लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १६३ राजपुरुष, चित्रग्रीव, रामकृष्ण आदि समास हैं, इनकी प्रातिपदिकसञ्ज्ञा होती है। तो अब हम इन दो सूत्रों से प्रत्येक सार्थक शब्द की प्रातिपदिक-सञ्ज्ञा कर सकते हैं। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(११८) स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङेभ्याम्भ्यस्ङसिँ- भ्याम्भ्यस्ङसोसांङ्योस्सुप् ।४।१।२।। सुँ, औ, जस् इति प्रथमा। अम्, औट्, शस् इति द्वितीया। टा, भ्याम्, भिस् इति तृतीया। ङे, भ्याम्, भ्यस् इति चतुर्थी। ङसिँ, भ्याम्, भ्यस् इति पञ्चमी। ङस्, ओस्, आम् इति षष्ठी। ङि, ओस्, सुप् इति सप्तमी ॥ अर्थः—'सुँ, औ, जस्' यह प्रथमा विभक्ति; 'अम्, औट्, शस्' यह द्वितीया विभक्ति; 'टा, भ्याम्, भिस्' यह तृतीया विभक्ति; 'ङे, भ्याम्, भ्यस्' यह चतुर्थी वि- भक्ति; 'ङसिँ, भ्याम्, भ्यस्' यह पञ्चमी विभक्ति; 'ङस्, ओस्, आम्' यह षष्ठी विभक्ति; 'ङि, ओस्, सुप्' यह सप्तमी विभक्ति (ङ्यन्त, आवन्त तथा प्रातिपदिक से परे हो)। व्याख्या—स्वौजसमौट्—सुप् ।१।१। समासः—सुँश्च औश्च जश्च अम् च औट् च शश्च टाश्च भ्याञ्च भिश्च ङेश्च भ्याञ्च भ्यश्च ङसिँश्च भ्याञ्च भ्यश्च ङश्च ओश्च आम् च ङिश्च ओश्च सुप् च एषां समाहारः = स्वौजसमौट्—सुप्। इस सूत्र में सुँ, औ, जस्, अम्, औट्, शस्, टा, भ्याम्, भिस्, ङे, भ्याम्, भ्यस्, ङसिँ, भ्याम्, भ्यस्, ङस्, ओस्, आम्, ङि, ओस्, सुप् इन इक्कीस प्रत्ययों का उल्लेख है। इन को सुँप् कहा जाता है। सुँ से लेकर सुप् के प् तक सुँप् प्रत्याहार बनता है। इस सूत्र का सम्पूर्ण अर्थ तभी हो सकता है जब हमें यह ज्ञात हो कि यह सूत्र किस २ के अधिकार में पढ़ा गया है। अब उन अधिकारों को बताते हैं— [लघु०] अधिकार-सूत्रम्—(११९) ङ्याप्प्रातिपदिकात् ।४।१।१।। अधिकार-सूत्रम्—(१२०) प्रत्ययः ।३।१।१।। अधिकार-सूत्रम्—(१२१) परश्च ।३।१।२।। इत्यधिकृत्य। ङ्यन्तादावन्तात् प्रातिपदिकाच्च परे स्वादयः प्रत्ययाः स्युः ॥ अर्थः—(१) ङ्याप्प्रातिपदिकात्, (२) प्रत्ययः, (३) परश्च—इन तीन सूत्रों का अधिकार करके उपर्युक्त स्वौजसमौट्० सूत्र का यह अर्थ निष्पन्न हुआ—ङ्यन्त, आवन्त और प्रातिपदिक से परे 'सुँ' आदि इक्कीस प्रत्यय हों। व्याख्या—हम 'ग्रन्थकार' के इस सूत्रविन्यासक्रम से सहमत नहीं। हमारी सम्मति में एक तो स्वौजसमौट्० सूत्र से पूर्व इन अधिकारसूत्रों को रखना उचित था, दूसरा इन अधिकार-सूत्रों का क्रम प्रत्ययः, परश्च, ङ्याप्प्रातिपदिकात् ऐसा होना चाहिये था। स्वौजसमौट्० सूत्र इन तीन अधिकारों के अन्तर्गत है अतः पहले तीनों अधिकार दर्शाने योग्य थे। ङ्याप्प्रातिपदिकात् यह अधिकार प्रत्ययः, परश्च इन दोनों अधिकारों के अन्दर आ जाता है। अतः प्रत्ययः, परश्च सूत्र लिखने के पश्चात्