लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 180, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुँल्लिङ्ग-प्रकरणम् १६५ इन इक्कीस प्रत्ययों के सात त्रिक बनते हैं। यथा—१. सुँ, औ, जस्। २. अम्, औट्, शस्। ३. टा, भ्याम्, भिस्। ४. ङे, भ्याम्, भ्यस्। ५. ङसिँ, भ्याम्, भ्यस्। ६. ङस्, ओस्, आम्। ७. ङि, ओस्, सुप्। इन त्रिकों की क्रमशः प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी, सप्तमी ये सञ्ज्ञाएं पाणिनि से पूर्ववर्ती आचार्यों ने की हुई हैं। महामुनि पाणिनि ने भी इन सञ्ज्ञाओं का उपयोग अपने ग्रन्थ में किया है (देखें कारकप्रकरण)। अब इन विधान किये हुए इक्कीस प्रत्ययों की व्यवस्था करते हैं— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्— (१२२) सुपः ।१।४।१०२॥ सुपस्त्रीणि त्रीणि वचनान्येकश एकवचन-द्विवचन-बहुवचनसञ्ज्ञानि स्युः ॥ अर्थः—सुँप् का प्रत्येक त्रिक ‘एकवचन, द्विवचन, बहुवचन’ सञ्ज्ञक हो। व्याख्या – सुपः ।६।१। त्रीणि ।१।३। त्रीणि ।१।३। (तिङस्त्रीणि त्रीणि० से)। एकशः इत्यव्ययपदम्। एकवचन-द्विवचन-बहुवचनानि ।१।३। (तान्येकवचनद्विवचनबहु- वचनान्येकशः से)। अर्थः—(सुपः) सुँप् के जो (त्रीणि त्रीणि) तीन २ वचन, वह (एकशः) प्रत्येक (एकवचन-द्विवचन-बहुवचनानि) ‘एकवचन-द्विवचन-बहुवचन’ सञ्ज्ञक हो। सुँप् प्रत्याहार के सात त्रिक अर्थात् तीन २ वचन होते हैं। ये सातों ‘एकवचन- द्विवचन-बहुवचन’ सञ्ज्ञक होते हैं। यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) के अनुसार प्रत्येक त्रिक के अन्तर्गत तीन वचन क्रमशः एकवचन, द्विवचन, बहुवचन सञ्ज्ञक हो जाते हैं। यथा –
| त्रिकसंख्या | विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|---|
| पहला त्रिक | प्रथमा | सुँ (स्) | औ | जस् (अस्) |
| दूसरा त्रिक | द्वितीया | अम् | औट् (औ) | शस् (अस्) |
| तीसरा त्रिक | तृतीया | टा (आ) | भ्याम् | भिस् |
| चौथा त्रिक | चतुर्थी | ङे (ए) | भ्याम् | भ्यस् |
| पांचवां त्रिक | पञ्चमी | ङसिँ (अस्) | भ्याम् | भ्यस् |
| छठा त्रिक | षष्ठी | ङस् (अस्) | ओस् | आम् |
| सातवां त्रिक | सप्तमी | ङि (इ) | ओस् | सुप् (सु) |
संज्ञक न होते थे अतः केवल 'प्रातिपदिकात्' कहने से इन से परे सुँ आदि प्रत्ययों की उत्पत्ति सम्भव न थी। इसीलिये प्रकृतसूत्र में इन का पृथक् उल्लेख किया गया है। [वस्तुतः प्रातिपदिकग्रहणे लिङ्गविशिष्टस्यापि ग्रहणम् परिभाषा से इन का ग्रहण भी हो सकता है अत एव पङ्गु, श्वश्रू आदि ऊङ्प्रत्ययान्त शब्दों से स्वादियों की उत्पत्ति में कोई बाधा उपस्थित नहीं होती। इन का सूत्र में उल्लेख इसलिये किया गया है कि तद्धित की उत्पत्ति ङ्यन्त, आवन्त से परे ही हो इन से पूर्व प्रातिपदिक से नहीं। इसका विशेष स्पष्टीकरण सिद्धान्तकौमुदी की टीकाओं में इस स्थल पर देखें।]