भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 199

१८४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

‘रामाद्’ यहां अवसान म इस सूत्र से दकार = झल् को तकार = चर् विकल्प से आदेश करने पर—‘रामात्, रामाद्’ ये दो रूप सिद्ध होते हैं। नोट—अनेक वैयाकरण वाऽवसाने (१४६) सूत्र को झलां जशोऽन्ते (६७) सूत्र का अपवाद मानते हैं। अत ‘रामात्’ में प्रथम वाऽवसाने (१४६) से तकार को तकार कर पक्ष म झलां जशोऽन्ते (६७) द्वारा दकार किया करते हैं। किञ्च जहां २ कौमुदी म जश्त्व-चर्त्वे [जश्त्व और चर्त्व होते हैं] लिखा रहता है, वे वहा ‘जश् तु अचर्वे’ [चर्त्वाभावपक्ष म जश् हो जाता है] ऐसा पदच्छेद स्वीकार किया करते हैं। परन्तु हमें यह मत युक्त प्रतीत नहीं होता। क्योकि ऐसा मानने से ‘रत्नमुष्’ शब्द के ‘रत्नमुट्, रत्नमुड्’ ये दो रूप न बन सकेंगे। तथाहि—प्रथम चर्त्व करने से षकार को पकार हो कर—‘रत्नमुप्’ बनेगा। तदनन्तर जश्त्व हो—रत्नमुब्। इस प्रकार ‘रत्नमुप् रत्नमुद्’ ये दो रूप बन जायेंगे, ‘रत्नमुट्’ रूप न बन सकेगा। यद्यपि वे इस का ष्णान्ता षट् (२६७) आदि निर्देशो से परिहार करते हैं, तथापि उन कल्पनाओं के करने की अपेक्षा प्रथम जश्त्व कर तदनन्तर चर्त्व करने मे ही लाघव है। इस का विशेष विवरण हमारे नवीन मुद्रित शोधग्रन्थ न्यासपर्यालोचन मे पृष्ठ (२८६) पर देखें। पञ्चमी के द्विवचन मे पूर्ववत् ‘रामाभ्याम्’ प्रयोग सिद्ध होता है। बहुवचन मे चतुर्थी विभक्ति के बहुवचन के समान ‘रामेभ्यः’ प्रयोग बनता है। षष्ठी के एकवचन म ‘ङस्’ प्रत्यय हो कर टाङसिङसामिनात्स्या० (१४०) से उसे सर्वादेश ‘स्य’ हो ‘रामस्य’ प्रयोग सिद्ध होता है। षष्ठी के द्विवचन मे ‘ओस्’ प्रत्यय आकर—राम+ओस्। अब वृद्धि का बाध कर अतो गुणे (२७४) से पररूप प्राप्त होने पर अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१४७) ओसि च ॥७।३।१०४॥ (ओसि परे) अतोऽङ्गस्यैकारः। रामयोः ॥ अर्थ—ओस् परे होने पर अदन्त अङ्ग के स्थान पर एकार आदेश हो। व्याख्या—ओसि ।७।१। च इत्यव्ययपदम्। अतः ।६।१। (अतो दीर्घो यञि से)। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। एत् ।१।१। (बहुवचने झल्येत् से)। ‘अङ्गस्य’ का विशेषण होने से ‘अत’ में तदन्तविधि हो जाती है। अर्थ—(ओसि) ओस् परे होने पर (अत ) अदन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (एत्) ‘ए’ आदेश हो जाता है। अलोऽन्त्यपरिभाषा से अङ्ग के अन्त्य अल् अकार को ही एकार आदेश होगा। ‘राम + ओस्’ यहां अदन्त अङ्ग ‘राम’ है। उस से परे ‘ओस्’ है। अत ओसि च से अङ्ग के अन्त्य अकार को एकार हो कर ‘रामे + ओस्’ इस अवस्था मे एचोऽय- वायावः (२२) से एकार के स्थान पर अय् आदेश हो जाता है—रामयोस्। अब सकार को रुत्व विसर्ग करने से ‘रामयो’ प्रयोग सिद्ध होता है। षष्ठी के बहुवचन में ‘आम्’ प्रत्यय आकर ‘राम + आम्’ हुआ। अब सवर्ण- दीर्घ के प्राप्त होने पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—