लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १८१ अविकृत है। यहां विभक्तिविपरिणाम हो जाता है)। ङे: ।६।१। (ङे + ङस् = ङे + अस् = ङेस् = ङेः, ङसिङसोश्चेति पूर्वरूपम्) । यः ।१।१। अर्थः— (अतः = अदन्तात्) अदन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (ङेः) ङे के स्थान पर (यः) 'य' आदेश होता है। ध्यान रहे कि 'य' आदेश सस्वर है। 'राम + ङे' यहां 'राम' यह अदन्त अङ्ग है अतः इस से परे ङे को 'य' आदेश हो—'राम + य' हुआ। यहां 'य' यञादि तो है पर सुँप् नहीं। सुँप् तो 'ङे' था, वह अब रहा नहीं। अतः सुपि च (१४१) से दीर्घ प्राप्त नहीं हो सकता। इस पर 'य' में सुँप्त्त्व धर्म लाने के लिये अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] अतिदेश-सूत्रम्—(१४४) स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ ।१।१।५५॥ आदेशः स्थानिवत् स्यात्, न तु स्थान्यलाश्रयविधौ। इति स्थानि- वत्त्वात् 'सुपि च' (१४१) इति दीर्घः—रामाय। रामाभ्याम्॥ अर्थः—आदेश स्थानी के समान होता है, परन्तु यदि स्थानी अल् के आश्रित कार्य करना हो तो वह स्थानिवत् नहीं होता। इति स्थानिवत्त्वात्० इस सूत्र से यकार के स्थानिवत् हो जाने से सुपि च (१४१) से दीर्घ हो कर 'रामाय' हुआ। व्याख्या—स्थानिवत् इत्यव्ययपदम्। आदेशः ।१।१। अनल्विधौ ।७।१। समासः- स्थानिना तुल्यम् इति स्थानिवत्, तेन तुल्यं क्रिया चेद् वतिः (११४८) इति वतिप्रत्ययः। (१) अला विधिः = अल्विधिः, तृतीयातत्पुरुषः। (२) अलः (परस्य) विधिः = अल्विधिः। पञ्चमी- तत्पुरुषः। (३) अलः (स्थाने) विधिः = अल्विधिः, षष्ठीतत्पुरुषः। (४) अलि (परे) विधिः = अल्विधिः, सप्तमीतत्पुरुषः। न अल्विधिः = अनल्विधिः, तस्मिन् = अनल्विधौ, नञ्तत्पुरुषः। अल् प्रत्याहार में सब वर्ण आ जाते हैं अतः अल् वर्ण का पर्याय है। यहां अल् स्थानी या स्थानी का अवयव ही ग्रहण किया जाता है। अर्थः— (आदेशः) आदेश (स्थानिवत्) स्थानी के समान होता है। परन्तु (अनल्विधौ) स्थान्यल् द्वारा, स्थान्यल् से परे, स्थान्यल् के स्थान पर या स्थान्यल् के परे होने पर विधि करनी हो तो वह स्थानिवत् नहीं होता। भाव—जिस के स्थान पर कुछ किया जाये उसे 'स्थानी' कहते हैं। यथा—ङेर्यः (१४३) द्वारा 'ङे' के स्थान पर 'य' किया जाता है अतः 'ङे' स्थानी है। इको यणचि (१५) द्वारा इक् के स्थान पर यण् किया जाता है अतः इक् स्थानी है। जो स्थानी के स्थान पर किया जाता है उसे 'आदेश' कहते हैं। यथा—ङेर्यः (१४३) में य और इको यणचि (१५) में यण् आदेश है। आदेश स्थानिवत् = स्थानी के समान = स्थानी के तुल्य धर्मवाला होता है अर्थात् जो कार्य स्थानी के होने से सिद्ध होते हैं वे आदेश के होने से भी सिद्ध हो जाते हैं। उदाहरण यथा— 'राम + य' यहां 'य' यञादि तो है पर सुँप् नहीं, अतः सुपि च (१४१) से दीर्घ प्राप्त नहीं हो सकता। अब प्रकृत सूत्र द्वारा आदेश 'य' के स्थानिवत् = ङेवत् होने से 'य' में सुप्त्व धर्म आ जाने के कारण सुपि च से दीर्घ हो—'रामाय' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। निम्नलिखित अवस्थाओं में आदेश स्थानिवत् न होगा—