लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् अष्टाध्यायी के तृतीयाध्याय में कृदतिङ् (३०२) के अधिकार में कृत्-प्रत्यय तथा चतुर्थाध्याय के तद्धिताः (६१६) के अधिकार में तद्धित-प्रत्यय पढ़े गये हैं। जिज्ञासुओं को वे अष्टाध्यायी में देखने चाहिये। ये प्रत्यय जिस के अन्त में होंगे उस समुदाय अर्थात् इन के सहित प्रकृति की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा होगी। पूर्वसूत्र से प्रत्ययान्तों की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा करने का निषेध किया गया था, अब इस के द्वारा कृदन्तों तथा तद्धितप्रत्ययान्तों की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा की जाती है। व्युत्पत्तिपक्ष में—राम, कर्तृ, पितृ, कारक आदि कृदन्त तथा औपगव, पाणिनीय, शालीय, मालीय आदि तद्धितान्त शब्द इस के उदाहरण हैं। समास भी प्रातिपदिकसञ्ज्ञक होते हैं। यहां प्रश्न उत्पन्न होता है कि समास की तो पूर्वसूत्र से ही प्रातिपदिकसञ्ज्ञा सिद्ध है। क्योंकि न तो वह धातु है न प्रत्यय है और न प्रत्ययान्त है किन्तु अर्थवाला अवयव होता है। अतः इस की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा करने के लिये पुनः प्रयास किस लिए किया गया है? न हि, पिष्टस्य पेषणम् अर्थात् पिसे का पुनः पीसना उचित नहीं होता! इस का उत्तर वैयाकरण यह देते हैं कि यहां समासग्रहण नियम के लिये है— यदि अनेक पदों का समूह जो कि सार्थक हो, प्रातिपदिकसञ्ज्ञक किया जाये तो समास ही प्रातिपदिकसञ्ज्ञक हो अन्य समूह प्रातिपदिकसञ्ज्ञक न हो। इस नियम से यह लाभ हुआ कि 'देवदत्तो भुङ्क्ते' इत्यादि सार्थक वाक्य जो पहले अर्थवदधातुर० (११६) सूत्र से प्रातिपदिकसञ्ज्ञक होते थे अब न होंगे। इस विषय का विस्तार सिद्धान्त- कौमुदी की व्याख्या में देखना चाहिये। १ प्रश्न—यहां तद्धितान्त शब्दों की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा की गई है परन्तु कुछ तद्धित ऐसे भी हैं जो अन्त में न होकर शब्द के मध्य में या आदि में होते हैं। यथा— अव्ययसर्वनाम्नाकच् प्राक्टे (१२२६) से अकच् प्रत्यय टि से पूर्व होता है (जैसे उच्चकैः)। इसी प्रकार विभाषा सुपो बहुच् पुरस्तात् (१२२७) सूत्र से विधान किया जाने वाला बहुच् प्रत्यय, शब्द से पूर्व प्रयुक्त होता है (जैसे—ईषदूनः पटुः —बहुपटुः)। तो भला अन्त में तद्धित न होने के कारण इन शब्दों की कैसे प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो सकेगी? उत्तर—जो तद्धित-प्रत्यय शब्द के मध्य में होते हैं उन के आने से शब्द वही शब्द माना जाता है कोई अन्य नहीं हो जाता, जैसाकि कहा है—तन्मध्यपतित- स्तद्ग्रहणेन गृह्यते। अतः ऐसे शब्दों की प्रातिपदिकसञ्ज्ञा उन को तद्धितान्त माने बिना भी पूर्वसूत्र से सिद्ध हो जाती है। इसी प्रकार शब्द के आदि में आने वाले बहुच् प्रत्यय के विषय में भी शब्द के अर्थवत् होने के कारण पूर्वोक्त अर्थ- वदधातु० (११६) सूत्र से ही प्रातिपदिकसञ्ज्ञा निर्बाध सिद्ध हो जाती है। २ जहां २ समास में समासान्त 'टच्' आदि प्रत्यय होते हैं, वहां २ उन समासान्त प्रत्ययों के तद्धित होने से तद्धितान्तत्वेन ही प्रातिपदिकसञ्ज्ञा सिद्ध हो जाती है।