लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् हैं। तिङ् प्रत्याहार तिप्तस्झि० (३७५) सूत्र के 'ति' से लेकर 'महिङ्' के ङकार तक बनता है। अर्थात् तिप्, तस्, झि आदि अठारह प्रत्यय 'तिङ्' हैं। इन दोनों सुप् और तिङ् प्रत्ययों की विभक्ति सञ्ज्ञा है। अब विभक्तिसञ्ज्ञा का उपयोग दर्शाते हैं— [लघु०] निषेध-सूत्रम्—(१३१) न विभक्तौ तुस्माः ।१।३।४।। विभक्तिस्थास्तवर्गसकारमकारा नेत । इति सस्य नेत्त्वम् । रामाः ॥ अर्थ—विभक्ति में स्थित तवर्ग, सकार, मकार इत्सञ्ज्ञक नहीं होते। इति सस्य—इस सूत्र से सकार की इत् सञ्ज्ञा का निषेध हो जाता है। व्याख्या—न इत्यव्ययपदम्। विभक्तौ ।७।१। तुस्मा ।१।३। इत ।१।३। (उप- देशेऽजनुनासिक इत् से वचनविपरिणाम द्वारा)। समास—तुश्च स् च मश्च = तुस्माः, इतरेतर-द्वन्द्व । मकारादकार उच्चारणार्थं । अर्थ—(विभक्तौ) विभक्ति में (तुस्मा ) तवर्ग, सकार, मकार (इत ) इत्सञ्ज्ञक (न) नहीं होते । इस सूत्र में जस्, शस्, भिस्, भ्यस्, ङस्, ओस्, अम्, भ्याम्, आम् आदि के अन्त्य हल् की हलन्त्यम् (१) द्वारा इत्सञ्ज्ञा नहीं होती । तवर्ग के उदाहरण— रामात्, सर्वस्मात्, सर्वस्मिन्, एधेरन् प्रभृति जानने चाहियें । 'राम+जस्' यहां अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर उस का बाध कर अतो गुणे (२७४) से पररूप प्राप्त होता है। पुन उस का भी बाध कर प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) से पूर्वसवर्णदीर्घ आकार करने से—रामास् । अब पूर्ववत् सकार को रुँ, उँकारलोप तथा अवसानसञ्ज्ञक रेफ को विसर्ग करने पर 'रामाः' प्रयोग सिद्ध होता है। किसी का अपनी ओर ध्यान खींचना सम्बोधन कहाता है। यथा—हे राम ! भो देवदत्त !¹ इत्यादि । सम्बोधन में भी प्रथमा विभक्ति का प्रयोग किया जाता है [देखो कारकप्रकरण (८८६)] । सम्बोधन के द्योतनार्थ पद के आदि में (क्वचित् अन्त में भी) प्राय 'हे, रे, भोस्' आदि अव्ययों का प्रयोग किया जाता है । कहीं २ इन का प्रयोग नहीं भी होता । अब सम्बोधन के एकत्व की विवक्षा में 'राम+सुँ' हुआ । इस अवस्था में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् (१३२) एकवचनं सम्बुद्धिः ।२।३।४६।। सम्बोधने प्रथमाया एकवचनं सम्बुद्धिसञ्ज्ञं स्यात् ॥ अर्थ:—सम्बोधन में प्रथमा विभक्ति का एकवचन सम्बुद्धि सञ्ज्ञक होता है। व्याख्या—सम्बोधने ।७।१। (सम्बोधने च सूत्र से)। प्रथमायाः ।६।१। (प्राति- पदिकार्थलिङ्ग—प्रथमा से विभक्तिविपरिणाम द्वारा) । एकवचनम् ।१।१। सम्बुद्धिः १ सम्बोधनवाची पद के आगे आजकल '!' ऐसा चिह्न किया जाता है; परन्तु प्राचीनकाल में ऐसा कोई चिह्न न था। इस प्रकार के चिह्नों की परिपाटी प्राय पश्चिम से आई है । इन से वाक्य सुन्दर, असन्दिग्ध और झटिति अर्थप्रत्यायक हो जाते हैं। इन के ग्रहण में कोई लज्जा की बात नहीं—विषादप्यमृतं ग्राह्यम् ।