भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 201

१८६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

लशक्वतद्धिते (१३६) से इत् सञ्ज्ञा हो लोप करने पर 'राम + इ' बना । अब आद् गुण (२७) से गुण एकादेश हो कर 'रामे' प्रयोग सिद्ध होता है। सप्तमी के द्विवचन में रामयो रूप षष्ठी के द्विवचन की तरह सिद्ध होता है। सप्तमी के बहुवचन में राम + सुप् यहां पकार की इत्सञ्ज्ञा और लोप हो कर बहुवचने झल्येत् (१४५) सूत्र से मकारोत्तर अकार को एकार आदेश करने पर 'रामे

  • सु' हुआ । अब अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्—(१५०) आदेश-प्रत्यययोः ।८।३।५९॥ इण्कोभ्यां परस्याऽपदान्तस्यादेशः, प्रत्ययावयवश्च यः सस्तस्य मूर्द्धन्या- देशः । ईषद्विवृतस्य सस्य तादृश एव षः । रामेषु । एवं कृष्णादयोऽप्यदन्ताः ॥ अर्थ—इण् प्रत्याहार या कवर्ग से परे अपदान्त जो आदेश रूप सकार अथवा प्रत्यय का अवयव जो सकार उस के स्थान पर मूर्द्धन्य (मूर्द्धास्थान वाला) आदेश हो। ईषद्विवृतस्य—ईषद्विवृतप्रयत्न वाले सकार के स्थान पर वैसा ईषद्विवृत षकार ही होगा । इसी प्रकार कृष्ण आदि अदन्त (पुल्लिङ्ग) शब्दों के रूप बनेंगे। व्याख्या—इण्कोः ।५।१। (यह अधिकृत है) । आदेश प्रत्यययोः ।६।२। अप- दान्तस्य ।६।१। (अपदान्तस्य मूर्द्धन्य यह अधिकृत है) । सः ।६।१। (सहेः साडः सः म्) । मूर्द्धन्यः ।१।१। समास—इण् च कुश्च=इण्कू, तस्मात्=इण्कोः, समाहारद्वन्द्वः । पुंस्त्वमार्षम् । आदेशश्च प्रत्ययश्च=आदेश प्रत्ययौ, तयोः=आदेश प्रत्यययोः, इतरेतर- द्वन्द्वः । यहां व्याख्यान द्वारा 'आदेश' के साथ अभेदात्मिका षष्ठी और 'प्रत्यय' के साथ अवयवषष्ठी है। अर्थात् 'आदेशस्य = आदेश का सकार' इस का तात्पर्य होगा— 'आदेशरूप सकार' । 'प्रत्ययस्य = प्रत्यय का सकार' इस का तात्पर्य होगा='प्रत्यय का अवयव सकार' । यदि 'आदेशस्य' यहां अभेदात्मिका षष्ठी न मान कर अवयवषष्ठी मानते हैं तो 'तिसृणाम्' यहां भी 'तिसृ' आदेश के अवयव सकार को इण् से परे मूर्द्धन्य प्राप्त होता है जो अनिष्ट है। अभेदात्मिका षष्ठी मानने से कोई दोष नहीं आता, क्योंकि 'तिसृ' में सकार आदेशरूप नहीं, आदेश का अवयव है। आदेशरूप तो 'तिसृ' सम्पूर्ण है। इसी प्रकार यदि 'प्रत्ययस्य' यहां अवयवषष्ठी न मान कर अभेदात्मिका षष्ठी मानें तो रामेषु, हरिषु करोषि, चिनोषि आदि प्रयोग तथा हलि सर्वेषाम् (१०६), बहुषु बहुवचनम् (१२८), लिङ्सिचावात्मनेपदेषु (५८६) इत्यादि पाणिनि के निर्देश अनुपपन्न होंगे। तब सात्पदाद्योः (१२४१) सूत्र द्वारा सात् को षत्व करने का निषेध भी अयुक्त हो जायेगा। अतः 'प्रत्ययस्य' में अवयव षष्ठी ही युक्तियुक्त, कार्यसाधिका तथा पाणिन्यनुमोदिता है। अर्थ—(इण्कोः) इण् प्रत्याहार या कवर्ग से परे (आदेश- प्रत्यययोः) आदेशरूप या प्रत्यय के अवयव (अपदान्तस्य) अपदान्त (सः) स् के स्थान पर (मूर्द्धन्यः) मूर्द्धास्थानीय वर्ण आदेश होता है। यहां इण्प्रत्याहार (११) सूत्र पर लिखी व्यवस्थानुसार पर अर्थात् लँण् (प्रत्याहारसूत्र ६) के णकार तक ग्रहण किया जाता है। मूर्ध्नि भवः = मूर्द्धन्यः, जा