भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 191

१७६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् अर्थ — अक् से अम् में विद्यमान अच् परे हो तो पूर्व+पर के स्थान पर एक पूर्वरूप आदेश होता है। व्याख्या—अकः ।५।१। (अकः सवर्णे दीर्घः से)। अमि ।७।१। अचि ।७।१। (इको यणचि से)। पूर्वपरयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः यह अधिकृत है)। पूर्वम् ।१।१। अर्थ — (अकः) अक् प्रत्याहार से (अमि) अम् प्रत्यय में स्थित (अचि) अच् के परे होने पर (पूर्वपरयोः) पूर्व+पर के स्थान पर (एकः) एक (पूर्वम्) पूर्व वर्ण आदेश हो जाता है। 'राम + अम्' यहाँ मकारोत्तर अकार = अक् से परे अम् का अच् = अकार विद्यमान है। अतः प्रकृतसूत्र से पूर्व + पर के स्थान पर पूर्व = अकार का रूप हो कर — राम् 'अ' म् = 'रामम्' प्रयोग सिद्ध हुआ। द्वितीया के द्विवचन में 'राम + औट्' हुआ। टकार की हलन्त्यम् (१) से इत् सञ्ज्ञा हो कर तस्य लोपः (३) से लोप हो जाता है — राम + औ। अब प्रथमा के द्विवचन के समान पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध हो कर वृद्धि हो जाती है—रामौ। द्वितीया के बहुवचन में 'राम + शस्' हुआ। अब शकार की इत्सञ्ज्ञा करने के लिये अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१३६) लशक्वतद्धिते ।१।३।८॥ तद्धितवर्जप्रत्ययाद्या ल-श-कवर्गा इतः स्युः ॥ अर्थ —तद्धितभिन्न प्रत्यय के आदि में ल्, श् और कवर्ग इत् हों। व्याख्या प्रत्ययस्य ।६।१। (ष प्रत्ययस्य से)। आदिः ।१।१। (आदिर्ञिटुडवः से लिङ्गविपरिणाम द्वारा)। लशकु ।१।१। इतः ।१।१। (उपदेशेऽजनुनासिक इत् से)। अतद्धिते ।७।१। समास —लश्च शश्च कुश्च एषां समाहारः, लशकु, समाहारद्वन्द्वः। न तद्धिते = अतद्धिते, नञ्समासः। अर्थ —(प्रत्ययस्य) प्रत्यय के (आदि) आदि में स्थित (लशकु) लकार, शकार और कवर्ग (इत्) इत्सञ्ज्ञक होते हैं (अतद्धिते) परन्तु तद्धित में नहीं होने। तद्धितप्रत्यय में निषेध होने से कपु, ण, घिनुन्, घ, शस्, लच् आदि में इत्सञ्ज्ञा न होगी। यथा—व्यूढोरस्क, वाग्मी, लोमश, चूडाल आदि। 'राम+शस्' यहाँ 'शस्' तद्धित नहीं अतः प्रकृत सूत्र से इस के आदि में स्थित शकार की इत्सञ्ज्ञा हुई और लोप हो गया—राम + अस्। अब प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) से पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर 'रामास्' बन गया। इस अवस्था में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१३७) तस्माच्छसो नः पुंसि ।६।१।१०३॥ पूर्वसवर्णदीर्घात् परो यः शसः सस्तस्य नः स्यात् पुंसि ॥ अर्थ —पूर्वसवर्ण-दीर्घ से परे जो शस् का सकार उस के स्थान पर नकार हो जाता है पुंलिङ्ग में। व्याख्या—तस्मात् ।५।१। शसः ।६।१। नः ।१।१। पुंसि ।७।१। नकारादकार उच्चारणार्यः। 'तद्' शब्द पूर्व का बोध कराया करता है। इस सूत्र से पूर्व प्रथमयोः