लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् १५१ इस सूत्र के अन्य उदाहरण यथा—‘अहरिदम्, अहरिदानीम्, अहरत्र, अहरदः, अहर्भाति, अहर्गच्छति’ प्रभृति जान लेने चाहियें। विशेष—इस सूत्र पर एक अपवाद वार्त्तिक है—वा०—रूपरात्रिरथन्तरेषु रुत्वं वाच्यम्। अर्थात् रूप रात्रि और रथन्तर शब्दों के परे होने पर अहन् के नकार को रुँ आदेश हो। अहोरूपम्, गतमहो रात्रिरेषा, अहोरथन्तरम्। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१११) रो रि।८।३।१४॥ रेफस्य रेफे परे लोपः ॥ अर्थः—रेफ का रेफ परे होने पर लोप होता है। व्याख्या—रः ।६।१। रि ।७।१। लोपः ।१।१। (ढो ढे लोपः से) अर्थः—(रः) रेफ का (रि) रेफ परे होने पर (लोपः) लोप हो जाता है। इसी प्रकार का एक सूत्र—ढो ढे लोपः (५५०) है। इस का अर्थ—(ढः।६।१) ढ् का (ढे ।७।१) ढ् परे होने पर (लोपः।१।१) लोप हो जाता है। इन दोनों सूत्रों का उपयोग अग्रिम सूत्र के उदाहरणों में किया जायेगा। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(११२) ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः।६।३।११०॥ ढरेफयोर्लोपनिमित्तयोः पूर्वस्याणो दीर्घः स्यात्। पुना रमते। हरी रम्यः। शम्भू राजते। अणः किम्? तृढः। वृढः ॥ अर्थः—ढकार और रेफ के लोप में निमित्तभूत जो ढकार और रेफ उन के परे होने पर पूर्व अण् के स्थान पर दीर्घ हो जाता है। व्याख्या—ढ्रलोपे ।७।१। पूर्वस्य ।६।१। अणः ।६।१। दीर्घः ।१।१। समासः— ढ् च रश्च = ढ्रौ, इतरेतरद्वन्द्वः। रेफादकार उच्चारणार्थः। ढ्रौ लोपयतीति ढ्रलोपः, ण्यन्तात् कर्मण्युपपदेऽण्प्रत्ययः। ढकार और रेफ का लोप करने वाले इस व्याकरण में ढो ढे लोपः (५५०) तथा रो रि (१११) में क्रमशः ढकार और रेफ ही है। अर्थः—(ढ्रलोपे) ढकार और रेफ का लोप करने वाले अर्थात् ढ् वा र् के परे होने पर (पूर्वस्य) पूर्व (अणः) अ, इ, उ वर्णों के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ हो जाता है। तात्पर्य यह है कि जब ढकार के परे रहते ढकार का लोप हो जाये अथवा रेफ के परे रहते रेफ का लोप हो जाये तो पूर्व अण् (अ, इ, उ) को दीर्घ हो जाता है। उदाहरण यथा— (१) 'पुनर्+रमते' (फिर खेलता है) यहां 'रमते' के आदि रेफ को मान कर 'पुनर्' के रेफ का रो रि (१११) सूत्र से लोप हो जाता है। पुनः इस रेफलोप में निमित्त 'रमते' वाले रेफ के परे होने पर नकारोत्तर अकार = अण् को दीर्घ हो कर—'पुना रमते' प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार— (२) 'हरिस्+रम्यः' (हरि सुन्दर है) यहां ससजुषो रुः (१०५) से पदान्त सकार को रुँ आदेश हो उकार इत् के चले जाने पर—हरिर्+रम्यः। अब रो रि (१११) से रेफ का लोप तथा ढ्रलोपे० (११२) से पूर्व अण् (इ) को दीर्घ करने से—'हरी रम्यः' प्रयोग सिद्ध होता है।