लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १७५ व्याख्या — एङ्ह्रस्वात् ।५।१। सम्बुद्धेः ।६।१। हल् ।१।१। (हल्ङ्याब्भ्यः० से)। लोपः ।१।१। (लोपो व्योर्वलि से) । लुप्यत इति लोपः, कर्मणि घञ् । समासः—एङ् च ह्रस्वश्च = एङ्ह्रस्वम्, तस्मात् = एङ्ह्रस्वात्, समाहारद्वन्द्वः । 'एङ् और ह्रस्व से परे सम्बुद्धि के हल् का लोप होता है' ऐसा अर्थ होने से 'हे कतरत् कुल' यहां दोष उत्पन्न होता है । तथाहि —नपुंसकलिङ्ग में 'कतर' शब्द से सम्बुद्धि अर्थात् सम्बोधन का एकवचन 'सुं' करने पर अद्दतरादिभ्यः पञ्चभ्यः (२४१) से उसे अद्द् आदेश हो जाता है—कतर+अद् (द्) । पुनः डित्वसामर्थ्य से रेफोत्तर अकार का लोप हो — कतर्+अद् = 'कतरद्' बनता है । अब 'एङ् और ह्रस्व से परे सम्बुद्धि के हल् का लोप होता है' इस प्रकार का यदि अर्थ होगा तो 'कतर-द्' यहां रेफोत्तर ह्रस्व अकार से सम्बुद्धि के हल् दकार का लोप प्राप्त होगा जो अनिष्ट है । अतः इस की निवृत्ति के लिये इस सूत्र में 'अङ्गात्' का अध्याहार किया जाता है (क्योंकि सम्बुद्धि प्रत्यय का विधान होने से एङ् और ह्रस्व स्वतः अङ्ग होंगे ही) । 'एङ्ह्रस्वात्' को 'अङ्गात्' का विशेषण बना कर तदन्तविधि करने से—'एङन्तह्रस्वान्तादङ्गात्' ऐसा अर्थ निष्पन्न होता है । इस अर्थ के होने से 'कतरद्' आदि में कोई दोष नहीं आता । क्योंकि यहां अङ्ग ह्रस्वान्त नहीं प्रत्युत रेफान्त है, रेफोत्तर अकार तो 'अद्द्' प्रत्यय् का ही अवयव है । अतः दकारलोप न हो कर इष्ट रूप सिद्ध हो जाता है । अर्थः— (एङ्ह्रस्वात्) एङन्त और ह्रस्वान्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (सम्बुद्धेः) सम्बुद्धि का (हल्) हल् (लोपः) लुप्त किया जाता है । एङन्त के उदाहरण 'हे हरे!, हे विष्णो!' आदि आगे आयेंगे । यहां ह्रस्वान्त का उदाहरण प्रस्तुत है— राम+सुँ = 'राम+स्' यहां 'राम' इस ह्रस्वान्त अङ्ग से परे 'स्' यह सम्बुद्धि का हल् वर्त्तमान है अतः प्रकृत सूत्र से उस का लोप हो 'राम' यह प्रयोग सिद्ध होता है । 'हे' आदि शब्दों को साथ में जोड़ने से—'हे राम !, भो राम !' आदि बनेंगे । सम्बोधन का द्विवचन और बहुवचन प्रथमावत् सिद्ध होता है । हे रामौ !, हे रामाः ! । नोट — सम्बोधन के द्विवचन और बहुवचन में प्रथमा से कुछ भी भेद नहीं हुआ करता; भेद सम्बुद्धि में ही होता है । अतः आगे सर्वत्र हम सम्बुद्धि की ही सिद्धि करेंगे । द्विवचन और बहुवचन में स्वयं प्रथमावत् सिद्धि कर लेनी चाहिये । अब द्वितीया विभक्ति के रूप सिद्ध किये जाते हैं । द्वितीया के एकवचन में 'राम+अम्' बना । अब यहां क्रमशः अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ, अतो गुणे (२७४) से उस का बाध कर पररूप तथा प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) से पररूप का बाध कर पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है । इस अवस्था में अग्रिमसूत्र से पूर्वसवर्णदीर्घ का भी बाध हो जाता है । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१३५) अमि पूर्वः ।६।१।१०३॥ अकोऽम्यचि पूर्वरूपमेकादेशः स्यात् । रामम् । रामौ ॥