लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ये अखण्डपद नहीं इनके खण्ड हो सकते हैं। रघु और नाथ इन दोनों खण्डों का स्व- तन्त्र प्रयोग किया जा सकता है। इसलिये इन में णत्व नहीं हुआ। अब यहां यह विचार उपस्थित होता है कि क्या अट्, कवर्ग आदि सब का व्यवधान हो तो णत्व होता है ? या इन में से किसी एक का व्यवधान होने पर णत्व होता है ? पहला पक्ष असम्भव है क्योंकि संस्कृतसाहित्य में ऐसा कोई शब्द नहीं जिस में रेफ या षकार से परे अट्, कवर्ग आदि सब से व्यवहित णकार हो। अतः लक्ष्य (उदाहरण) न मिलने के कारण 'सब का व्यवधान हो तो णत्व होता है' यह पक्ष असङ्गत है। दूसरा पक्ष ठीक है। इस से 'नराणाम्, कराणाम्, पुरुषेण' आदि प्रयोगों की सिद्धि हो जाती है। करणे यज (८०७), स्तोकान्तिकदूरार्थकृच्छ्राणि क्तेन (६२६) इत्यादि पाणिनिसूत्रों से भी इस पक्ष की पुष्टि होती है। इन सूत्रों में मुनि ने एक २ का व्यवधान होने पर णकार आदेश किया है। किञ्च - इस पक्ष के अतिरिक्त एक अन्य पक्ष भी महामुनि के सूत्रपाठ में पुष्ट होता है। वह यह है कि 'अट्, कवर्ग आदियों में चाहे जितने वर्णों का व्यवधान हो णत्व हो जाय। मुनि ने—सरूपाणाम् एकशेष एकविभक्तौ (१२५), कर्मणि द्वितीया (८६१), इन्हन्पूषार्यम्णां शौ (२८४) इत्यादि सूत्रों में यथासम्भव अनेकों का व्यवधान होने पर भी णकार आदेश किया है। ग्रन्थकार ने इन दोनों पक्षों का—एतैर्व्यस्तैैर्यथासम्भवं मिलितैश्च इन शब्दों में वर्णन किया है। इन के उदाहरण यथा— अट्—वरणम्, हरणम्, करिणा, कुरुणा, गिरीणाम्, अर्हेण इत्यादि। कवर्ग—अर्केण, मूर्खाणाम्, गर्गेण, अर्घेण इत्यादि। पवर्ग—दर्पेण, रेफेण, गर्मेण, चर्मणा, वर्मणा इत्यादि। आङ्—पर्याणद्धम्, निराणद्धम् इत्यादि¹। नुम्—बृंहणम्, तृंहणम् इत्यादि। यहां 'नुम्' से अनुस्वार अभिप्रेत है। वह अनुस्वार चाहे 'नुँम्' के स्थान पर हुआ हो या स्वाभाविक हो इस में कुछ प्रयोजन नहीं। यथा—'बृंहणम्' यहां नुँम् के स्थान पर अनुस्वार हुआ है। 'तृंहणम्' यहां स्वाभाविक अनुस्वार है। सूचना—सम्पूर्ण णत्वप्रकरण में रेफ और षकार की तरह ऋवर्ण को भी णत्व में निमित्त समझना चाहिये। अत एव ऋतॄन्तॄच्—प्रशास्तॄणाम् (२०६) इत्यादि मुनिवर के निर्देश उपलब्ध होते हैं। आगे चल कर ग्रन्थकार ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम् (वा० २१) इस वार्तिक को स्वयं ही उद्धृत करेंगे। रामान् = र् + आ + म् + आ + न्। यहां रेफ से पर आ = अट्, म् = पवर्ग, १ इस सूत्र की अनुवृत्ति उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य (४५६) सूत्र में जाती है। अतः पर्याणद्धम् आदि में उस से णत्व हो जाता है। पदव्यवायेऽपि (८।४।३७) द्वारा निषेध नहीं होता। यही आङ् के ग्रहण का प्रयोजन है। इस पर विस्तृत विचार व्याकरण के उच्च ग्रन्थों में देखें।