लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिया जाता है। यदि रुँ आदेश होता तो 'अहरह' में अतो रोरप्लुतादप्लुते (१०६) सूत्र द्वारा तथा अहर्गण' में हशि च (१०७) सूत्र द्वारा उत्व हो कर अनिष्ट रूप बन जाता। अत रेफ आदेश करने से उत्व न होगा। इस कारण 'अहरहरत्र, अहरहर्दीप्ति, अहरहर्गच्छति' इत्यादि प्रयोग बनेंगे, 'अहोऽहोऽत्र' आदि नही। यही रुँत्व न वह कर रेफ आदेश करने का प्रयोजन है। शङ्का—आप ने रोऽसुपि सूत्र को अहन् (३६३) सूत्र का अपवाद माना है, परन्तु यह उचित प्रतीत नही होना, क्योकि अपवाद के विषय मे उत्सर्ग की प्राप्ति अवश्य हुआ करती है परन्तु यहा रोऽसुपि के उदाहरणा मे अहन् (३६३) सूत्र प्राप्त नही हो सकता। तथाहि रोऽसुपि सूत्र क 'अहन् + अहन्, अहन् + गण' इत्यादि उदाहरण है। इन मे सुँप् का लुक् होने स न लुमताङ्गस्य (१६१) द्वारा प्रत्ययलक्षण न हो सकने के कारण पदसञ्ज्ञा न हो सकेगी। पदसञ्ज्ञा न हो सकने से अहन् (३६३) सूत्र प्राप्त नही हो सकेगा। अत प्रतीत होता है कि यह सूत्र अहन् (३६३) का अपवाद नही किन्तु स्वतन्त्रतया रेफ आदेश विधान करने वाला है। समाधान—आप को न लुमताङ्गस्य (१६१) सूत्र के अर्थ में भ्रान्ति हो गई है। उस का अय है— लुक्, श्लु, लुप शब्दा से प्रत्यय का अदर्शन करने पर उस को मान कर अङ्ग के स्थान पर कार्य नही होते' यहा स्पष्ट अङ्ग को कार्य करने का निषेध है। पदसञ्ज्ञा अङ्ग काय नही, क्योकि वह अङ्ग और प्रत्यय दोनो को मिला कर की जाती है। अत लुक् आदि शब्दों द्वारा सुँप् प्रत्यय का लुक् हो जाने पर भी पदसञ्ज्ञा सिद्ध हो जाती है और उसके हो जाने से तदाश्रित कार्य भी बेरोकटोक प्राप्त होते हैं। यथा— 'राजपुरुष' यहा ङस् का लुक् होने पर पदसञ्ज्ञा हो जाने के कारण न लोपः प्राति- पदिकान्तस्य (१८०) सूत्र से पद के अन्त वाले नकार का लोप सिद्ध हो जाता है। इसी प्रकार अहरह, अहर्गण' आदिया में सुँप् का लुक् हो जाने पर भी पदसञ्ज्ञा होती थी और उस के होने से अहन् (३६३) सूत्र द्वारा रुँत्व प्राप्त था। उम के प्राप्त होने पर यह रोऽसुपि सूत्र बनाया गया है, अत यह उस का अपवाद है। इस के प्रवृत्त होने मे न लुमताङ्गस्य (१६१) सूत्र स सुँप् का अभाव हो जाता है क्योकि यह अङ्ग के स्थान पर रेफ आदेश करता है। 'असुंपि' यहा प्रसज्यप्रतिषेध है। अत सुँप् परे न हो, और चाहे जो हो, यह सूत्र प्रवृत्त होगा। यदि यहा पर्युदास-प्रतिषेध मानें तो सुँप् से भिन्न तत्सदृश अर्थात् प्रत्यय परे होने पर ही यह सूत्र प्रवृत्त हो सकेगा, 'अहर्भाति, अहरह, अहर्गण' इत्यादि स्थानो पर जहा प्रत्यय परे नही प्रवृत्त न हो सकेगा, केवल 'अहर्वान्' इत्यादि स्थानो पर ही प्रवृत्त होगा। अत यहा पर्युदास प्रतिषेध मानना उचित नही, प्रसज्यप्रतिषेध मानना ही युक्त है। सुँप् का निषेध इस लिये किया गया है कि 'अहोभ्याम्, अहोभि' इत्यादि स्थानो पर रेफ न हो कर अहन् (३६३) से रुँत्व हो जाये। यदि यहा रेफ आदेश होता तो 'अहा रम्यम्' की तरह हशि च (१०७) से उत्व न हो सकता और उम के न होने मे गुण भी न हो पाता।