लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १७७ पूर्वसवर्णः (१२६) में पूर्वसवर्णदीर्घ का विधान है। अतः यहां 'तस्मात्' शब्द से भी 'पूर्वसवर्णदीर्घात्' का ग्रहण होगा। अर्थः- (तस्मात् = पूर्वसवर्णदीर्घात्) उस पूर्वविहित पूर्वसवर्णदीर्घ से परे¹ (शसः) शस् के स्थान पर (नः) न् हो जाता है (पुंसि) पुँल्- लिङ्ग में। अलोऽन्त्यस्य (२१) से यह नकार आदेश शस् के अन्त्य अल् सकार को ही होगा। 'रामास्' यहां मकारोत्तर आकार पूर्वसवर्णदीर्घ है अतः इस से परे शस् के सकार को नकार हो कर - 'रामान्' बना। अब यहां अनिष्ट णत्व प्राप्त होता है। उस का परिहार करने के लिये ग्रन्थ- कार प्रथम णत्वविधायक सूत्र लिखते हैं- [लघु०] विधि-सूत्रम् - (१३८) अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि ।८।४।२॥ अट्, कवर्ग, पवर्ग, आङ्, नुम् एतैर्व्यस्तैर्यथासम्भवं मिलितैश्च व्यव- धानेऽपि रषाभ्यां परस्य नस्य णः समानपदे। इति प्राप्ते- अर्थः-अट् प्रत्याहार, कवर्ग, पवर्ग, आङ् और नुम् इन का अलग २ या यथासम्भव दो तीन अथवा चारों का मिल कर व्यवधान होने पर भी समानपद में रेफ और षकार से परे नकार को णकार हो जाता है। इस सूत्र के प्राप्त होने पर [अग्रिम- सूत्र निषेध करता है]। व्याख्या-अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवाये ।७।१। अपि इत्यव्ययपदम्। समानपदे ।७।१। रषाभ्याम् ।५।२। नः ।६।१। णः ।१।१। (रषाभ्यां नो णः समानपदे से)। णकारादकार उच्चारणार्थः। इस सूत्र से पूर्व अष्टाध्यायी में रषाभ्यां नो णः समानपदे सूत्र पढ़ा गया है। वह सूत्र समानपद में रेफ और षकार से परे अव्यवहित (व्यवधान-रहित) नकार को णकार करता है। यथा-चतुर्णाम्, पुष्णाति आदि। परन्तु यह सूत्र 'नरा- णाम्, पुरुषेण' प्रभृति प्रयोगों में व्यवहित नकार को णकार करने के लिये रचा गया है। समासः-अट् च कुश्च पुश्च आङ् च नुम् च = अट्कुप्वाङ्नुमः, इतरेतरद्वन्द्वः। तैर्व्यवायः (व्यवधानम्) = अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायः, तृतीयातत्पुरुषः। तस्मिन् = अट्- कुप्वाङ्नुम्व्यवाये, भावसप्तमी। अर्थः - (अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवाये) अट्प्रत्याहार, कवर्ग, पवर्ग, आङ् और नुम् इन से व्यवधान होने पर (अपि) भी (रषाभ्याम्) रेफ और षकार से परे (नः) न् के स्थान पर (णः) ण् हो जाता है (समानपदे) समानपद अर्थात् अखण्ड पद में। जिस पद के खण्ड अर्थात् टुकड़े कर उन का स्वतन्त्र रूप से प्रयोग न किया जा सके उसे समानपद या अखण्डपद कहते हैं। 'रामान्' अखण्डपद है, इस के खण्ड नहीं किये जा सकते। इसलिये यहां णकार प्राप्त है। 'रघुनाथः, रमानाथः, रामनाम' १. जहां पूर्वसवर्णदीर्घ न होगा, वहां पर पुंल्लिङ्ग में भी शस् के स् को न् न होगा। जैसे-गाः। 'गो+शस्' यहां पर ओतोऽम्शसोः (२१४) से पूर्व+पर के स्थान पर 'आ' आदेश हुआ है, अतः पूर्वसवर्णदीर्घ न होने से न् भी न हुआ। ल० प्र० (१२)