लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [लघु०] विधि सूत्रम्—(१२५) सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ ।१।२।६४॥ एकविभक्तौ यानि सरूपाण्येव दृष्टानि तेषामेक एव शिष्यते ॥ अर्थ — एकविभक्ति अर्थात् समानविभक्ति के परे होने पर जितने शब्द सरूप =समानरूप वाले ही देखे जाएं, उन में से एक ही रूप शेष रहता है (अन्य रूप लुप्त हो जाते हैं) । व्याख्या—सरूपाणाम् ।६।३। (निर्धारणे षष्ठी) । एकशेष ।१।१। एकविभक्तौ ।७।१। एव इत्यव्ययपदम् । (वृद्धो यूना तल्लक्षणश्चेदेव विशेष. से) । अन्वय —एक- विभक्तौ सरूपाणाम् एव (दृष्टानाम्) मध्य एकशेष स्यादिति । समास —एका चासौ विभक्तिश्च =एकविभक्ति, तस्याम् =एकविभक्तौ, कर्मधारयसमास, समानविभक्ता- वित्यर्थ । समान रूप यषान्ते सरूपा, तेषाम् =सरूपाणाम् बहुव्रीहिसमास, ज्योतिर्जन- पदत्यादिना समानस्य सभावे । शिष्यत इति शेष, कर्मणि घञ् । एकश्चासौ शेषश्च= एकशेष, कर्मधारयसमास । अर्थ —(एकविभक्तौ) समानविभक्ति मे (सरूपाणामेव) जितने समानरूप वाले ही शब्द देखे जाए उन मे स (एकशेष ) एक शेष रहता है [अन्य लुप्त हो जाते हैं] । यहा यह ध्यान रखना चाहिए कि यह एकशेष कार्य अन्तरङ्ग¹ होने से 'औ' आदि विभक्तिया की उत्पत्ति स पूर्व ही होता है। एक विभक्ति अर्थात् समानविभक्ति के परे होने पर जो शब्द एक जैसे ही देखे जाते है विरूप नही दिखाई देते, उन शब्दा म एक ही शेष रहता है अन्य लुप्त हो जाते हैं । यथा—'मातृ' शब्द दो प्रकार स सिद्ध होता है। एक—नप्तृनेष्टृ० (उणा० २।५२) इस उणादिसूत्र द्वारा 'मान्' (नलोप हो कर) अथवा 'मा' धातु स तृजन्त १. असिद्ध बहिरङ्गमन्तरङ्गे (प०) अर्थात् अन्तरङ्ग कार्य करने मे बहिरङ्ग कार्य असिद्ध होता है। बहुत निमित्तो की अपेक्षा करने वाला कार्य बहिरङ्ग और थोडे निमित्तो की अपेक्षा करने वाला कार्य अन्तरङ्ग होता है। अथवा—घरेलू=निज से सम्बन्ध रखने वाला=समीप का=निकट का या अपने भीतर का कार्य अन्त- रङ्ग और दूर का अथवा अपने से बाहिर का कार्य बहिरङ्ग होता है। यद्वा— बहुत मन्झटो वाला काय बहिरङ्ग और थोडे झन्झट वाला कार्य अन्तरङ्ग होता है। 'राम राम' यहा एकशेष विभक्त्युत्पत्ति स थोडी अपेक्षा वाला [विभ- क्त्युत्पत्ति मे प्रातिपदिकसज्ञा, द्वित्वादि की विवक्षा इत्यादि बहुत बातो की अपेक्षा होती है] थोडे झन्झटा वाला घरेलू वा भीतरी कार्य सा है अत यह अन्तरङ्ग और विभक्त्युत्पत्ति उस से बहिर्भूत होने से बहिरङ्ग है। अन्तरङ्ग कार्य पहले और बहिरङ्ग कार्य पीछे होगा । यह परिभाषा लोकसिद्ध है। यथा लोक मे सवेरे उठ कर मनुष्य अन्तरङ्गकार्य शौच, दन्तधावन, स्नानादि कर बाद मे बहिरङ्ग= बाहिर के या पराये कार्यों को करते हैं, वैसे यहा भी समझना चाहिये । इस परिभाषा की विशेष व्याख्या व्याकरण के उच्च ग्रन्थो म देखें ।