लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १६६
निपातित होता है । इस का अर्थ 'माता = जननी' और इस के रूप 'माता, मातरौ, मातरह । मातरम्, मातरौ, मातृः'_ इत्यादि होते हैं । दूसरा—माङ् माने (जुहो०) धातु से ण्वुल्तृचौ (७८४) द्वारा तृच् प्रत्यय करने से सिद्ध होता है । इस का अर्थ 'मापने वाला' और इस के रूप 'माता, मातारौ, मातारः । मातारम्, मातारौ, मातृन्' इत्यादि होते हैं । अब इन दो प्रकार के 'मातृ' शब्दों का द्वन्द्व करने पर एकशेष नहीं होगा । क्योंकि ये एकविभक्ति = समान-विभक्ति में केवल सरूप ही नहीं देखे जाते । इस में सन्देह नहीं कि सुं, टा, ङे आदि विभक्तियों में इन दोनों प्रकार के 'मातृ' शब्दों के 'माता, मात्रा, मात्रे' आदि रूप समान ही होते हैं, परन्तु प्रत्येक विभक्ति में सरूप ही हों ऐसा नहीं देखा जाता । 'अम्' मे औणादिक 'मातृ' शब्द का 'मातरम्' और दूसरे 'मातृ' शब्द का 'मातारम्' विरूप होता है सरूप नहीं । हमारी शर्त्त तो यह है कि 'एक अर्थात् एक जैसी = समान विभक्ति परे होने पर जो शब्द सरूप ही रहें, विरूप न हों; उन में से एक ही शेष रहता है' इस शर्त्त को इन दो प्रकार के 'मातृ' शब्दों ने पूरा नही किया । समानविभक्ति 'अम्' आदि में इन की विरूपता पाई जाती है अतः इन का एकशेष नही होगा । प्रत्यर्थं शब्दः अर्थात् प्रत्येक अर्थ के लिये शब्द के उच्चारण की आवश्यकता होती है । इस लिये जब दो, तीन या अधिक अर्थों का बोध कराना अभीष्ट होता है तो उस के लिये तद्वाचक शब्दों का उच्चारण भी उतनी बार प्राप्त होता है । इस पर यह सूत्र नियम करता है कि उन का उच्चारण एक ही बार हो अनेक बार नहीं । जैसे—जब दो, तीन या अधिक राम कहने हों तो तब रामशब्द का दो, तीन या अधिक वार उच्चारण प्राप्त होता है । इस नियम से एक 'राम' शब्द रह जाता है, शेषों का लोप हो जाता है । उन सब के अर्थ का वही शेष बचा हुआ ही बोध कराता है । जैसा कि कहा गया है—यः शिष्यते स लुप्यमानार्थाभिधायी अर्थात् जो शेष रहता है वह लोप हुओ के अर्थ का भी बोध कराता है । 'राम राम' इन दो सरूप शब्दों में इस सूत्र द्वारा एक 'राम' शब्द ही शेष रह जाता है । अब प्रथमाविभक्ति के द्वित्व की विवक्षा में द्वह्येकयोर्द्विवचनैकवचने (१२३) सूत्र द्वारा 'औ' प्रत्यय आ कर 'राम + औ' हो जाता है । अब इस स्थिति में वृद्धिरेचि (३३) के प्राप्त होने पर उस का बाधक अग्रिमसूत्र उपस्थित होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१२६) प्रथमयोः पूर्व-सवर्णः ।६।१।६८॥ अकः प्रथमाद्वितीययोरचि पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेशः स्यात् । इति प्राप्ते— अर्थः—अक् प्रत्याहार से प्रथमा या द्वितीया का अच् परे हो तो पूर्व (अक्) और पर (अच्) के स्थान पर पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेश हो जाता है । इस सूत्र के प्राप्त होने पर (अग्रिम सूत्र निषेध करता है ) । व्याख्या--अकः ।५।१। (अकः सवर्णे दीर्घः से) । प्रथमयोः ।६।२। अचि