लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १८५ [लघु०] विधि-सूत्रम्— (१४८) ह्रस्वनद्यापो नुट् ।७।१।५४॥ ह्रस्वान्ताद् नद्यन्ताद् आवन्ताच्चाङ्गात् परस्यामो नुँडागमः ॥ अर्थः—ह्रस्वान्त, नद्यन्त तथा आवन्त अङ्गों से परे आम् का अवयव नुट् हो जाता है। व्याख्या—ह्रस्वनद्यापः ।५।१। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य यह अधिकृत है। यहां विभक्ति का विपरिणाम हो जाता है)। आमः ।६।१। (आमि सर्वनाम्नः सुँट् से विभक्ति- विपरिणाम कर के)। नुट् ।१।१। समासः—ह्रस्वश्च नदी च आप् च = ह्रस्वनद्याप्, तस्मात् = ह्रस्वनद्यापः । समाहारद्वन्द्वः। यह 'अङ्गात्' का विशेषण है अतः इस से तदन्तविधि हो जाती है। 'नदी' एक संज्ञा है इस का वर्णन यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) सूत्र में आगे किया जायेगा। टाप्, डाप्, चाप्—इन स्त्रीप्रत्ययो के आद्य अनुबन्धों का लोप कर 'आप्' शेष रहता है उसी का यहां ग्रहण है। अर्थः—(ह्रस्वनद्यापः) ह्रस्वान्त, नद्यन्त तथा आवन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (आमः) आम् का अवयव (नुट्) नुँट् हो जाता है। 'नुट्' टित् है अतः आद्यन्तौ टकितौ (८५) द्वारा 'आम्' का आद्यवयव होगा। 'राम + आम्' यहां 'राम' ह्रस्वान्त अङ्ग है, इस से परे आम् विद्यमान है। अतः प्रकृतसूत्र से आम् का आद्यवयव नुट् हो गया—'राम + नुट् आम्'। नुट् में टकार हलन्त्यम् (१) द्वारा इत्सञ्ज्ञक है, उकार उच्चारणार्थ है; न् अवशिष्ट रहता है। 'राम + नाम्' इस अवस्था में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (१४६) नामि ।६।४।३॥ (नामि परे) अजन्ताङ्गस्य दीर्घः। रामाणाम्। रामे। रामयोः। एत्त्वे कृते— अर्थः—नाम् परे हो तो अजन्त अङ्ग के स्थान पर दीर्घ हो जाता है। एत्त्वे कृते—सप्तमी के बहुवचन में एत्त्व करने पर (अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है)। व्याख्या—नामि ।७।१। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। दीर्घः ।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से)। अचश्च (१.२.२८) परिभाषा द्वारा 'अचः' पद उपस्थित हो कर 'अङ्गस्य' का विशेषण बन जाता है अतः इस से तदन्त-विधि हो कर 'अजन्तस्य' बन जायेगा। अर्थः—(नामि) नाम् परे होने पर (अचः) अजन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ हो जाता है। अलोऽन्त्यपरिभाषा द्वारा यह दीर्घ अजन्त अङ्ग के अन्त्य अल् = अच् को ही होगा। 'राम + नाम्' यहां नाम् परे होने से अजन्त अङ्ग 'राम' के अन्त्य अकार को दीर्घ हो कर 'रामा + नाम्'। अब इस अवस्था में अट्कुप्वाङ्० (१३८) से आ = अट्, म् = पवर्ग, आ = अट् के व्यवधान होने पर भी नकार के स्थान पर णकार हो कर— 'रामाणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। सप्तमी के एकवचन में 'ङि' प्रत्यय आ कर 'राम + ङि' हुआ। ङकार की {