लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविसर्ग-सन्धि-प्रकरणम् १५३ जाये तो इन में जो अष्टाध्यायी में परे पढ़ा गया है वही प्रवृत्त होगा । यथा—हशि च सूत्र 'शिवो वन्द्यः' आदि स्थानों पर चरितार्थ हो चुका है इन स्थानों पर रो रि सूत्र प्रवृत्त नहीं हो सकता और 'रो रि' सूत्र 'हरी रम्यः' आदि स्थानों पर चरितार्थ हो चुका है इन स्थानों पर हशि च सूत्र प्राप्त नहीं हो सकता; तो इस प्रकार हशि च और रो रि तुल्यबल वाले हैं अब इन तुल्यबल वालों का 'मनर् + रथ' में विरोध उत्पन्न हो गया है । तो यहां वही कार्य होगा जो अष्टाध्यायी में परे पढ़ा गया होगा । अष्टाध्यायी में हशि च (६.१.११०) सूत्र से रो रि (८.३.१४) सूत्र परे पढ़ा गया है अतः रो रि द्वारा रेफलोप की प्राप्ति हुई । परन्तु रो रि सूत्र त्रिपादीस्थ होने के कारण हशि च की दृष्टि में असिद्ध है [देखो—पूर्वत्रासिद्धम् (३१)] अतः हशि च की दृष्टि में रो रि का अस्तित्व ही नहीं रहता, इस से हशि च से उत्व हो कर—मन+ उ+रथ । अब आद् गुणः (२७) सूत्र से गुण एकादेश कर विभक्ति लाने से—'मनो- रथः' प्रयोग सिद्ध होता है । मनसो रथः=मनोरथः (अभिलाषा) । इसी प्रकार—१. बालो रोदिति । २. राघवो रामः । ३. काको रौति । ४. भूयो रमते । ५. ईश्वरो रचयति । ६. धर्मो रक्षति । ७. देवो राजते । ८. भूभृतो रोपः । आदि । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(११४) एतत्तदोः सुँलोपोऽकोरनञ्समासे हलि ।६।१।१२८॥ अककारयोरेतत्तदोर्यः सुँस्तस्य लोपः स्याद्धलि, न तु नञ्समासे । एष विष्णुः । स शम्भुः । अकोः किम् ? एषको रुद्रः । अनञ्समासे किम् ? असः शिवः । हलि किम् ? एषोऽत्र ।। अर्थः—ककार से रहित एतद् और तद् शब्द के सुँ का हल् परे होने पर लोप हो जाता है, परन्तु नञ्समास में नहीं होता । व्याख्या—एतत्तदोः ।६।२। सुँलोपः ।१।१। अकोः ।६।२। अनञ्समासे ।७।१। हलि ।७।१। समासः—एतच्च तच्च=एतत्तदौ, तयोः=एतत्तदोः, इतरेतरद्वन्द्वः । सोर्लोपः=सुँलोपः, षष्ठीतत्पुरुषः¹ । न नञ्समासः=अनञ्समासः, तस्मिन्=अनञ्स- मासे, नञ्तत्पुरुषः । अविद्यमानः क्=ककारो ययोस्तौ=अकौ, तयोः=अकोः, बहुव्रीहि- समासः । अर्थः— (अकोः) ककाररहित (एतत्तदोः) एतद् और तद् शब्द के (सुँलोपः) सुँ का लोप होता है (हलि) हल् परे हो तो । परन्तु (अनञ्समासे) नञ्समास में नहीं होता । 'सुँ' से यहां प्रथमैकवचन अभिप्रेत है । उदाहरण यथा—एषस्+विष्णुः=एष विष्णुः (यह विष्णु है) । यहां वकार =हल् परे होने से एतद् शब्द से परे 'सुँ' प्रत्यय के सकार का लोप हो जाता है । सस्+शम्भुः=स शम्भुः । यहां शकार=हल् परे होने से तद् शब्द से परे 'सुँ' प्रत्यय के सकार का लोप हो जाता है । १. यहां 'सुँ' का सम्बन्ध 'एतत्तदोः' के साथ होने के कारण सौत्रत्वात् असमर्थ समास समझना चाहिये । अथवा 'सुँ' को लुप्तषष्ठ्यन्त पृथक् पद मानना चाहिये ।