भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 189

१७४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् जहा पर केवलमात्र प्रकृति ही होगी उस से आगे तथा प्रत्यय से पूर्व अन्य कोई स्थित न होगा, वहा केवल प्रकृति की ही अङ्गसञ्ज्ञा हो जायेगी; अर्थात् व्यपदे- शिवद्भाव से 'तदादि' केवल प्रकृति ही समझी जायेगी [देखो-आद्यन्तवदेकस्मिन् (२७८)]। 'राम+सुं' यहा रामशब्द से 'सुं' प्रत्यय का विधान है अत उस प्रत्यय के परे होने पर तदादि=रामशब्द की अङ्गसञ्ज्ञा हो जाती है। अब अग्रिमसूत्र मे अङ्गसञ्ज्ञा का उपयोग दर्शाते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१३४) एङ्ह्रस्वात् सम्बुद्धेः ।६।१।६७॥ एङन्ताद् ह्रस्वान्ताच्चाङ्गाद्धल् लुप्यते सम्बुद्धेश्चेत् ॥ अर्थ.—एङन्त अङ्ग तथा ह्रस्वान्त अङ्ग से परे हल् का लोप हो जाता है यदि वह सम्बुद्धि का हो तो। अब 'पीत' और 'अम्बर' शब्द का बहुव्रीहिसमास किया तो बना—पीताम्बर । इस का अर्थ है—पीले कपडो वाला। इस अर्थ मे किसी अन्यपदार्थ (पुरुष) की प्रधानता है जिस के पीले कपडे हैं। इसी प्रकार 'दृष्टा' का अर्थ है 'देखी गई' और 'मथुरा' का अर्थ है 'एक नगरी'। अब 'दृष्टा' और 'मथुरा' का बहुव्रीहि- समास किया तो बना—दृष्टमथुर । इस का अर्थ है—जिस से मथुरा देखी गई है वह पुरुष। इस अर्थ मे किसी अन्यपदार्थ (पुरुष) की प्रधानता है। अत एव बहुव्रीहिसमास अन्यपदार्थप्रधान कहाता है। इस बहुव्रीहि समास के पुन दो भेद हो जाते हैं—१ तद्गुणसविज्ञान-बहुव्रीहिसमास, २ अतद्गुणसविज्ञान-बहुव्रीहि- समास। जिस बहुव्रीहिसमास में अन्यपदार्थ की प्रधानता के साथ साथ समस्यमान पदों के अर्थों का भी प्रवेश हो वह 'तद्गुणसविज्ञान-बहुव्रीहिसमास' होता है। यथा—'पीताम्बर' यहा अन्यपदार्थ=पुरुष की प्रधानता के साथ साथ समस्यमान पदों के अर्थ का भी त्याग नहीं हुआ। यदि कहा जाये कि 'पीताम्बरमानय' (पीले कपडे वाले को लाओ) तो उस पुरुष के साथ पीले कपडे भी आएगे। अत यहा तद्गुणसविज्ञान बहुव्रीहिसमास है। जहा अन्यपदार्थ के साथ समस्यमान पदो के अर्थ का प्रवेश नही होता वहा 'अतद्गुणसविज्ञान-बहुव्रीहिसमास' होता है। यथा—दृष्टमथुर। यहा अन्यपदार्थ (पुरुष) की प्रधानता के साथ समस्यमान पदों के अर्थों का प्रवेश नहीं होता। यदि कहा जाये कि—'दृष्टमथुरमानय' (जिस ने मथुरा देखी है उसे लाओ) तो उस पुरुष के साथ देखी गई मथुरा नही आएगी, अत यहा 'अतद्गुणसविज्ञान- बहुव्रीहिसमास' है। इसी प्रकार 'चित्रगुमानय' आदि मे समझना चाहिये। उपर्युक्त सूत्र में 'तदादि' (तत्=प्रकृतिरूपम् आदिर्यस्य तत्=तदादि) यहा 'तद्गुणसंविज्ञानबहुव्रीहि' समास है, अत यहा अन्यपदार्थ (जिस के आदि मे प्रकृति होगी) के साथ उस (प्रकृति) की भी अङ्गसञ्ज्ञा हो जायेगी।