भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 633 में से

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पृष्ठ 188

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १७३ ।१।२। अर्थः— (सम्बोधने) सम्बोधन में (प्रथमायाः) प्रथमा का (एकवचनम्) एक- वचन (सम्बुद्धिः) सम्बुद्धि-सञ्ज्ञक होता है । इस सूत्र से सम्बोधन के 'सुं' की सम्बुद्धिसञ्ज्ञा हो जाती है। अब सुंलोप के लिये उपयोगी अङ्गसञ्ज्ञा करने वाला सूत्र लिखते हैं— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् -(१३३) यस्मात्प्रत्ययविधिस्तदादि प्रत्ययेऽङ्गम् ।१।४।१३॥ यः प्रत्ययो यस्मात् क्रियते तदादि शब्दस्वरूपं तस्मिन्नङ्गं स्यात् ॥ अर्थः-जो प्रत्यय जिस शब्द से विधान किया जाता है वह शब्द है आदि में जिस के ऐसा शब्द-स्वरूप उस प्रत्यय के परे होने पर अङ्गसञ्ज्ञक होता है। व्याख्या—यस्मात् ।५।१। प्रत्ययविधिः ।१।१। तदादि ।१।१। प्रत्यये ।७।१। अङ्गम् ।१।१। समासः—विधानं विधिः, भावे किप्प्रत्ययः। प्रत्ययस्य विधिः=प्रत्यय- विधिः, षष्ठी-तत्पुरुषः । तत्=प्रकृति-रूपम् आदिर्यस्य शब्दस्वरूपस्य तत्=तदादि, तद्गुणसंविज्ञान-बहुव्रीहिसमासः। अर्थः-(यस्मात्) जिस प्रकृति से (प्रत्ययविधिः) प्रत्यय का विधान हो (तदादि) वह प्रकृति जिस शब्दस्वरूप के आदि में हो ऐसा प्रकृतिसहित वह शब्दस्वरूप (प्रत्यये) उस प्रत्यय के परे होने पर (अङ्गम्) अङ्ग- सञ्ज्ञक होता है। उदाहरण यथा— भू धातु से परे लँट् के स्थान पर 'मिप्' प्रत्यय किया तो बना—भू+मिप् । पुनः भूधातु से परे 'शप्' विकरण किया तो 'भू+शप्+मिप्' हुआ। शकार तथा दो पकारों का लोप करने पर 'भू+अ+मि' । अब यहां अङ्गसञ्ज्ञा करते हैं। यहां 'भू' इस प्रकृति से 'मिप्' प्रत्यय का विधान किया गया है। वह 'भू' प्रकृति 'अ' इस शब्दस्वरूप के आदि में स्थित है। इस प्रकार प्रकृतिसहित वह शब्दस्वरूप 'भू+अ' है। अतः उस मिप् प्रत्यय के परे होने पर 'भू+अ' इस समुदाय की अङ्ग संज्ञा हुई। गुण और अवादेश हो कर यह अङ्ग 'भव' बन जाता है। अब मिप् प्रत्यय के परे रहते 'भव' इस अदन्त अङ्ग को अतो दीर्घो यञि (३६०) से दीर्घ हो कर 'भवामि' सिद्ध हो जाता है। इसी प्रकार 'भविष्यामि' आदि में 'भविष्य' आदि की अङ्ग संज्ञा समझनी चाहिये । यदि सूत्र में 'तदादि' यहां 'आदि' ग्रहण न करते तो केवल उस प्रकृति की ही अङ्गसंज्ञा होती, प्रकृति से आगे तथा प्रत्यय से पूर्वस्थित शब्दस्वरूप की न होती । तब उपर्युक्त उदाहरण में केवल 'भू' की ही अङ्गसंज्ञा होती 'अ' की साथ में न होती । इस से अङ्ग के अदन्त न होने से उसे दीर्घ न हो कर अनिष्ट हो जाता । अब पुनः 'आदि' ग्रहण से तद्गुणसंविज्ञानबहुव्रीहिसमास के कारण दोनों अर्थात् विकरणविशिष्ट प्रकृति का ग्रहण हो जाता है; कोई दोष नहीं आता¹ । १. बहुव्रीहिसमास में जिन पदों का समास किया जाता है, समास हो चुकने पर प्रायः उन पदों से भिन्न किसी अन्य पद के अर्थ की ही प्रधानता हो जाया करती है। यथा—'पीत' शब्द का अर्थ है 'पीला' और 'अम्बर' शब्द का अर्थ है 'कपड़ा' ।

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