भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 633 में से

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पृष्ठ 194

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १७६ आ=अट् इन तीन वर्णों से व्यवहित नकार है अतः अट्कु० सूत्र से णकार प्राप्त होता है। अब इस का अग्रिमसूत्र से निषेध करते है— [लघु०] निषेध-सूत्रम् (१३६) पदान्तस्य ।८।४।३६॥ नस्य णो न। रामान् ॥ अर्थ:—पदान्त नकार को णकार नहीं होता। व्याख्या—पदान्तस्य ६।१। नः ।६।१। णः ।१।१। (रषाभ्यां नो णः समान- पदे से) । न इत्यव्ययपदम् (न भाभूपू० से)। अर्थः—(पदान्तस्य) पद के अन्त वाले (नः) न् के स्थान पर (णः) ण् आदेश (न) नहीं होता। 'रामान्' यह सुबन्त होने से सुप्तिङन्तं पदम् (१४) के अनुसार पदसञ्ज्ञक है। यहां 'न्' पदान्त है। अतः प्रकृत पदान्तस्य से नकार को णकार होने का निषेध हो गया तो 'रामान्' प्रयोग सिद्ध हुआ। तृतीया के एकवचन में—राम+टा। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१४०) टाङसिँङसामिनात्स्याः ।७।१।१२॥ अदन्तात् टादीनामिनादयः स्युः। णत्वम्—रामेण॥ अर्थ:—अदन्त (अङ्ग) से परे टा को इन, ङसिँ को आत् और ङस् को स्य आदेश होता है। व्याख्या—अतः ।५।१। (अतो भिस ऐस् से)। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य यह अधिकृत है, इस का विभक्तिविपरिणाम हो जाता है)। टाङसिँङसाम् ।६।३। इनात्स्याः ।१।३। 'अङ्गात्' का विशेषण होने से 'अतः' से तदन्तविधि हो जाती है— अदन्ताद् अङ्गात्। अर्थः—(अतः=अदन्तात्) अदन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (टा- ङसिँ-ङसाम्) टा, ङसिँ, ङस् के स्थान पर (इनात्स्याः) इन, आत्, स्य आदेश हो जाते हैं। यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) के अनुसार टा को इन, ङसिँ को आत् तथा ङस् को स्य आदेश हो जाता है। ध्यान रहे कि इन और स्य आदेश अदन्त हैं। 'राम+टा' यहां 'राम' अदन्त अङ्ग है। इस से परे 'टा' को 'इन' आदेश हो जाता है। 'राम+इन' इस अवस्था में आद् गुणः (२७) से गुण एकादेश तथा अट्कु० (१३८) से नकार को णकार आदेश हो कर 'रामेण' रूप सिद्ध होता है। स्मरण रहे कि यहां पदान्तस्य (१३६) द्वारा णत्व का निषेध नहीं होता, क्योंकि यहां न्- पदान्त नही, पदान्त 'अ' है। तृतीया के द्विवचन में राम+भ्याम्। अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१४१) सुँपि च ।७।३।१०२॥ यञादौ सुँपि अतोऽङ्गस्य दीर्घः। रामाभ्याम् ॥ अर्थ:—यञादि सुँप् परे होने पर अदन्त अङ्ग को दीर्घ हो जाता है। व्याख्या—सुँपि ।७।१। च इत्यव्ययपदम्। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। अतः ।६।१। दीर्घः ।१।१। यञि ।७।१। (अतो दीर्घो यञि से)। 'यञि' पद 'सुँपि' पद का विशेषण है और अल् है इस लिये इस से तदादिविधि हो कर 'यञादौ सुँपि' बन

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 194, कुल 633 में से · BharatKosha