लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां एतद् और तद् शब्द की टि से पूर्व जब अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक्टे (१२२६) सूत्र से अकच् प्रत्यय हो जाता है तब इन में ककार आ जाता है । तब हल् परे होने पर भी इन से परे ‘सुं’ प्रत्यय का लोप नही हुआ करता । यथा—‘एषकस् + रुद्र’ यहां सुं का लोप न हो कर ससजुषो रुं (१०५) से रुंत्व, हशि च (१०७) से उत्व तथा आद् गुण. (२७) से गुण एकादेश करने से ‘एषको रुद्र’ प्रयोग सिद्ध होता है । इसी प्रकार—सकस् + रुद्र = सको रुद्र, सकस् + शिव = सक शिव इत्यादि में हल् परे होने पर भी सुं का लोप नहीं होना, क्योकि तद् शब्द ककार से रहित नहीं है ।१ ‘अनञ्समासे’ यहां प्रसज्यप्रतिषेध है अर्थात् नञ्समास न हो और चाहे समास हो या न हो सुं का लोप हो जायेगा । यदि यहां पर्युदासप्रतिषेध मानें तो नञ्समास से भिन्न तत्सदृश अर्थात् समास का ग्रहण होने से ‘एष रुद्र, स शिव’ आदि में सुं का लोप न हो सकेगा, अतः प्रसज्यप्रतिषेध मानना ही युक्त है । नञ्समास में सुँलोप नही होता । यथा—‘अस शिव, अनेष शिव’ (न स = अस, न एष = अनेष) यहां सुँ को रुँ और रुँ को विसर्ग हो वा शरि (१०४) से विकल्प करके विसर्ग आदेश होगा । पक्ष में विसर्जनीयस्य सः (१०३) से सकार आदेश हो जायेगा— असश्शिव, अनेषश्शिव । हल् परे होने पर सुं का लोप कहा गया है इस से अच् परे होने पर सुँलोप न होगा । यथा—एषस् + अत्र = एषरुँ + अत्र = एषर् + अत्र = एषउ + अत्र = एषो
- अत्र = एषोऽत्र । यहां अतो रोरप्लु० (१०६) से उत्व, आद् गुण (२७) से गुण तथा एडः पदान्तादति (४३) से पूर्वरूप हो जाता है । इसी प्रकार—‘सोऽत्र’ यहां भी सुँलोप न होगा । इस सूत्र के अन्य उदाहरण यथा— ह्—स हसति । एष हसति । | व्—स वकार । एष वकार । य्—स याति । एष याति । | म्—स मुह्नाति । एष मुह्नाति । व्—स वमति । एष वमति । | ड्—स डकार । एष डकार । र्—स रमते । एष रमते । | ण्—स णकार । एष णकार । ल्—स लुनाति । एष लुनाति । | न्—स नमति । एष नमति ।
१. प्रश्न—एतद् और तद् में जब अकच् प्रत्यय मध्य में आ जाता है तो एकद् और तक्द् ये भिन्न शब्द बन जाते हैं एतद् और तद् नहीं रहते । तब ‘अको’ यह निषेध व्यर्थ है । उत्तर—इसी निषेध से एक परिभाषा निकलती है—तन्मध्यपतितस्तद्ग्रहणेन गृह्यते । अकच् टि से पूर्व होता है अत ‘तन्मध्यपतित’ है इस से उसे वही शब्द माना जाता है । इसीलिये ‘उभकौ’ इस अकच् प्रत्यय में उभशब्द होने से ही द्विवचन सिद्ध हो जाता है। यदि यहां ‘क’ प्रत्यय कर दें तो वह मध्यपतित न होगा तब भिन्न शब्द माना जायेगा फिर उस में द्विवचन भी न होगा और अयच् हो जायेगा ।