अनेष) यहां सुँ को रुँ और रुँ को विसर्ग हो वा शरि (१०४) से विकल्प करके विसर्ग आदेश होगा । पक्ष में विसर्जनीयस्य सः (१०३) से सकार आदेश हो जायेगा— असश्शिव, अनेषश्शिव । हल् परे होने पर सुं का लोप कहा गया है इस से अच् परे होने पर सुँलोप न होगा । यथा—एषस् + अत्र = एषरुँ + अत्र = एषर् + अत्र = एषउ + अत्र = एषो

  • अत्र = एषोऽत्र । यहां अतो रोरप्लु० (१०६) से उत्व, आद् गुण (२७) से गुण तथा एडः पदान्तादति (४३) से पूर्वरूप हो जाता है । इसी प्रकार—‘सोऽत्र’ यहां भी सुँलोप न होगा । इस सूत्र के अन्य उदाहरण यथा— ह्—स हसति । एष हसति । | व्—स वकार । एष वकार । य्—स याति । एष याति । | म्—स मुह्नाति । एष मुह्नाति । व्—स वमति । एष वमति । | ड्—स डकार । एष डकार । र्—स रमते । एष रमते । | ण्—स णकार । एष णकार । ल्—स लुनाति । एष लुनाति । | न्—स नमति । एष नमति ।

१. प्रश्न—एतद् और तद् में जब अकच् प्रत्यय मध्य में आ जाता है तो एकद् और तक्द् ये भिन्न शब्द बन जाते हैं एतद् और तद् नहीं रहते । तब ‘अको’ यह निषेध व्यर्थ है । उत्तर—इसी निषेध से एक परिभाषा निकलती है—तन्मध्यपतितस्तद्ग्रहणेन गृह्यते । अकच् टि से पूर्व होता है अत ‘तन्मध्यपतित’ है इस से उसे वही शब्द माना जाता है । इसीलिये ‘उभकौ’ इस अकच् प्रत्यय में उभशब्द होने से ही द्विवचन सिद्ध हो जाता है। यदि यहां ‘क’ प्रत्यय कर दें तो वह मध्यपतित न होगा तब भिन्न शब्द माना जायेगा फिर उस में द्विवचन भी न होगा और अयच् हो जायेगा ।

विसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् १५५ भ्—स झणत्कारः । एष झणत्कारः । छ्—स छादयति । एष छादयति । भ्—स भाति । एष भाति । ठ्—स ठक्कुरः । एष ठक्कुरः । घ्—स घोप. । एष घोपः । थ्—स थूत्करोति । एष थूत्करोति । ढ्—स ढकारः । एष ढकारः । च्—स चलति । एष चलति । ध्—स धावति । एष धावति । ट्—स टिट्टिभः । एष टिट्टिभः । ज्—स जयति । एष जयति । त्—स तरति । एष तरति । व्—स वध्नाति । एष वध्नाति । क्—स करोति । एष करोति । ग्—स गच्छति । एष गच्छति । प्—स पठति । एष पठति । ड्—स ड्डिये । एष ड्डिये । श्—स शेते । एष शेते । द्—स ददाति । एष ददाति । ष्—स षण्ढः । एष षण्ढः । ख्—स खनति । एष खनति । स्—स सर्पति । एष सर्पति । फ्—स फलति । एष फलति । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(११५) सोऽचि लोपे चेत्पादपूरणम् ।६।१।१३०॥ सस् इत्यस्य सोर्लोपः स्यादचि, पादश्चेल्लोपे सत्येव पूर्य्येत । सेमाम- विड्ढि प्रभृतिम् (ऋ० २.२४ १) । सैष दाशरथी रामः ॥ अर्थः—यदि केवल लोप होने से ही पाद पूरा होता हो तो अच् परे होने पर तद् शब्द के 'सुं' का लोप हो जाता है । व्याख्या—सः ।६।१। (तद् शब्द का प्रथमा के एकवचन में 'सस्' रूप बनता है, उस का यहां अनुकरण किया गया है । इस के आगे षष्ठी के एकवचन का छन्दोवत् सूत्राणि भवन्ति इस कथन से छन्दोवत् होने के कारण सुपां सुलुक्० सूत्र से लुक् हो जाता है) । सुंलोपः ।१।१। (एतत्तदोः सुंलोपः० से) । अचि ।७।१। लोपे ।७।१। चेत् इत्यव्ययपदम् । एव इत्यप्यव्ययपदम् (स्यश्छन्दसि बहुलम् सूत्र से 'बहुलम्' की अनुवृत्ति आती है । उस से यहां 'एव' पद का ही ग्रहण किया जाता है) । अर्थः—(सः) 'सस्' के (सुंलोपः) सुं का लोप हो जाता है (अचि) अच् परे होने पर (चेत्) यदि (लोपे) लोप होने पर (एव) ही (पाद-पूरणम्) पादपूर्त्ति होती हो तो । श्लोक आदि के एक विशेष भाग को छन्दःशास्त्र में 'पाद' कहते हैं; उसी का यहां ग्रहण समझना चाहिये । उदाहरण यथा— सेमामविङ्ढि प्रभृतिं य ईशिषे ऽया विधेम नवया महा गिरा । यथा नो मीढ्वान्त्स्तवते सखा तव वृहस्पते सीषधः सोत नो मतिम् ॥ यह ऋग्वेद के द्वितीय मण्डल के चौबीसवें सूक्त का प्रथम मन्त्र है । यहां वैदिक जगती छन्द है । जगती छन्द के प्रत्येक पाद में बारह १२ अक्षर होते हैं । सेमाम- विङ्ढि प्रभृति य ईशिषे यह जगती छन्द का एक पाद है । इस में 'सस् + इमाम्' इस अवस्था में सकार का लोप हो कर गुण हो जाने से बारह अक्षरों का पाद पूरा हो जाता है । यदि यहां इस सूत्र से सकार का लोप न करते तो सकार को रुँ, रुँ को

१५६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां य् (१०८) और य् का वैकल्पिक लोप (३०) हो—'स इमामविद्धि प्रभृति य ईशिषे' इस प्रकार तेरह अक्षरों वाला पाद हो जाता, क्योंकि यकारलोप के असिद्ध होने से गुण प्राप्त नहीं हो सकता था । अब यहां इस सूत्र द्वारा विहित सकारलोप के त्रैपादिक न होने के कारण सिद्ध होने से गुण के निर्बाध हो जाने के कारण बारह अक्षर पूरे हो जाते हैं कोई दोष नहीं आता । द्वितीय उदाहरण यथा— सैष दाशरथी' रामः, सैष राजा युधिष्ठिरः । सैष कर्णो महात्यागी, सैष भीमो महाबलः ॥ [ये वे भगवान् दशरथनन्दन श्रीराम हैं। ये वे राजा युधिष्ठिर हैं। ये वे महादानी कर्ण हैं । ये वे महाबली भीम हैं।] यह 'अनुष्टुम्' (पद्यावक्त्र) छन्द है। अनुष्टुभ् छन्द के चार पाद और प्रत्येक पाद में आठ २ अक्षर होते हैं। इन सब पादों में 'सस् + एष' यहां प्रकृत सूत्र से स् का लोप हो वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि करने पर 'सैष' प्रयोग सिद्ध होता है । इस से आठ २ अक्षरों वाले सब पाद पूरे हो जाते हैं। यदि यहां इस सूत्र से स् का लोप न करते तो सकार को रुँ, रुँ को य् और य् का वैकल्पिक लोप हो कर त्रैपादिकतामूलक असन्धि होने से—'स एष' या 'सयेष' इस प्रकार रूप हो जाते । इस से प्रत्येक पाद में नौ २ अक्षर हो कर छन्दोभङ्ग हो जाता । अतः यहां पादपूर्ति का—सिवाय इस के कि स् का सिद्ध लोप किया जाये, अन्य कोई उपाय नहीं, इसलिये स् का लोप किया गया है । 'बहुलम्' की अनुवृत्ति से 'एव' इसलिये ग्रहण किया गया है कि यदि किसी अन्य उपाय से पाद पूरा हो सकता हो तो स् का लोप न हो । किन्तु जब पादपूर्ति का अन्य कोई उपाय न सूझता हो तब लोप करना चाहिये । यथा— सोऽहमाजन्मशुद्धानाम्, आफलोदयकर्मणाम् । आसमुद्रक्षितीशानाम्, आनाकरथवर्त्मनाम् ॥ (रघु० १ ५) यहां 'सस्+ अहम्' में सकार का लोप करने पर 'साहम्' बन जाने से पाद की पूर्ति हो जाती है। परन्तु यह पादपूर्ति अतो रोरप्लुतादप्लुते (१०६) द्वारा उत्व कर गुण और पूर्वरूप करने पर भी हो सकती है। अतः यहां स् का लोप न कर उत्व आदि ही करेंगे। आचार्य वामन इस सूत्र के 'पाद' शब्द से ऋग्वेद के पाद का ही ग्रहण करते हैं। उन का कथन है कि यदि ऋग्वेद के पाद की पूर्ति होती होगी तो सकार का लोप हो जायेगा। परन्तु सूत्र में किसी विशेष स्थान के पाद का उल्लेख न होने से सर्वत्र लोक अथवा वेद में इस की प्रवृत्ति होती है—ऐसा अन्य लोग मानते हैं । ग्रन्थकार ने दोनों मत दिखाने के लिये दोनों उदाहरण दे दिये हैं। [लघु०] इति विसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् ॥ अर्थः—यहां विसर्ग-सन्धि का प्रकरण समाप्त होता है । १. अत्र रो रि (१११) इति रेफलोपे ढ्रलोपे० (११२) इति पूर्वस्याणो दीर्घः ।

विसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् १५७ व्याख्या—तनिक ध्यान देने से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह सम्पूर्ण प्रकरण विसर्गसन्धि का नहीं है। अतो रोरप्लुतादप्लुते (१०६), हशि च (१०७), रोऽसुपि (११०), एतत्तदोः० (११४) आदि सूत्रों का—अवसान अथवा खर् परक न होने से विसर्गों के साथ कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। किञ्च यदि इस सम्पूर्ण प्रकरण को विसर्ग- सन्धिप्रकरण मानें तो पञ्चसन्धिप्रकरण यह कथन असङ्गत हो जाता है क्योंकि तब चार ही प्रकरण होते हैं—१ अच्सन्धि-प्रकरण। २ प्रकृतिभाव-प्रकरण। ३ हल्सन्धि- प्रकरण। ४ विसर्गसन्धि-प्रकरण। अतः हमारे विचार में यहां दो प्रकरण ही होने चाहियें। वा शरि (१०४) तक विसर्गसन्धि-प्रकरण और इस से आगे स्वादिसन्धि- प्रकरण। वा शरि (१०४) सूत्र से आगे जितने सूत्र कहे गये हैं उन सब का सुँ आदि प्रत्ययों के साथ सम्बन्ध है अतः आगे 'स्वादिसन्धि-प्रकरण' कहना ही अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। 'सिद्धान्त-कौमुदी' में ऐसा किया भी गया है। इस प्रकार पञ्च- सन्धि-प्रकरण भी ठीक हो जाते हैं। प्रतीत होता है कि लिपिकरों की भूल से यहां दो प्रकरणों का एक प्रकरण कर दिया गया है। [लघु०] समाप्तञ्चेदं पञ्च-सन्धि-प्रकरणम् ॥ अर्थः—यहां पञ्चसन्धिप्रकरण समाप्त होता है। व्याख्या—(१) अच्सन्धि-प्रकरण, (२) प्रकृतिभाव-प्रकरण, (३) हल्सन्धि- प्रकरण, (४) विसर्गसन्धि-प्रकरण, (५) स्वादिसन्धि-प्रकरण ये पञ्च सन्धि प्रकरण हैं। यहां कई लोग प्रकृतिभावप्रकरण को सन्धिप्रकरण नहीं मानते। उन का कथन है कि 'हरी एतौ' आदि में प्रकृतिभाव अर्थात् सन्धि का अभाव ही विधान किया गया है किसी सन्धि का विधान नहीं; अतः प्रकृतिभावप्रकरण को सन्धिप्रकरण में गिनना भूल है। 'पञ्च-सन्धि-प्रकरणम्' इस की सङ्गति लगाने के लिये वे अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः (७६), वा पदान्तस्य (८०) द्वारा विधान की गई एक अनुस्वार-सन्धि की कल्पना करते हैं। परन्तु हमारी सम्मति में 'प्रकृतिभावप्रकरण' के अन्दर मय उञो वो वा (५८), इकोऽसवर्णे० (५६), ऋत्यकः (६१) आदि सन्धि करने वाले सूत्र पाए जाते हैं; अतः प्रकृतिभावप्रकरण भी एक प्रकार का सन्धिप्रकरण ही है। नवीन अनुस्वारसन्धि की कल्पना करना ग्रन्थकार के आशय से विपरीत जान पड़ता है। आगे विद्वज्जन स्वयं युक्तायुक्त का विचार कर लें। अभ्यास (२५) (१) तुल्यवलविरोध किसे कहते हैं ? उदाहरण दे कर समन्वय करें । (२) रोऽसुंपि सूत्र किस का और कैसे अपवाद है ? (३) सोऽचि लोपे० सूत्र में 'एव' पद लाने की क्या आवश्यकता है ? (४) पञ्च सन्धिप्रकरण कौन से हैं ? क्या प्रकृतिभावप्रकरण भी सन्धि- प्रकरण है ?

१५८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (५) एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि सूत्र में 'अनञ्समासे' यहां कौन सा प्रतिषेध है ? और ऐसा क्यों माना जाता है ? (६) (क) 'एषकस् + शिव' यहां सुँलोप क्यों न हो ? (ख) 'तृढ' यहां पूर्व अण् को दीर्घ क्यों न हो ? (ग) 'मनोरथ' यहां रेफ का लोप क्यों न हो ? (घ) 'अजर्या' यहां सन्धिविच्छेद करें । (ङ) रोऽसुपि में 'असुपि' क्यों कहा है ? (७) सुँ का लुक् हो कर पदसंज्ञा करने में प्रत्ययलक्षण प्रवृत्त हो जाता है परन्तु लुक् हुए सुँ को मानने में वह प्रवृत्त नहीं होता—इस की सोदाहरण मीमांसा करें । (८) रो रि सूत्र का ऐसा उदाहरण बताएं जहां पूर्व अण् को दीर्घ न होता हो ? [ भानो रश्मय, नरपते रिपु ] (६) 'अहर्गण' में रूँ आदेश प्राप्त था पुनः रेफ आदेश क्यों विधान किया गया है ? (१०) निम्नस्थ रूपों को सप्रमाण शुद्ध करें— १ प्रातोऽत्र । २ पुन्रो रविष्वदति । ३ एषो गच्छामि । ४ अहो रम्यम् । ५ सो रोदिति । ६ अनेष राम । ७ अजागोऽसौ । ८. सश्शान्ति । ९ साहमाजन्मशुद्धानाम् । १०. एषो दुःखप्रदो काल । —————— इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु- सिद्धान्त-कौमुद्यां पञ्चसन्धि- प्रकरणं समाप्तम् ॥

अथ षड्लिङ्ग्यामजन्त-पुँल्लिङ्ग-प्रकरणम्

सन्धिप्रकरण सर्वप्रकरणोपयोगी होने के कारण सर्वप्रथम व्याख्यात किया गया। अब व्याकरणशास्त्र का मुख्य कार्य शब्दविवेचन प्रारम्भ होता है। व्याकरण-शास्त्र में शब्द तीन प्रकार के होते हैं। १. सुंवन्त, २. तिङन्त और ३. अव्यय¹। अब सुंबन्त शब्दों का प्रकरण आरम्भ किया जाता है। जिन शब्दों के अन्त में सुँप् प्रत्यय हों उन्हें सुंबन्त शब्द कहते हैं। वे शब्द प्रथम दो प्रकार के होते हैं। १. अजन्त, २. हलन्त। जिन शब्दों के अन्त में अच् अर्थात् स्वर हों वे शब्द अजन्त तथा जिन शब्दों के अन्त में हल् अर्थात् व्यञ्जन हों वे शब्द हलन्त कहाते हैं। यथा—'राम' शब्द के अन्त में अकार = अच् है अतः यह अजन्तशब्द है और अजन्तों में भी अकारान्त अजन्त है। 'हरि' इस शब्द के अन्त में इकार = अच् है अतः यह अजन्तशब्द है और अजन्तों में भी इकारान्त अजन्त है। 'पितृ' इस शब्द के अन्त में ऋकार = अच् है अतः यह अजन्त शब्द है और अजन्तों में भी ऋकारान्त अजन्त है। 'गो' इस शब्द के अन्त में ओकार = अच् है अतः यह अजन्तशब्द है और अजन्तों में भी ओकारान्त अजन्त है। 'लिह्' इस शब्द के अन्त में हकार = हल् है अतः यह हलन्तशब्द है और हलन्तों में भी हकारान्त हलन्त है। 'राजन्' इस शब्द के अन्त में नकार = हल् है अतः यह हलन्तशब्द है और हलन्तों में भी नकारान्त हलन्त है। इस प्रकार अजन्त और हलन्त भेद से शब्द दो प्रकार के होते हैं। दो प्रकार के भी ये शब्द पुनः तीन लिङ्गों के भेद से छः प्रकार के हो जाते हैं। तथाहि—१. अजन्त-पुंल्लिङ्ग, २. अजन्त-स्त्रीलिङ्ग, ३. अजन्त-नपुंसकलिङ्ग; ४. हलन्त-पुंल्लिङ्ग, ५. हलन्त-स्त्रीलिङ्ग, ६. हलन्त- नपुंसकलिङ्ग। इन छः भेदों के कारण ही इस प्रकरण को षड्लिङ्ग-प्रकरण कहते हैं। अब क्रमप्राप्त प्रथम अजन्त-पुँल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन प्रारम्भ किया जाता है। सर्व- प्रथम सर्वोपयोगी प्रातिपदिक-सञ्ज्ञा का विधान करते हैं— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(११६) अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ॥१।२।४५॥ धातुं प्रत्ययं प्रत्ययान्तञ्च वर्जयित्वाऽर्थवच्छब्दस्वरूपं प्रातिपदिक- सञ्ज्ञं स्यात् ॥ अर्थः—धातु, प्रत्यय और प्रत्ययान्त को छोड़ कर अर्थ वाला शब्दस्वरूप प्रातिपदिक-सञ्ज्ञक होता है। व्याख्या—अर्थवत् १।१। अधातुः १।१। अप्रत्ययः १।१। प्रातिपदिकम् १।१। समासादिः—अर्थोऽस्यास्तीत्यर्थवत्, तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् (११८१) इस सूत्र से

१. यद्यपि अव्यय भी सुंवन्त ही है तथापि इन से परे सम्पूर्ण सुँप् का लुक् हो जाने से इन की उन से विशेषता है अतः ब्राह्मणवसिष्ठन्याय से पृथक् उल्लेख किया गया है।

१६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् मतुप् प्रत्यय हो कर मादुपधायाश्च मतोर्वोऽयवादिभ्य (१०६२) सूत्र से मकार को वकार हो जाता है। न धातु = अधातु, नञ्तत्पुरुष । न प्रत्यय = अप्रत्यय, नञ्तत्पुरुष । यहां प्रत्ययशब्द से प्रत्यय और प्रत्ययान्त दोनों का ग्रहण होता है। 'अर्थवत्' इस नपुंसक विशेषण के कारण 'शब्दस्वरूपम्' इस विशेष्य का अध्याहार किया जाता है, क्योंकि शब्दानुशासन (शब्द-शास्त्र) प्रस्तुत है। अर्थ — (अधातु) धातुरहित (अप्रत्यय) प्रत्यय और प्रत्ययान्त रहित (अर्थवत्) अर्थ वाला शब्दस्वरूप (प्रातिपदिकम्) प्रातिपदिक-सञ्ज्ञक होता है'। अब इस सूत्र की खण्डशः व्याख्या प्रस्तुत करते हैं— (१) जिस शब्द का कुछ न कुछ अर्थ हो वह 'प्रातिपदिक' होता है। जैसे 'राम' शब्द का अर्थ दशरथ-पुत्र है अत इस की 'प्रातिपदिक' सञ्ज्ञा हुई। यदि 'अर्थवत्' न कहते तो शब्दगत प्रत्येक अनर्थक वर्ण की भी प्रातिपदिक सञ्ज्ञा हो कर सुँ आदियों की उत्पत्ति होने लगती। (२) परन्तु वह धातु न होना चाहिए। यथा 'अहन्' यह हन् (अदा०) धातु के लँङ् लकार के प्रथमपुरुष वा मध्यमपुरुष का एकवचन है। यहां धातुमात्र ही अवशिष्ट रह गया है, प्रत्यय का लोप हो चुका है, अत इस की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा न होगी। यदि यहां प्रातिपदिकसञ्ज्ञा कर दी जाती तो नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से नकार का लोप हो कर अनिष्ट रूप बन जाता। (३) वह अर्थवाला शब्द प्रत्यय न होना चाहिये। यथा—'हरिषु, करोषि' यहां क्रमशः सुप् और सिप् प्रत्यय हुए हैं। यद्यपि ये अर्थवाले हैं तथापि इन की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा न होगी। यदि इन की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो जाये तो इन के आगे एकवचनमुत्सर्गः करिष्यते (प्रत्येक प्रातिपदिक से प्रथमा का एकवचन स्वभावतः किया जाता है) इस नियमानुसार 'सुँ' प्रत्यय की उत्पत्ति हो कर अनिष्ट हो जाये। (४) वह अर्थवाला शब्द प्रत्ययान्त भी न होना चाहिये। यथा—'हरिषु, करोषि' यहां समुदाय अर्थवाला है पर प्रत्ययान्त होने से उस की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा न १ इस सूत्र पर एक सुन्दर सुभाषित बहुत प्रसिद्ध है। इस में चार प्रश्न किये गये हैं जिन का उत्तर इस सूत्र का प्रत्येक पद है— विद्वान् कीदृग्वचो ब्रूते ? को रोगी ? कश्च नास्तिकः । कस्याश्चन्द्रं न पश्यन्ति ? सूत्रं तत्पाणिनेर्वद ॥ (१) विद्वान् किस प्रकार का वचन बोलता है ? उत्तर है—अर्थवत् । अर्थात् विद्वान् अर्थयुक्त (सार्थक) वचन बोलता है। (२) कौन (सदा) रोगी रहता है ? उत्तर है—अधातु । क्षीणवीर्य पुरुष सदा रोगी रहता है। (३) नास्तिक कौन है ? उत्तर है—अप्रत्यय । जिसे परलोक आदि पर प्रत्यय अर्थात् विश्वास नहीं वह नास्तिक है। (४) किस तिथि का चन्द्र दिखाई नहीं देता ? उत्तर है—प्रातिपदिकम् । प्रतिपदा का चन्द्र दिखाई नहीं देता।

३. सुबन्त एवं कारक प्रकरण (सप्त विभक्ति विचार व कारक-सिद्धांत)

होगी। यदि प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो जाती तो औत्सर्गिक 'सुं' हो कर अनिष्ट हो जाता। यद्यपि यहां 'घु, टि, घि' की भान्ति कोई छोटी सञ्ज्ञा भी की जा सकती थी तथापि पाणिनि ने पूर्वाचार्यों के अनुरोध से यह बड़ी सञ्ज्ञा की है। पाणिनि से पूर्ववर्त्ती आचार्य चूंकि प्रातिपदिकसञ्ज्ञा करते चले आये हैं अतः पाणिनि ने भी उन का अनुसरण किया है। पदं पदं प्रति प्रतिपदम्, तदहंत्तीति प्रातिपदिकम् । शब्दों के विषय में विद्वानों में दो मत प्रचलित हैं। १ व्युत्पत्तिपक्ष, २ अव्यु- त्पत्तिपक्ष। अव्युत्पत्तिपक्षीय विद्वानों का कथन है कि किसी वस्तु की सञ्ज्ञा अपने सञ्ज्ञी को समुदाय-शक्ति से ही जनाती है उस में अवयवार्थ की कल्पना नहीं करनी चाहिये। अर्थात् 'राम' यह सञ्ज्ञा समुदायशक्ति से ही दशरथ-पुत्र रूप सञ्ज्ञी को प्रकट करती है इसमें अवयवार्थ की कल्पना नहीं करनी चाहिये—यही अव्युत्पत्तिपक्ष है। व्युत्पत्तिपक्षीय विद्वानों का कथन है कि प्रत्येक वस्तु की सञ्ज्ञा का कोई न कोई अर्थ—जो उस के अवयवों से निष्पन्न होता है—ज़रूर हुआ करता है। यथा—'राम' शब्द में 'रम्' (भ्वा० आ०) धातु से 'घञ्' प्रत्यय हुआ है। 'रम्' का अर्थ 'खेलना' और 'घञ्' प्रत्यय अधिकरण को प्रकट करता है। रमन्ते योगिनोऽस्मिन्निति रामः । अर्थात् जिस में (योगी जन) रमण करते हैं वह 'राम' है। यही व्युत्पत्तिपक्ष है। अवयवों द्वारा शब्दों के अर्थ करने की रीति बहुत प्राचीन है। वेद में इस पक्ष का बहुत आदर किया जाता है। परन्तु लोक में व्युत्पत्ति अव्युत्पत्ति दोनों पक्ष चलते हैं। अव्युत्पत्तिपक्ष में— जिस में न कोई धातु और न कोई प्रत्यय माना जाता है— अर्थवदधातुर० (११६) सूत्र प्रातिपदिक सञ्ज्ञा करता है और व्युत्पत्तिपक्ष—जहां धातु आदि से परे कृत् या तद्धित प्रत्यय की कल्पना होती है—के लिये दूसरा प्रातिपदिक सञ्ज्ञा करने वाला सूत्र लिखते हैं— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(११७) कृत्तद्धितसमासाश्च ।१।२।४६॥ कृत्तद्धितान्तौ समासाश्च तथा [प्रातिपदिक-सञ्ज्ञकाः] स्युः ॥ अर्थः—कृदन्त, तद्धितान्त तथा समास भी पूर्ववत् प्रातिपदिकसञ्ज्ञक हों। व्याख्या—कृत्तद्धितसमासाः ।१।३। च इत्यव्ययपदम् । प्रातिपदिकानि ।१।३। (यहां पूर्व-सूत्र से आ रहे 'प्रातिपदिकम्' पद का बहुवचन में विपरिणाम हो जाता है)। समासः—कृच्च तद्धितश्च समासाश्च = कृत्तद्धितसमासाः। इतरेतरद्वन्द्वः । इस सूत्र में पूर्वसूत्र से 'अर्थवत्' पद की अनुवृत्ति होती है। कृत् और तद्धित अकेले अर्थवाले नहीं होते किन्तु जब प्रकृति (जिससे प्रत्यय किया जाता है उसे 'प्रकृति' कहते हैं। प्रत्ययात् पूर्वं क्रियत इति प्रकृतिः) से युक्त होते हैं तभी अर्थवाले होते हैं। तो इसलिये यहां कृत् से कृदन्त तथा तद्धित से तद्धितान्त लिया जायेगा। अर्थः—(कृत्तद्धित- समासाः) कृदन्त, तद्धितान्त तथा समास (च) भी (प्रातिपदिकानि) प्रातिपदिक- [सञ्ज्ञक होते हैं।] ल० प्र० (११)

१६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् अष्टाध्यायी के तृतीयाध्याय में कृदतिङ् (३०२) के अधिकार में कृत्-प्रत्यय तथा चतुर्थाध्याय के तद्धिताः (६१६) के अधिकार में तद्धित-प्रत्यय पढ़े गये हैं। जिज्ञासुओं को वे अष्टाध्यायी में देखने चाहिये। ये प्रत्यय जिस के अन्त में होंगे उस समुदाय अर्थात् इन के सहित प्रकृति की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा होगी। पूर्वसूत्र से प्रत्ययान्तों की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा करने का निषेध किया गया था, अब इस के द्वारा कृदन्तों तथा तद्धितप्रत्ययान्तों की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा की जाती है। व्युत्पत्तिपक्ष में—राम, कर्तृ, पितृ, कारक आदि कृदन्त तथा औपगव, पाणिनीय, शालीय, मालीय आदि तद्धितान्त शब्द इस के उदाहरण हैं। समास भी प्रातिपदिकसञ्ज्ञक होते हैं। यहां प्रश्न उत्पन्न होता है कि समास की तो पूर्वसूत्र से ही प्रातिपदिकसञ्ज्ञा सिद्ध है। क्योंकि न तो वह धातु है न प्रत्यय है और न प्रत्ययान्त है किन्तु अर्थवाला अवयव होता है। अतः इस की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा करने के लिये पुनः प्रयास किस लिए किया गया है? न हि, पिष्टस्य पेषणम् अर्थात् पिसे का पुनः पीसना उचित नहीं होता! इस का उत्तर वैयाकरण यह देते हैं कि यहां समासग्रहण नियम के लिये है— यदि अनेक पदों का समूह जो कि सार्थक हो, प्रातिपदिकसञ्ज्ञक किया जाये तो समास ही प्रातिपदिकसञ्ज्ञक हो अन्य समूह प्रातिपदिकसञ्ज्ञक न हो। इस नियम से यह लाभ हुआ कि 'देवदत्तो भुङ्क्ते' इत्यादि सार्थक वाक्य जो पहले अर्थवदधातुर० (११६) सूत्र से प्रातिपदिकसञ्ज्ञक होते थे अब न होंगे। इस विषय का विस्तार सिद्धान्त- कौमुदी की व्याख्या में देखना चाहिये। १ प्रश्न—यहां तद्धितान्त शब्दों की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा की गई है परन्तु कुछ तद्धित ऐसे भी हैं जो अन्त में न होकर शब्द के मध्य में या आदि में होते हैं। यथा— अव्ययसर्वनाम्नाकच् प्राक्टे (१२२६) से अकच् प्रत्यय टि से पूर्व होता है (जैसे उच्चकैः)। इसी प्रकार विभाषा सुपो बहुच् पुरस्तात् (१२२७) सूत्र से विधान किया जाने वाला बहुच् प्रत्यय, शब्द से पूर्व प्रयुक्त होता है (जैसे—ईषदूनः पटुः —बहुपटुः)। तो भला अन्त में तद्धित न होने के कारण इन शब्दों की कैसे प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो सकेगी? उत्तर—जो तद्धित-प्रत्यय शब्द के मध्य में होते हैं उन के आने से शब्द वही शब्द माना जाता है कोई अन्य नहीं हो जाता, जैसाकि कहा है—तन्मध्यपतित- स्तद्ग्रहणेन गृह्यते। अतः ऐसे शब्दों की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा उन को तद्धितान्त माने बिना भी पूर्वसूत्र से सिद्ध हो जाती है। इसी प्रकार शब्द के आदि में आने वाले बहुच् प्रत्यय के विषय में भी शब्द के अर्थवत् होने के कारण पूर्वोक्त अर्थ- वदधातु० (११६) सूत्र से ही प्रातिपदिकसञ्ज्ञा निर्बाध सिद्ध हो जाती है। २ जहां २ समास में समासान्त 'टच्' आदि प्रत्यय होते हैं, वहां २ उन समासान्त प्रत्ययों के तद्धित होने से तद्धितान्तत्वेन ही प्रातिपदिकसञ्ज्ञा सिद्ध हो जाती है।

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १६३ राजपुरुष, चित्रग्रीव, रामकृष्ण आदि समास हैं, इनकी प्रातिपदिकसञ्ज्ञा होती है। तो अब हम इन दो सूत्रों से प्रत्येक सार्थक शब्द की प्रातिपदिक-सञ्ज्ञा कर सकते हैं। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(११८) स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङेभ्याम्भ्यस्ङसिँ- भ्याम्भ्यस्ङसोसांङ्योस्सुप् ।४।१।२।। सुँ, औ, जस् इति प्रथमा। अम्, औट्, शस् इति द्वितीया। टा, भ्याम्, भिस् इति तृतीया। ङे, भ्याम्, भ्यस् इति चतुर्थी। ङसिँ, भ्याम्, भ्यस् इति पञ्चमी। ङस्, ओस्, आम् इति षष्ठी। ङि, ओस्, सुप् इति सप्तमी ॥ अर्थः—'सुँ, औ, जस्' यह प्रथमा विभक्ति; 'अम्, औट्, शस्' यह द्वितीया विभक्ति; 'टा, भ्याम्, भिस्' यह तृतीया विभक्ति; 'ङे, भ्याम्, भ्यस्' यह चतुर्थी वि- भक्ति; 'ङसिँ, भ्याम्, भ्यस्' यह पञ्चमी विभक्ति; 'ङस्, ओस्, आम्' यह षष्ठी विभक्ति; 'ङि, ओस्, सुप्' यह सप्तमी विभक्ति (ङ्यन्त, आवन्त तथा प्रातिपदिक से परे हो)। व्याख्या—स्वौजसमौट्—सुप् ।१।१। समासः—सुँश्च औश्च जश्च अम् च औट् च शश्च टाश्च भ्याञ्च भिश्च ङेश्च भ्याञ्च भ्यश्च ङसिँश्च भ्याञ्च भ्यश्च ङश्च ओश्च आम् च ङिश्च ओश्च सुप् च एषां समाहारः = स्वौजसमौट्—सुप्। इस सूत्र में सुँ, औ, जस्, अम्, औट्, शस्, टा, भ्याम्, भिस्, ङे, भ्याम्, भ्यस्, ङसिँ, भ्याम्, भ्यस्, ङस्, ओस्, आम्, ङि, ओस्, सुप् इन इक्कीस प्रत्ययों का उल्लेख है। इन को सुँप् कहा जाता है। सुँ से लेकर सुप् के प् तक सुँप् प्रत्याहार बनता है। इस सूत्र का सम्पूर्ण अर्थ तभी हो सकता है जब हमें यह ज्ञात हो कि यह सूत्र किस २ के अधिकार में पढ़ा गया है। अब उन अधिकारों को बताते हैं— [लघु०] अधिकार-सूत्रम्—(११९) ङ्याप्प्रातिपदिकात् ।४।१।१।। अधिकार-सूत्रम्—(१२०) प्रत्ययः ।३।१।१।। अधिकार-सूत्रम्—(१२१) परश्च ।३।१।२।। इत्यधिकृत्य। ङ्यन्तादावन्तात् प्रातिपदिकाच्च परे स्वादयः प्रत्ययाः स्युः ॥ अर्थः—(१) ङ्याप्प्रातिपदिकात्, (२) प्रत्ययः, (३) परश्च—इन तीन सूत्रों का अधिकार करके उपर्युक्त स्वौजसमौट्० सूत्र का यह अर्थ निष्पन्न हुआ—ङ्यन्त, आवन्त और प्रातिपदिक से परे 'सुँ' आदि इक्कीस प्रत्यय हों। व्याख्या—हम 'ग्रन्थकार' के इस सूत्रविन्यासक्रम से सहमत नहीं। हमारी सम्मति में एक तो स्वौजसमौट्० सूत्र से पूर्व इन अधिकारसूत्रों को रखना उचित था, दूसरा इन अधिकार-सूत्रों का क्रम प्रत्ययः, परश्च, ङ्याप्प्रातिपदिकात् ऐसा होना चाहिये था। स्वौजसमौट्० सूत्र इन तीन अधिकारों के अन्तर्गत है अतः पहले तीनों अधिकार दर्शाने योग्य थे। ङ्याप्प्रातिपदिकात् यह अधिकार प्रत्ययः, परश्च इन दोनों अधिकारों के अन्दर आ जाता है। अतः प्रत्ययः, परश्च सूत्र लिखने के पश्चात्

१६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ङ्याप्प्रातिपदिकात् सूत्र लिखना उचित था। हम इन सूत्रों की अपने क्रम से ही व्याख्या करेंगे। प्रत्ययः ।३।१।१। यह अष्टाध्यायी के तृतीयाध्याय के प्रथमपाद का प्रथम तथा अधिकार-सूत्र है। अष्टाध्यायी में सब से बडा यही अधिकार है। इस का अधिकार पाञ्चवें अध्याय की समाप्ति तक जाता है। तीसरे, चौथे तथा पाञ्चवें अध्याय मे जो प्रकृति से विधान किये जाए उन की प्रत्यय सञ्ज्ञा हो यह इस सूत्र का अर्थ है। जहा २ प्रकृति से प्रत्यय विधान किया जाता है वहा २ सर्वत्र प्रकृति पञ्च- म्यन्त होती है। यथा — अचो यत् (७७३)। अच ।३।१।१। यत् ।१।१।१। स्वप्नो नन् (८६१)। स्वप् ।३।१।१। नन् ।१।१। इन स्थानो पर पञ्चमी दिग्योग में होती है। इस दिग्योगपञ्चमी में यह शङ्का उत्पन्न होती है कि क्या प्रत्यय प्रकृति से परे किया जाये या प्रकृति से पूर्व ? इस शङ्का की निवृत्ति के लिये अन्य अधिकार चलाते हैं— परश्च । पर ।३।१।२। न इत्यव्ययपदम् । 'प्रत्यय' पद की पूर्वसूत्र से अनुवृत्ति आती है। अर्थ — प्रत्यय परे होता है। अर्थात् जिस से प्रत्यय विधान किया जाना है उस से प्रत्यय परे समझना चाहिये। यथा — अचो यत् (७७३) यहा अजन्त धातु से यत् प्रत्यय विधान किया गया है सो यत् प्रत्यय अजन्त धातु से परे होगा। स्वप्नो नन् (८६१) यहा स्वप् धातु से नन् प्रत्यय विधान किया गया है सो नन् प्रत्यय स्वप् धातु से परे होगा¹। इस प्रकार प्रत्यय का अधिकार और उस के स्थान का नियम कर अब अवान्तर अधिकार चलाते हैं— ङ्याप्प्रातिपदिकात् ।४।१।१। समास — ङी च आप् च प्रातिपदिकञ्च एषां समाहार = ङ्याप्प्रातिपदिकम्, तस्मात् = ङ्याप्प्रातिपदिकात् । 'ङी' यह भेदक अनु- बन्धों से रहित ग्रहण किया गया है, अतः 'ङीप्, ङीष्, ङीन्' इन सब स्त्रीप्रत्ययों का सामान्यतः ग्रहण होगा। इसी प्रकार 'आप्' यह भी भेदक अनुबन्धों से रहित होने के कारण 'टाप्, डाप्, चाप्' इन सब स्त्रीप्रत्ययों का ग्राहक होगा। यह अधिकार सूत्र है। इस का अधिकार पाञ्चवें अध्याय की समाप्ति तक जाता है। इस सूत्र मे प्रकृति बतलाई गई है। अर्थ — यहा से ले कर पाञ्चवें अध्याय की समाप्ति तक जितने प्रत्यय कहे गये हैं वे (ङ्याप्प्रातिपदिकात्) ङ्यन्त आबन्त तथा प्रातिपदिक से परे हों। इसी सूत्र के अधिकार मे स्वौजसमौट्० (११८) सूत्र पढ़ा गया है। अतः उस सूत्र का यह अर्थ हुआ—ङ्यन्त, आबन्त तथा प्रातिपदिक से परे सुं, औ, जस् आदि इक्कीस प्रत्यय हों²। १ तत्र 'राम+टा' यहा पर टा प्रत्यय टित् होने से आद्यन्तौ टकितौ (८५) से राम के आदि में न हो कर राम से परे होगा। इसी प्रकार घरेष्ट. (७६२) आदि में समझना चाहिये। २. ङीप्, ङीष्, ङीन् तथा टाप्, डाप् और चाप् प्रत्ययो का आगे स्त्रीप्रत्यय- प्रकरण मे उल्लेख आयेगा। ङ्यन्त और आबन्त प्रत्ययान्त होने से प्रातिपदिक-

अजन्त-पुँल्लिङ्ग-प्रकरणम् १६५ इन इक्कीस प्रत्ययों के सात त्रिक बनते हैं। यथा—१. सुँ, औ, जस्। २. अम्, औट्, शस्। ३. टा, भ्याम्, भिस्। ४. ङे, भ्याम्, भ्यस्। ५. ङसिँ, भ्याम्, भ्यस्। ६. ङस्, ओस्, आम्। ७. ङि, ओस्, सुप्। इन त्रिकों की क्रमशः प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी, सप्तमी ये सञ्ज्ञाएं पाणिनि से पूर्ववर्ती आचार्यों ने की हुई हैं। महामुनि पाणिनि ने भी इन सञ्ज्ञाओं का उपयोग अपने ग्रन्थ में किया है (देखें कारकप्रकरण)। अब इन विधान किये हुए इक्कीस प्रत्ययों की व्यवस्था करते हैं— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्— (१२२) सुपः ।१।४।१०२॥ सुपस्त्रीणि त्रीणि वचनान्येकश एकवचन-द्विवचन-बहुवचनसञ्ज्ञानि स्युः ॥ अर्थः—सुँप् का प्रत्येक त्रिक ‘एकवचन, द्विवचन, बहुवचन’ सञ्ज्ञक हो। व्याख्या – सुपः ।६।१। त्रीणि ।१।३। त्रीणि ।१।३। (तिङस्त्रीणि त्रीणि० से)। एकशः इत्यव्ययपदम्। एकवचन-द्विवचन-बहुवचनानि ।१।३। (तान्येकवचनद्विवचनबहु- वचनान्येकशः से)। अर्थः—(सुपः) सुँप् के जो (त्रीणि त्रीणि) तीन २ वचन, वह (एकशः) प्रत्येक (एकवचन-द्विवचन-बहुवचनानि) ‘एकवचन-द्विवचन-बहुवचन’ सञ्ज्ञक हो। सुँप् प्रत्याहार के सात त्रिक अर्थात् तीन २ वचन होते हैं। ये सातों ‘एकवचन- द्विवचन-बहुवचन’ सञ्ज्ञक होते हैं। यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) के अनुसार प्रत्येक त्रिक के अन्तर्गत तीन वचन क्रमशः एकवचन, द्विवचन, बहुवचन सञ्ज्ञक हो जाते हैं। यथा –

त्रिकसंख्याविभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
पहला त्रिकप्रथमासुँ (स्)जस् (अस्)
दूसरा त्रिकद्वितीयाअम्औट् (औ)शस् (अस्)
तीसरा त्रिकतृतीयाटा (आ)भ्याम्भिस्
चौथा त्रिकचतुर्थीङे (ए)भ्याम्भ्यस्
पांचवां त्रिकपञ्चमीङसिँ (अस्)भ्याम्भ्यस्
छठा त्रिकषष्ठीङस् (अस्)ओस्आम्
सातवां त्रिकसप्तमीङि (इ)ओस्सुप् (सु)

संज्ञक न होते थे अतः केवल 'प्रातिपदिकात्' कहने से इन से परे सुँ आदि प्रत्ययों की उत्पत्ति सम्भव न थी। इसीलिये प्रकृतसूत्र में इन का पृथक् उल्लेख किया गया है। [वस्तुतः प्रातिपदिकग्रहणे लिङ्गविशिष्टस्यापि ग्रहणम् परिभाषा से इन का ग्रहण भी हो सकता है अत एव पङ्गु, श्वश्रू आदि ऊङ्प्रत्ययान्त शब्दों से स्वादियों की उत्पत्ति में कोई बाधा उपस्थित नहीं होती। इन का सूत्र में उल्लेख इसलिये किया गया है कि तद्धित की उत्पत्ति ङ्यन्त, आवन्त से परे ही हो इन से पूर्व प्रातिपदिक से नहीं। इसका विशेष स्पष्टीकरण सिद्धान्तकौमुदी की टीकाओं में इस स्थल पर देखें।]

१६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

ध्यान रहे कि प्रत्येक त्रिक को 'एकवचन + द्विवचन + बहुवचन' ये तीन संज्ञाएं मिलती हैं। इन को वह अपने अन्तर्गत तीन प्रत्ययों में बांट देता है। यथा--'सुँ, औ, जस्' यह एक त्रिक है, इसे 'एकवचन, द्विवचन, बहुवचन' ये तीन संज्ञाएं प्राप्त होती हैं। यह त्रिक इन तीन संज्ञाओं को अपने अन्तर्गत तीन प्रत्ययों को क्रमशः दे देता है, इस से 'सुँ' यह एकवचन, 'औ' यह द्विवचन, 'जस्' यह बहुवचन हो जाता है। इसी प्रकार अन्य छ त्रिकों में भी जान लेना चाहिये। अब यह बतलाते हैं कि कहां एकवचन और कहां द्विवचन प्रयुक्त होता है [बहुवचन के विषय में भी थोड़ी दूर आगे चल कर कहेंगे]। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१२३) द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने ।१।४।२२॥ द्वित्वैकत्वयोरेते स्तः ॥ अर्थः—द्वित्व और एकत्व की विवक्षा (कहने की इच्छा) होने पर क्रमशः द्विवचनप्रत्यय और एकवचनप्रत्यय होता है। व्याख्या—द्व्येकयोः ।७।२। द्विवचनैकवचने ।१।२। द्विवचनञ्च एकवचनञ्च द्विवचनैकवचने, इतरेतरद्वन्द्वः । 'द्व्येकयोः' यहां 'द्वौ च एकश्च, तेषु = द्व्येकेषु' ऐसा बहुवचन होना चाहिये था, परन्तु मुनि ने ऐसा न कर 'द्व्येकयोः' में द्विवचन ही किया है। उन के ऐसा करने का अभिप्राय यह है कि 'द्वि' शब्द से दो पदार्थ और 'एक' शब्द से एक पदार्थ ऐसा अर्थ ग्रहण न किया जाये किन्तु 'द्वि' शब्द से दो की सङ्ख्या अर्थात् द्वित्व और 'एक' शब्द से एक की सङ्ख्या अर्थात् एकत्व का ग्रहण हो । भाव यह है कि लोक में द्वि और एक शब्द सङ्ख्येयवाची ही प्रसिद्ध हैं सङ्ख्यावाची नहीं१। अर्थात् 'द्वि' शब्द से लोक में दो पदार्थ और 'एक' शब्द से एक पदार्थ ही लिया जाता है न कि दो और एक की सङ्ख्या। दो पदार्थों में द्विवचन और एक पदार्थ में एक- वचन हो—यह अर्थ सुसङ्गत नहीं होता । अतः मुनि ने 'द्व्येकयोः' कह कर द्वि और एक शब्द को सङ्ख्यावाची के रूप में प्रयुक्त किया है। इस से अब यह सुसङ्गत अर्थ हो जाता है—(द्व्येकयोः) दो सङ्ख्या अर्थात् द्वित्व और एक सङ्ख्या अर्थात् एकत्व विवक्षित होने पर क्रमशः (द्विवचनैकवचने) द्विवचन और एकवचन प्रत्यय हों। किस २ अर्थ में कौन २ सा त्रिक हो ? यह कारकप्रकरण का विषय है। अतः प्रथम कारकप्रकरणानुसार त्रिक का निर्णय कर चुकने के बाद पुनः इस सूत्र से वचन- निर्णय करना चाहिये। यदि हमें एकत्व की विवक्षा होगी तो हम एकवचन और यदि द्वित्व की विवक्षा होगी तो द्विवचन करेंगे। यह इस सूत्र का सार है।


१. एक, द्वि से ले कर नवदशन् शब्द तक सब शब्द सङ्ख्येयवाची होते हैं अतः पदार्थों के साथ इन का सामानाधिकरण्य होता है। यथा—एको वातः, द्वौ पुरुषौ इत्यादि । विंशति आदि शब्द सङ्ख्या और सङ्ख्येय दोनों प्रकार के वाचक होते हैं। यथा—'गवां विंशतिः, ब्राह्मणानामेकोनविंशतिः' इत्यादियों में सङ्ख्या- वाची हैं। 'गावो विंशतिः, ब्राह्मणा एकोनविंशतिः' इत्यादियों में सङ्ख्येयवाची हैं। इस पर विशेष टिप्पण इस व्याख्या के कृदन्तप्रकरण में (८१८) सूत्र पर देखें।

अजन्तपुल्लिङ्ग-प्रकरणम् १८७ अब रूपसिद्धि के लिये अवसानसञ्ज्ञा का प्रतिपादन करते हैं— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(१२४) विरामोऽवसानम् ।१।४।१०६॥ वर्णानामभावोऽवसानसञ्ज्ञः स्यात् । रुँत्व-विसर्गौ । रामः ॥ अर्थः—वर्णों का अभाव अवसान-सञ्ज्ञक हो । व्याख्या—विरामः ।१।१। अवसानम् ।१।१। 'विराम' शब्द का दो प्रकार का अर्थ होता है; पहला अधिकरण में 'घञ्' प्रत्यय मानने से और दूसरा भाव में 'घञ्' प्रत्यय स्वीकार करने से । प्रथम यथा—विरम्यतेऽस्मिन्निति = विरामः [यहां सामी- पिक अधिकरण विवक्षित है] । उच्चारण का ठहराव जिस के पास किया जाता है उसे 'विराम' कहते हैं । उच्चारण का ठहराव अन्तिमवर्ण के पास किया जाता है अतः इस पक्ष में अन्तिमवर्ण 'विराम' होता है । द्वितीय यथा—विरमणं विरामः, भावे घञ् । उच्चारण का न होना 'विराम' होता है । अर्थात् किसी वर्ण से परे उच्चारण का न होना 'विराम' कहाता है । इस पक्ष में अन्तिम वर्ण से आगे उच्चारण के अभाव की अवसानसञ्ज्ञा होती है। यही पक्ष ग्रन्थकार ने वृत्ति में स्वीकार किया है। पर हैं दोनों ही शुद्ध । अर्थः — (विरामः) वर्णों के उच्चारण का अभाव (अवसानम्) अवसान- संज्ञक होता है । यथा—'रामर्' यहां रेफ से आगे उच्चारणाभाव है उसी की यहां अव- सान-संज्ञा है । ध्यान रहे कि पहले पक्ष में रेफ की ही अवसानसंज्ञा होगी । रामः । 'राम' इस शब्द की अव्युत्पत्तिपक्ष में अर्थवदधातुर० (११६) से तथा व्युत्पत्तिपक्ष में कृदन्त होने से कृत्तद्धितसमासाश्च (११७) से प्रातिपदिकसंज्ञा हो प्रत्ययः, परश्च, ङ्याप्प्रातिपदिकात् (१२०, १२१, ११६) इन के अधिकार में स्वौज- समौट्० (११८) सूत्र द्वारा इक्कीस प्रत्यय प्राप्त हुए । तदनन्तर सुपः (१२२) से सात त्रिकों के अन्तर्गत तीन २ वचनों की क्रमशः एकवचन, द्विवचन, बहुवचन सञ्ज्ञा हो गई । अब प्रथमा के एकत्व की विवक्षा में द्व्येकयोद्विवचनैकवचने (१२३) द्वारा राम शब्द से परे 'सुँ' प्रत्यय आ कर 'राम+सुँ' बना । उपदेश में अनुनासिक होने के कारण सकारोत्तर उकार उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) द्वारा इत्संज्ञक है अतः तस्य लोपः (३) से उस का लोप हो— रामस् । सुप्तिङन्तं पदम् (१४) से 'रामस्' इस समुदाय की पदसंज्ञा हो ससजुषो रुः (१०५) से सकार को रुँ आदेश किया तो— राम+रुँ । पुनः उकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) से इत्संज्ञा तथा तस्य लोपः (३) से लोप हो—रामर् । विरामोऽवसानम् (१२४) से रेफोत्तरवर्ती अभाव की अवसानसञ्ज्ञा हो, उस के परे होने से खरवसानयोर्विसर्जनीयः (६३) द्वारा रेफ को विसर्गादेश करने पर—'रामः' प्रयोग सिद्ध होता है । [विसर्ग के अयोगवाह होने से और अयोगवाहों का पाठ यरों में मानने से अनचि च (१८) से विसर्ग को वैकल्पिक द्वित्व भी हो जायेगा । रामः: ।] नोट—जिस पक्ष में रेफ की अवसानसञ्ज्ञा होती है उस पक्ष में खरवसानयोः० (६३) सूत्र का खर् परे होने पर रेफ को या अवसान में वर्त्तमान रेफ को विसर्गादेश हो—ऐसा अर्थ हो जाने से कोई दोष नहीं आता ।