लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
ध्यान रहे कि प्रत्येक त्रिक को 'एकवचन + द्विवचन + बहुवचन' ये तीन संज्ञाएं मिलती हैं। इन को वह अपने अन्तर्गत तीन प्रत्ययों में बांट देता है। यथा--'सुँ, औ, जस्' यह एक त्रिक है, इसे 'एकवचन, द्विवचन, बहुवचन' ये तीन संज्ञाएं प्राप्त होती हैं। यह त्रिक इन तीन संज्ञाओं को अपने अन्तर्गत तीन प्रत्ययों को क्रमशः दे देता है, इस से 'सुँ' यह एकवचन, 'औ' यह द्विवचन, 'जस्' यह बहुवचन हो जाता है। इसी प्रकार अन्य छ त्रिकों में भी जान लेना चाहिये। अब यह बतलाते हैं कि कहां एकवचन और कहां द्विवचन प्रयुक्त होता है [बहुवचन के विषय में भी थोड़ी दूर आगे चल कर कहेंगे]। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१२३) द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने ।१।४।२२॥ द्वित्वैकत्वयोरेते स्तः ॥ अर्थः—द्वित्व और एकत्व की विवक्षा (कहने की इच्छा) होने पर क्रमशः द्विवचनप्रत्यय और एकवचनप्रत्यय होता है। व्याख्या—द्व्येकयोः ।७।२। द्विवचनैकवचने ।१।२। द्विवचनञ्च एकवचनञ्च द्विवचनैकवचने, इतरेतरद्वन्द्वः । 'द्व्येकयोः' यहां 'द्वौ च एकश्च, तेषु = द्व्येकेषु' ऐसा बहुवचन होना चाहिये था, परन्तु मुनि ने ऐसा न कर 'द्व्येकयोः' में द्विवचन ही किया है। उन के ऐसा करने का अभिप्राय यह है कि 'द्वि' शब्द से दो पदार्थ और 'एक' शब्द से एक पदार्थ ऐसा अर्थ ग्रहण न किया जाये किन्तु 'द्वि' शब्द से दो की सङ्ख्या अर्थात् द्वित्व और 'एक' शब्द से एक की सङ्ख्या अर्थात् एकत्व का ग्रहण हो । भाव यह है कि लोक में द्वि और एक शब्द सङ्ख्येयवाची ही प्रसिद्ध हैं सङ्ख्यावाची नहीं१। अर्थात् 'द्वि' शब्द से लोक में दो पदार्थ और 'एक' शब्द से एक पदार्थ ही लिया जाता है न कि दो और एक की सङ्ख्या। दो पदार्थों में द्विवचन और एक पदार्थ में एक- वचन हो—यह अर्थ सुसङ्गत नहीं होता । अतः मुनि ने 'द्व्येकयोः' कह कर द्वि और एक शब्द को सङ्ख्यावाची के रूप में प्रयुक्त किया है। इस से अब यह सुसङ्गत अर्थ हो जाता है—(द्व्येकयोः) दो सङ्ख्या अर्थात् द्वित्व और एक सङ्ख्या अर्थात् एकत्व विवक्षित होने पर क्रमशः (द्विवचनैकवचने) द्विवचन और एकवचन प्रत्यय हों। किस २ अर्थ में कौन २ सा त्रिक हो ? यह कारकप्रकरण का विषय है। अतः प्रथम कारकप्रकरणानुसार त्रिक का निर्णय कर चुकने के बाद पुनः इस सूत्र से वचन- निर्णय करना चाहिये। यदि हमें एकत्व की विवक्षा होगी तो हम एकवचन और यदि द्वित्व की विवक्षा होगी तो द्विवचन करेंगे। यह इस सूत्र का सार है।
१. एक, द्वि से ले कर नवदशन् शब्द तक सब शब्द सङ्ख्येयवाची होते हैं अतः पदार्थों के साथ इन का सामानाधिकरण्य होता है। यथा—एको वातः, द्वौ पुरुषौ इत्यादि । विंशति आदि शब्द सङ्ख्या और सङ्ख्येय दोनों प्रकार के वाचक होते हैं। यथा—'गवां विंशतिः, ब्राह्मणानामेकोनविंशतिः' इत्यादियों में सङ्ख्या- वाची हैं। 'गावो विंशतिः, ब्राह्मणा एकोनविंशतिः' इत्यादियों में सङ्ख्येयवाची हैं। इस पर विशेष टिप्पण इस व्याख्या के कृदन्तप्रकरण में (८१८) सूत्र पर देखें।