लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १८३ चतुर्थी के द्विवचन में 'रामाभ्याम्' पूर्ववत् सिद्ध होता है । चतुर्थी के बहुवचन में 'भ्यस्' प्रत्यय आ कर 'राम + भ्यस्' हुआ । अब सुपि च (१८४) के प्राप्त होने पर उस का अपवाद अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] विधि-सूत्रम्-(१८४) बहुवचने झल्येत् ।७।३।१०३॥ झलादौ बहुवचने सुंपि अतोऽङ्गस्यैकारः। रामेभ्यः। सुंपि किम् ? पचध्वम् ॥ अर्थः-झलादि बहुवचन सुँप् परे हो तो अदन्त अङ्ग के स्थान पर एकार आदेश हो। व्याख्या-अतः।६।१।(अतो दीर्घो यञि से)। अङ्गस्य ।६।१।(यह अधिकृत है)। बहुवचने ।७।१। झलि ।७।१। सुँपि ।७।१। (सुपि च से) । एत् ।१।१। 'अङ्गस्य' का विशेषण होने से 'अतः' से तदन्तविधि तथा 'सुँपि' का विशेषण होने से 'झलि' से यस्मिन्विधिस्तदा दावल्ग्रहणे द्वारा तदादिविधि हो जाती है। अर्थः- (झलि = झलादी) झलादि (बहुवचने) बहुवचन (सुँपि) सुँप् परे हो तो (अतः=अदन्तस्य) अदन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (एत्) 'ए' आदेश हो जाता है। अलोऽन्त्यस्य (२१) परिभाषा द्वारा यह 'ए' आदेश अन्त्य अल् = अत् के स्थान पर ही होता है। 'राम+भ्यस्' यहां 'भ्यस्' बहुवचन है, इस के आदि में भकार झल् है और यह सुँप् भी है। अतः इस के परे होने से प्रकृत सूत्र द्वारा मकारोत्तर अकार को एकार हो सकार को रुत्व विसर्ग करने से 'रामेभ्यः' प्रयोग सिद्ध होता है। 'सुंपि' कथन से इस सूत्र की प्रवृत्ति सुँप् में ही होती है। अन्यथा 'पचध्वम्' (तुम सब पकाओ) यहां भी एकार आदेश हो 'पचेध्वम्' ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता । 'ध्वम्' झलादि बहुवचन तो है पर सुँप् नहीं, तिङ् है। इस की साधनप्रक्रिया तिङन्त- प्रकरण में स्पष्ट होगी । 'बहुवचने' कहने से 'रामस्य' आदि में एत्व नहीं होता । अब रामशब्द के पञ्चमी के एकवचन में ङसिँ प्रत्यय आ कर 'राम + ङसिँ' बना । इस अवस्था में टाङसिं० (१४०) द्वारा ङसिँ को आत् आदेश हो सवर्णदीर्घ करने पर-रामात् । अब तकार झल् के पदान्त होने से झलां जशोऽन्ते (६७) द्वारा तकार को दकार करने से- रामाद् । अब विरामोऽवसानम् (१२४) सूत्र से दकार की अवसानसञ्ज्ञा हो कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] विधि-सूत्रम्-(१४६) वाऽवसाने ।८।४।५५॥ अवसाने झलां चरो वा । रामात्, रामाद् । रामाभ्याम् । रामेभ्यः । रामस्य ॥ अर्थः-अवसान में झलों को चर् विकल्प से हों । व्याख्या-अवसाने ।७।१। झलाम् ।६।३। (झलां जश्झशि से) । चर् ।१।१। (अभ्यासे चर्च से) । वा इत्यव्ययपदम् । अर्थः- (अवसाने) अवसान में (झलाम्) झलों के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (चर्) चर् हो जाते हैं। झल्-चर्-विषयक विस्तृत विवेचन पीछे (७४) सूत्र पर कर चुके हैं वहीं देखें ।