भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 197, कुल 633 में से

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पृष्ठ 197

१८२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

(१) यदि स्थानी अल् के द्वारा कोई विधि करनी हो तो आदेश स्थानिवत् नहीं होता । यथा— व्यूढोरस्केन' [व्यूढम् उरो यस्य स व्यूढोरस्कः, तेन = व्यूढोर- स्केन । बहुव्रीहिसमास १] यहां विसर्ग के स्थान पर सोऽपदादौ (८-३-३८) से सकार हुआ है । वार्त्तिककार एवं भाष्यकार ने विसर्ग का अट् प्रत्याहार में पाठ माना है । अब यदि इस सकार को स्थानिवद्भाव से विसर्ग मान लें तो यह अट् प्रत्याहार के अन्तर्गत हो जायगा । तब अट्कुप्वाङ्० (१३८) द्वारा नकार को णकार प्राप्त होगा जो अनिष्ट है । यहां स्थानी = विसर्ग = अल् के द्वारा णत्वविधि करनी है अतः आदेश = स् स्थानिवत् = विसर्गवत् न होगा । (२) यदि स्थानी अल् से परे कोई विधि करनी हो तो आदेश स्थानिवत् नहीं होता । यथा = द्यौः । 'दिव्' शब्द से सु प्रत्यय लाने पर दिव औत् (२६४) सूत्र द्वारा व्' को 'औ' हो—'दि औ स्' बना । अब यहां औ' इस आदेश को स्थानिवत् अर्थात् वकारवत् हल् मानने से हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) द्वारा सकार का लोप प्राप्त होता है जो अनिष्ट है। यहां स्थानी अल् = वकार से परे लोपविधि करनी है अतः आदेश (औ) स्थानिवत् (वकारवत्) न होगा । (३) यदि स्थानी अल् के स्थान पर कोई विधि करनी हो तो आदेश स्था- निवत् नहीं होता । यथा— द्युकाम (दिव् कामयते, दिवि कामोऽस्येति वा) । यहां 'दिव् + काम' में दिव उत् (२६५) सूत्र द्वारा 'व्' को 'उ' होता है । यदि इस 'उ' आदेश को स्थानिवत् = वकारवत् मानें तो उस के वल् प्रत्याहार के अन्तर्गत होने के कारण लोपो व्योर्वलि (४२६) द्वारा वकारलोप प्राप्त होता है जो अनिष्ट है । यहां स्थानी अल् = वकार के स्थान पर लोपविधि करनी है अतः आदेश (उ) स्थानिवत् (वकारवत्) न होगा । (४) यदि स्थानी अल् के परे होने पर उस से पूर्व कोई विधि करनी हो तो भी आदेश स्थानिवत् नहीं होता । यथा—क इष्टः । 'इष्ट' यहां यज् धातु के यकार के स्थान पर सम्प्रसारण इकार किया गया है । 'कस् + इष्ट' यहां ससजुपो रुं (१०५) से रुं आदेश कर अनुबन्धलोप किया तो—'कर् + इष्ट' हुआ । अब यहां 'इष्ट' के इकार आदेश को स्थानिवत् = यकारवत् हश्प्रत्याहारान्तर्गत मानें तो हशि च (१०७) से रेफ के स्थान पर उत्व प्राप्त होता है जो अनिष्ट है । यहां स्थानी अल् यकार है; उस के परे होने पर उस से पूर्व रेफ को उत्वविधि करनी है अतः आदेश (इ) स्थानि- वत् (यकारवत्) न होगा ।१ नोट- इस सूत्र पर उपयोगी सब बातें हम ने लिख दी हैं । विद्यार्थियों को इस सूत्र का खूब अभ्यास कर लेना चाहिये, आगे इस का बहुत उपयोग होगा । १.-यहां प्रकृत 'रामाय' की सिद्धि में अलविधि की आशङ्का नहीं करनी चाहिये । यहां हम स्थानिवद्भाव से 'य' को सुप् समझ कर दीर्घ करने चले हैं । सुप्त्त्व धर्म केवल अल् से ही नहीं रहता बल्कि भ्याम्, भिस् आदि समुदायों में भी रहता है जो स्पष्टतः अल् नहीं ।

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