भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 186

व्याख्या—बहुषु ।७।३। बहुवचनम् ।१।१। यहां ‘बहु’ शब्द व्याख्यान से बहुत्व- वाची है। अर्थः—(बहुषु) बहुत्व की विवक्षा होने पर (बहुवचनम्) बहुवचन प्रत्यय होता है। यदि दो से अधिक सङ्ख्या की विवक्षा होगी तो प्रकृति से बहुवचन प्रत्यय प्रयुक्त किया जायेगा। ‘राम राम राम’ इन तीन रामशब्दों का या इन से अधिक यथेष्ट रामशब्दों का (दो से अधिक की हमें विवक्षा है चाहे तीन हों या सौ इस से कुछ प्रयोजन नहीं) सरूपाणाम्० (१२५) से एकशेष हो ‘राम’ हुआ। अब प्रथमा विभक्ति के बहुत्व की विवक्षा में बहुषु बहुवचनम् (१२८) द्वारा ‘जस्’ यह बहुवचन प्रत्यय आकर ‘राम+ जस्’ हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१२६) चुटू ।१।३।७॥ प्रत्ययाद्यौ चुटू इतौ स्तः॥ अर्थः—प्रत्यय के आदि में स्थित चवर्ग वा टवर्ग इत्सञ्ज्ञक होते हैं। व्याख्या—प्रत्ययस्य ।६।१।(पः प्रत्ययस्य से)। आदी ।१।२। (आदिर्निंटुडवः से वचनविपरिणाम कर के)। चुटू ।१।२। इतौ ।१।२। (उपदेशेऽजनुनासिक इत् से वचनविपरिणाम द्वारा)। समासः—चुश्च टुश्च = चुटू, इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः-----(प्रत्यय- स्य) प्रत्यय के (आदी) आदि में स्थित (चुटू) चवर्ग और टवर्ग (इतौ) इत्सञ्ज्ञक होते हैं। ‘राम+जस्’ यहां ‘जस्’ यह प्रत्यय है, इस के आदि में ‘ज्’ यह चवर्ग स्थित है अतः इस सूत्र से इस की इत् सञ्ज्ञा हो तस्य लोपः (३) से उस का लोप करने पर ‘राम+अस्’ हुआ। अब यहां हलन्त्यम् (१) से सकार की इत्सञ्ज्ञा प्राप्त होती है, इस पर उस की निवृत्ति के लिये यत्न करते हैं— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१३०) विभक्तितश्च ।१।४।१०३॥ सुप्तिङौ विभक्ति-सञ्ज्ञौ स्तः॥ अर्थः—सुँप् और तिङ् विभक्तिसञ्ज्ञक होते हैं। व्याख्या—सुँप् ।१।१। (सुँपः से विभक्तिविपरिणाम द्वारा)। तिङ् ।१।१। (तिङस्त्रीणि० से विभक्तिविपरिणाम द्वारा)। विभक्तिः ।१।१। च इत्यव्ययपदम्। अर्थः– (सुँप्) सुँप् और (तिङ्) तिङ् (विभक्तिः) विभक्तिसञ्ज्ञक होते हैं। सञ्ज्ञाविधौ प्रत्यय-ग्रहणे तदन्तग्रहणं नास्ति [जहां प्रत्यय की सञ्ज्ञा की जाये वहां प्रत्यय के ग्रहण होने पर प्रत्ययान्त का ग्रहण नहीं किया जाता] इस नियम से यहां सुबन्त और तिङन्त की विभक्ति सञ्ज्ञा नहीं होती किन्तु केवल सुँप् और तिङ् की ही विभक्ति सञ्ज्ञा होती है। सुँप् प्रत्याहार स्वौजसमौट्० (११८) सूत्र के ‘सुँ’ से लेकर सप्तमी के बहु- वचन ‘सुप्’ के पकार तक बनता है। अर्थात् सुँ, औ, जस् आदि इक्कीस प्रत्यय ‘सुँप्’ १. ‘चुटू+इतौ’ अत्र ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् (५१) इति प्रगृह्यत्वेन प्रकृतिभावो- ऽवसेयः।