भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 202

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १८७ वर्ण मूर्धा-स्थान से निष्पन्न हो उसे मूर्धन्य कहते हैं । मूर्धन्य वर्ण आठ हैं—ऋ, ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण्, र्, ष् । यहां स्थानीय सकार के साथ इन में से किसी का स्थान तुल्य हो यह असम्भव है । अब शेष रहा यत्न । सकार का 'ईषद्विवृत' आभ्यन्तर-यत्न तथा 'विवार, श्वास, अघोष' बाह्ययत्न है । मूर्धन्य वर्णों में इस प्रकार के यत्न वाला 'ष्' के अति- रिक्त अन्य कोई वर्ण नहीं अतः सकार के स्थान पर षकार ही मूर्धन्य आदेश होगा ।¹ 'रामे + सु' यहां मकारोत्तर एकार इण् है । इस से परे 'सु' प्रत्यय के अवयव अपदान्त सकार को इस सूत्र से मूर्धन्य षकार हो कर—'रामेषु' प्रयोग सिद्ध होता है । आदेशरूप सकार के उदाहरण—'सुष्वाप' प्रभृति हैं । इण् कवर्ग से परे षत्व- विधान करने से—'रामस्य, पुरुषस्य' इत्यादियों में सकार को षकार नहीं होता । एवम् 'अपदान्त' कहने से—'कविस्तिष्ठति, हरिस्तत्र' इत्यादियों में पदान्त सकार को षकार नहीं होता । रामशब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा—

विभक्तिएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथमारामःरामौरामाः
द्वितीयारामम्"रामान्
तृतीयारामेणरामाभ्याम्रामैः
चतुर्थीरामाय"रामेभ्यः
पञ्चमीरामात्, रामाद्""
षष्ठीरामस्यरामयोःरामाणाम्
सप्तमीरामे"रामेषु
सम्बोधनहे राम !हे रामौ !हे रामाः !

यद्यपि ग्रन्थकार ने सम्बोधनविभक्ति को प्रथमाविभक्ति के अनन्तर रखा है; १. यद्यपि 'मूर्धन्यः' के स्थान पर 'षः' लिखने में लाघव था; तथापि इणः षीध्वम्० (५१४) आदि सूत्रों में 'षः' की अनुवृत्ति जाने से अनिष्टापत्ति हो जाती; क्योंकि 'एधाञ्चकृढ्वे' में मूर्धन्य ढ् अभीष्ट है ष् नहीं—अतः 'मूर्धन्यः' लिखा गया है ।