भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 179

१६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ङ्याप्प्रातिपदिकात् सूत्र लिखना उचित था। हम इन सूत्रों की अपने क्रम से ही व्याख्या करेंगे। प्रत्ययः ।३।१।१। यह अष्टाध्यायी के तृतीयाध्याय के प्रथमपाद का प्रथम तथा अधिकार-सूत्र है। अष्टाध्यायी में सब से बडा यही अधिकार है। इस का अधिकार पाञ्चवें अध्याय की समाप्ति तक जाता है। तीसरे, चौथे तथा पाञ्चवें अध्याय मे जो प्रकृति से विधान किये जाए उन की प्रत्यय सञ्ज्ञा हो यह इस सूत्र का अर्थ है। जहा २ प्रकृति से प्रत्यय विधान किया जाता है वहा २ सर्वत्र प्रकृति पञ्च- म्यन्त होती है। यथा — अचो यत् (७७३)। अच ।३।१।१। यत् ।१।१।१। स्वप्नो नन् (८६१)। स्वप् ।३।१।१। नन् ।१।१। इन स्थानो पर पञ्चमी दिग्योग में होती है। इस दिग्योगपञ्चमी में यह शङ्का उत्पन्न होती है कि क्या प्रत्यय प्रकृति से परे किया जाये या प्रकृति से पूर्व ? इस शङ्का की निवृत्ति के लिये अन्य अधिकार चलाते हैं— परश्च । पर ।३।१।२। न इत्यव्ययपदम् । 'प्रत्यय' पद की पूर्वसूत्र से अनुवृत्ति आती है। अर्थ — प्रत्यय परे होता है। अर्थात् जिस से प्रत्यय विधान किया जाना है उस से प्रत्यय परे समझना चाहिये। यथा — अचो यत् (७७३) यहा अजन्त धातु से यत् प्रत्यय विधान किया गया है सो यत् प्रत्यय अजन्त धातु से परे होगा। स्वप्नो नन् (८६१) यहा स्वप् धातु से नन् प्रत्यय विधान किया गया है सो नन् प्रत्यय स्वप् धातु से परे होगा¹। इस प्रकार प्रत्यय का अधिकार और उस के स्थान का नियम कर अब अवान्तर अधिकार चलाते हैं— ङ्याप्प्रातिपदिकात् ।४।१।१। समास — ङी च आप् च प्रातिपदिकञ्च एषां समाहार = ङ्याप्प्रातिपदिकम्, तस्मात् = ङ्याप्प्रातिपदिकात् । 'ङी' यह भेदक अनु- बन्धों से रहित ग्रहण किया गया है, अतः 'ङीप्, ङीष्, ङीन्' इन सब स्त्रीप्रत्ययों का सामान्यतः ग्रहण होगा। इसी प्रकार 'आप्' यह भी भेदक अनुबन्धों से रहित होने के कारण 'टाप्, डाप्, चाप्' इन सब स्त्रीप्रत्ययों का ग्राहक होगा। यह अधिकार सूत्र है। इस का अधिकार पाञ्चवें अध्याय की समाप्ति तक जाता है। इस सूत्र मे प्रकृति बतलाई गई है। अर्थ — यहा से ले कर पाञ्चवें अध्याय की समाप्ति तक जितने प्रत्यय कहे गये हैं वे (ङ्याप्प्रातिपदिकात्) ङ्यन्त आबन्त तथा प्रातिपदिक से परे हों। इसी सूत्र के अधिकार मे स्वौजसमौट्० (११८) सूत्र पढ़ा गया है। अतः उस सूत्र का यह अर्थ हुआ—ङ्यन्त, आबन्त तथा प्रातिपदिक से परे सुं, औ, जस् आदि इक्कीस प्रत्यय हों²। १ तत्र 'राम+टा' यहा पर टा प्रत्यय टित् होने से आद्यन्तौ टकितौ (८५) से राम के आदि में न हो कर राम से परे होगा। इसी प्रकार घरेष्ट. (७६२) आदि में समझना चाहिये। २. ङीप्, ङीष्, ङीन् तथा टाप्, डाप् और चाप् प्रत्ययो का आगे स्त्रीप्रत्यय- प्रकरण मे उल्लेख आयेगा। ङ्यन्त और आबन्त प्रत्ययान्त होने से प्रातिपदिक-