लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्तपुल्लिङ्ग-प्रकरणम् १८७ अब रूपसिद्धि के लिये अवसानसञ्ज्ञा का प्रतिपादन करते हैं— [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्—(१२४) विरामोऽवसानम् ।१।४।१०६॥ वर्णानामभावोऽवसानसञ्ज्ञः स्यात् । रुँत्व-विसर्गौ । रामः ॥ अर्थः—वर्णों का अभाव अवसान-सञ्ज्ञक हो । व्याख्या—विरामः ।१।१। अवसानम् ।१।१। 'विराम' शब्द का दो प्रकार का अर्थ होता है; पहला अधिकरण में 'घञ्' प्रत्यय मानने से और दूसरा भाव में 'घञ्' प्रत्यय स्वीकार करने से । प्रथम यथा—विरम्यतेऽस्मिन्निति = विरामः [यहां सामी- पिक अधिकरण विवक्षित है] । उच्चारण का ठहराव जिस के पास किया जाता है उसे 'विराम' कहते हैं । उच्चारण का ठहराव अन्तिमवर्ण के पास किया जाता है अतः इस पक्ष में अन्तिमवर्ण 'विराम' होता है । द्वितीय यथा—विरमणं विरामः, भावे घञ् । उच्चारण का न होना 'विराम' होता है । अर्थात् किसी वर्ण से परे उच्चारण का न होना 'विराम' कहाता है । इस पक्ष में अन्तिम वर्ण से आगे उच्चारण के अभाव की अवसानसञ्ज्ञा होती है। यही पक्ष ग्रन्थकार ने वृत्ति में स्वीकार किया है। पर हैं दोनों ही शुद्ध । अर्थः — (विरामः) वर्णों के उच्चारण का अभाव (अवसानम्) अवसान- संज्ञक होता है । यथा—'रामर्' यहां रेफ से आगे उच्चारणाभाव है उसी की यहां अव- सान-संज्ञा है । ध्यान रहे कि पहले पक्ष में रेफ की ही अवसानसंज्ञा होगी । रामः । 'राम' इस शब्द की अव्युत्पत्तिपक्ष में अर्थवदधातुर० (११६) से तथा व्युत्पत्तिपक्ष में कृदन्त होने से कृत्तद्धितसमासाश्च (११७) से प्रातिपदिकसंज्ञा हो प्रत्ययः, परश्च, ङ्याप्प्रातिपदिकात् (१२०, १२१, ११६) इन के अधिकार में स्वौज- समौट्० (११८) सूत्र द्वारा इक्कीस प्रत्यय प्राप्त हुए । तदनन्तर सुपः (१२२) से सात त्रिकों के अन्तर्गत तीन २ वचनों की क्रमशः एकवचन, द्विवचन, बहुवचन सञ्ज्ञा हो गई । अब प्रथमा के एकत्व की विवक्षा में द्व्येकयोद्विवचनैकवचने (१२३) द्वारा राम शब्द से परे 'सुँ' प्रत्यय आ कर 'राम+सुँ' बना । उपदेश में अनुनासिक होने के कारण सकारोत्तर उकार उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) द्वारा इत्संज्ञक है अतः तस्य लोपः (३) से उस का लोप हो— रामस् । सुप्तिङन्तं पदम् (१४) से 'रामस्' इस समुदाय की पदसंज्ञा हो ससजुषो रुः (१०५) से सकार को रुँ आदेश किया तो— राम+रुँ । पुनः उकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) से इत्संज्ञा तथा तस्य लोपः (३) से लोप हो—रामर् । विरामोऽवसानम् (१२४) से रेफोत्तरवर्ती अभाव की अवसानसञ्ज्ञा हो, उस के परे होने से खरवसानयोर्विसर्जनीयः (६३) द्वारा रेफ को विसर्गादेश करने पर—'रामः' प्रयोग सिद्ध होता है । [विसर्ग के अयोगवाह होने से और अयोगवाहों का पाठ यरों में मानने से अनचि च (१८) से विसर्ग को वैकल्पिक द्वित्व भी हो जायेगा । रामः: ।] नोट—जिस पक्ष में रेफ की अवसानसञ्ज्ञा होती है उस पक्ष में खरवसानयोः० (६३) सूत्र का खर् परे होने पर रेफ को या अवसान में वर्त्तमान रेफ को विसर्गादेश हो—ऐसा अर्थ हो जाने से कोई दोष नहीं आता ।