लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् जायेगा। 'अत' यह 'अङ्गस्य' का विशेषण है अत इस से तदन्तविधि होकर 'अदन्तस्य अङ्गस्य' हो जायेगा। अर्थ — (यञि) यञादि (सुपि) सुँप् परे होने पर (अत ) अदन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (दीर्घ ) दीर्घ हो जाता है। यञ् एक प्रत्याहार है, यञादि सुँप् — भ्याम्, भ्यस् आदि हैं। अलोऽन्त्यपरिभाषा द्वारा यह दीर्घ आदेश अदन्त अङ्ग के अन्त्य अल् = अत् के स्थान पर ही होता है। 'राम + भ्याम्' यहां 'भ्याम्' यञादि सुँप् है, अत इस के परे होने पर 'राम' इस अदन्त अङ्ग को दीर्घ हो — 'रामाभ्याम्' प्रयोग सिद्ध हुआ। तृतीया के बहुवचन में 'भिस्' प्रत्यय आकर 'राम + भिस्' हुआ। सुपि च (१४१) से दीर्घ के प्राप्त होने पर उस का बाध कर वक्ष्यमाण बहुवचने झल्येत् (१४५) सूत्र से अदन्त अङ्ग को एकार प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१४२) अतो भिस ऐस् ।७।१।९॥ अदन्ताद् अङ्गात् परस्य भिस ऐस् स्यात्। अनेकाल्शित्सर्वस्य (४५) —रामैः ॥ अर्थ — अदन्त अङ्ग से परे भिस् के स्थान पर ऐस् आदेश हो। व्याख्या—अत ।५।१। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य यह अधिकृत है, इस की विभक्ति का यहां विपरिणाम हो जाता है)। भिस ।६।१। ऐस् ।१।१। 'अङ्गात्' का विशेषण होने से 'अतः' से तदन्तविधि हो जायेगी। अर्थ — (अतः = अदन्तात्) अदन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (भिस ) भिस् के स्थान पर (ऐस्) ऐस् हो जाता है। यह आदेश तस्मादित्युत्तरस्य (७१) द्वारा अदन्त अङ्ग से परे भिस् को होना है। 'भिस' यह षष्ठीनिर्दिष्ट है। अत अलोऽन्त्यस्य (२१) से उस के अन्त्य अल् सकार को यह आदेश होना चाहिये। पर उस के बाधक आदे परस्य (७२) द्वारा भिस् के आदि अल् = भकार को ही प्राप्त होता है। इस पर अनेकाल्शित्सर्वस्य (४५) द्वारा उस का भी बाध कर सम्पूर्ण भिस् के स्थान पर ऐस् आदेश हो जाता है। 'राम + भिस्' यहां 'राम' यह अदन्त अङ्ग है अत इस से परे प्रकृत सूत्र द्वारा भिस् के स्थान पर ऐस् सर्वादेश होकर —राम + ऐस्। अब वृद्धिरेचि (३३) से पूर्व+पर के स्थान पर 'ऐ' वृद्धि हो रुँत्व विसर्ग करने से—'रामैः' प्रयोग सिद्ध होता है। अब रामशब्द के चतुर्थी विभक्ति के रूप सिद्ध किये जाते हैं। चतुर्थी के एक- वचन में 'राम + ङे' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१४३) ङेर्यः ।७।१।१३॥ अतोऽङ्गात् परस्य ङेर्यादेश ॥ अर्थ.—अदन्त अङ्ग से परे 'ङे' के स्थान पर 'य' आदेश हो। व्याख्या—अत ।५।१। (अतो भिस ऐस् से)। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य यह