भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 185

१७० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ।७।२। (इको यणचि से) । पूर्व-परयो ।६।२। एक ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः यह अधि- कृत है)। पूर्व सवर्ण ।१।१। दीर्घ ।१।१। (अकः सवर्णे दीर्घ से) । समास —प्रथमा च प्रथमा च = प्रथमे, तयो = प्रथमयोः, एकशेष । विभक्तिया सात है, पहले 'प्रथमा' शब्द से उन म से पहली 'सुं, औ, जस्' विभक्ति का ग्रहण हो जाता है, दूसरे 'प्रथमा' शब्द से अवशिष्ट छ विभक्तियो म प्रथमा अर्थात् 'अम्, औट्, शस्' का बोध होता है। इस प्रकार 'प्रथमयोः' शब्द स प्रथमा तथा द्वितीया विभक्ति का ग्रहण हो जाता है । पूर्वस्य सवर्ण = पूर्व-सवर्ण , षष्ठीतत्पुरुषसमास । अर्थ — (अक ) अक् प्रत्याहार से (प्रथमयो ) प्रथमा या द्वितीया विभक्ति का (अचि) अच् परे हो तो (पूर्व-परयो ) पूर्व + पर के स्थान पर (एक ) एक (पूर्व-सवर्ण ) पूर्वसवर्ण (दीर्घ ) दीर्घ आदेश होता है । तात्पर्य यह है कि अक् और प्रथमा द्वितीया के अच् के स्थान पर एक ऐसा आदेश होता है जो पूर्व वर्ण का सवर्ण होते हुए साथ ही दीर्घ भी होता है । यथा— 'इ+औ' के स्थान पर पूर्वसवर्णदीर्घ 'ई' होगा, यह पूर्व का सवर्ण है और दीर्घ भी है । इसी प्रकार—'उ+अ' के स्थान पर 'ऊ', 'ऋ+अ' के स्थान पर 'ॠ' पूर्वसवर्ण- दीर्घ होगा। इन सब के उदाहरण आगे यत्र तत्र बहुत आएगे । 'राम+औ' यहा मकारोत्तर अकार = अक् म परे 'औ' यह प्रथमा का अच् विद्यमान है, अत पूर्व+पर के स्थान पर 'आ' यह पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र निषेध करता है— [लघु०] निषेध सूत्रम्— (१२७) नाऽदिचि।६।१।१०४॥ आद् इचि न पूर्वसवर्णदीर्घः । वृद्धिरेचि (३३)—रामौ ॥ अर्थ.— अवर्ण से इच् प्रत्याहार परे होने पर पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेश नही होता । वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि हो कर 'रामौ' सिद्ध हो जाता है। व्याख्या—आत् ।५।१। इचि ।७।१। पूर्वपरयो ।६।२। एक ।१।१। (एकः पूर्वपरयो यह अधिकृत है)। पूर्व-सवर्ण ।१।१। (प्रथमयो पूर्वसवर्ण से)। दीर्घ ।१।१। (अक सवर्णे दीर्घ से)। न इत्यव्ययपदम् । अर्थ — (आत्) अवर्ण से (इचि) इच् प्रत्याहार परे होने पर (पूर्व-परयो ) पूर्व+पर के स्थान पर (पूर्वसवर्ण, दीर्घ ) पूर्वसवर्णदीर्घ (एक ) एकादेश (न) नही होता । अवर्ण को छोट कर सब स्वर इच् प्रत्याहार के अन्दर आ जाते हैं । 'राम+औ' यहा मकारोत्तर अवर्ण से 'औ' यह इच् प्रत्याहार परे वर्तमान है अत इस सूत्र से पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध हो कर पुन वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एका- देश करने से—राम् औ='रामौ' प्रयोग सिद्ध होता है । [लघु०] विधि सूत्रम्— (१२८) बहुषु बहुवचनम् ।१।४।२१॥ बहुत्वविवक्षायां बहुवचन स्यात् ॥ अर्थ.—बहुत्व अर्थात् दो सङ्ख्या से अधिक सङ्ख्या की विवक्षा हो जो बहु- वचन प्रत्यय होता है ।