लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
१७४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् जहा पर केवलमात्र प्रकृति ही होगी उस से आगे तथा प्रत्यय से पूर्व अन्य कोई स्थित न होगा, वहा केवल प्रकृति की ही अङ्गसञ्ज्ञा हो जायेगी; अर्थात् व्यपदे- शिवद्भाव से 'तदादि' केवल प्रकृति ही समझी जायेगी [देखो-आद्यन्तवदेकस्मिन् (२७८)]। 'राम+सुं' यहा रामशब्द से 'सुं' प्रत्यय का विधान है अत उस प्रत्यय के परे होने पर तदादि=रामशब्द की अङ्गसञ्ज्ञा हो जाती है। अब अग्रिमसूत्र मे अङ्गसञ्ज्ञा का उपयोग दर्शाते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१३४) एङ्ह्रस्वात् सम्बुद्धेः ।६।१।६७॥ एङन्ताद् ह्रस्वान्ताच्चाङ्गाद्धल् लुप्यते सम्बुद्धेश्चेत् ॥ अर्थ.—एङन्त अङ्ग तथा ह्रस्वान्त अङ्ग से परे हल् का लोप हो जाता है यदि वह सम्बुद्धि का हो तो। अब 'पीत' और 'अम्बर' शब्द का बहुव्रीहिसमास किया तो बना—पीताम्बर । इस का अर्थ है—पीले कपडो वाला। इस अर्थ मे किसी अन्यपदार्थ (पुरुष) की प्रधानता है जिस के पीले कपडे हैं। इसी प्रकार 'दृष्टा' का अर्थ है 'देखी गई' और 'मथुरा' का अर्थ है 'एक नगरी'। अब 'दृष्टा' और 'मथुरा' का बहुव्रीहि- समास किया तो बना—दृष्टमथुर । इस का अर्थ है—जिस से मथुरा देखी गई है वह पुरुष। इस अर्थ मे किसी अन्यपदार्थ (पुरुष) की प्रधानता है। अत एव बहुव्रीहिसमास अन्यपदार्थप्रधान कहाता है। इस बहुव्रीहि समास के पुन दो भेद हो जाते हैं—१ तद्गुणसविज्ञान-बहुव्रीहिसमास, २ अतद्गुणसविज्ञान-बहुव्रीहि- समास। जिस बहुव्रीहिसमास में अन्यपदार्थ की प्रधानता के साथ साथ समस्यमान पदों के अर्थों का भी प्रवेश हो वह 'तद्गुणसविज्ञान-बहुव्रीहिसमास' होता है। यथा—'पीताम्बर' यहा अन्यपदार्थ=पुरुष की प्रधानता के साथ साथ समस्यमान पदों के अर्थ का भी त्याग नहीं हुआ। यदि कहा जाये कि 'पीताम्बरमानय' (पीले कपडे वाले को लाओ) तो उस पुरुष के साथ पीले कपडे भी आएगे। अत यहा तद्गुणसविज्ञान बहुव्रीहिसमास है। जहा अन्यपदार्थ के साथ समस्यमान पदो के अर्थ का प्रवेश नही होता वहा 'अतद्गुणसविज्ञान-बहुव्रीहिसमास' होता है। यथा—दृष्टमथुर। यहा अन्यपदार्थ (पुरुष) की प्रधानता के साथ समस्यमान पदों के अर्थों का प्रवेश नहीं होता। यदि कहा जाये कि—'दृष्टमथुरमानय' (जिस ने मथुरा देखी है उसे लाओ) तो उस पुरुष के साथ देखी गई मथुरा नही आएगी, अत यहा 'अतद्गुणसविज्ञान- बहुव्रीहिसमास' है। इसी प्रकार 'चित्रगुमानय' आदि मे समझना चाहिये। उपर्युक्त सूत्र में 'तदादि' (तत्=प्रकृतिरूपम् आदिर्यस्य तत्=तदादि) यहा 'तद्गुणसंविज्ञानबहुव्रीहि' समास है, अत यहा अन्यपदार्थ (जिस के आदि मे प्रकृति होगी) के साथ उस (प्रकृति) की भी अङ्गसञ्ज्ञा हो जायेगी।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १७५ व्याख्या — एङ्ह्रस्वात् ।५।१। सम्बुद्धेः ।६।१। हल् ।१।१। (हल्ङ्याब्भ्यः० से)। लोपः ।१।१। (लोपो व्योर्वलि से) । लुप्यत इति लोपः, कर्मणि घञ् । समासः—एङ् च ह्रस्वश्च = एङ्ह्रस्वम्, तस्मात् = एङ्ह्रस्वात्, समाहारद्वन्द्वः । 'एङ् और ह्रस्व से परे सम्बुद्धि के हल् का लोप होता है' ऐसा अर्थ होने से 'हे कतरत् कुल' यहां दोष उत्पन्न होता है । तथाहि —नपुंसकलिङ्ग में 'कतर' शब्द से सम्बुद्धि अर्थात् सम्बोधन का एकवचन 'सुं' करने पर अद्दतरादिभ्यः पञ्चभ्यः (२४१) से उसे अद्द् आदेश हो जाता है—कतर+अद् (द्) । पुनः डित्वसामर्थ्य से रेफोत्तर अकार का लोप हो — कतर्+अद् = 'कतरद्' बनता है । अब 'एङ् और ह्रस्व से परे सम्बुद्धि के हल् का लोप होता है' इस प्रकार का यदि अर्थ होगा तो 'कतर-द्' यहां रेफोत्तर ह्रस्व अकार से सम्बुद्धि के हल् दकार का लोप प्राप्त होगा जो अनिष्ट है । अतः इस की निवृत्ति के लिये इस सूत्र में 'अङ्गात्' का अध्याहार किया जाता है (क्योंकि सम्बुद्धि प्रत्यय का विधान होने से एङ् और ह्रस्व स्वतः अङ्ग होंगे ही) । 'एङ्ह्रस्वात्' को 'अङ्गात्' का विशेषण बना कर तदन्तविधि करने से—'एङन्तह्रस्वान्तादङ्गात्' ऐसा अर्थ निष्पन्न होता है । इस अर्थ के होने से 'कतरद्' आदि में कोई दोष नहीं आता । क्योंकि यहां अङ्ग ह्रस्वान्त नहीं प्रत्युत रेफान्त है, रेफोत्तर अकार तो 'अद्द्' प्रत्यय् का ही अवयव है । अतः दकारलोप न हो कर इष्ट रूप सिद्ध हो जाता है । अर्थः— (एङ्ह्रस्वात्) एङन्त और ह्रस्वान्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (सम्बुद्धेः) सम्बुद्धि का (हल्) हल् (लोपः) लुप्त किया जाता है । एङन्त के उदाहरण 'हे हरे!, हे विष्णो!' आदि आगे आयेंगे । यहां ह्रस्वान्त का उदाहरण प्रस्तुत है— राम+सुँ = 'राम+स्' यहां 'राम' इस ह्रस्वान्त अङ्ग से परे 'स्' यह सम्बुद्धि का हल् वर्त्तमान है अतः प्रकृत सूत्र से उस का लोप हो 'राम' यह प्रयोग सिद्ध होता है । 'हे' आदि शब्दों को साथ में जोड़ने से—'हे राम !, भो राम !' आदि बनेंगे । सम्बोधन का द्विवचन और बहुवचन प्रथमावत् सिद्ध होता है । हे रामौ !, हे रामाः ! । नोट — सम्बोधन के द्विवचन और बहुवचन में प्रथमा से कुछ भी भेद नहीं हुआ करता; भेद सम्बुद्धि में ही होता है । अतः आगे सर्वत्र हम सम्बुद्धि की ही सिद्धि करेंगे । द्विवचन और बहुवचन में स्वयं प्रथमावत् सिद्धि कर लेनी चाहिये । अब द्वितीया विभक्ति के रूप सिद्ध किये जाते हैं । द्वितीया के एकवचन में 'राम+अम्' बना । अब यहां क्रमशः अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ, अतो गुणे (२७४) से उस का बाध कर पररूप तथा प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) से पररूप का बाध कर पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है । इस अवस्था में अग्रिमसूत्र से पूर्वसवर्णदीर्घ का भी बाध हो जाता है । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१३५) अमि पूर्वः ।६।१।१०३॥ अकोऽम्यचि पूर्वरूपमेकादेशः स्यात् । रामम् । रामौ ॥
१७६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् अर्थ — अक् से अम् में विद्यमान अच् परे हो तो पूर्व+पर के स्थान पर एक पूर्वरूप आदेश होता है। व्याख्या—अकः ।५।१। (अकः सवर्णे दीर्घः से)। अमि ।७।१। अचि ।७।१। (इको यणचि से)। पूर्वपरयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्वपरयोः यह अधिकृत है)। पूर्वम् ।१।१। अर्थ — (अकः) अक् प्रत्याहार से (अमि) अम् प्रत्यय में स्थित (अचि) अच् के परे होने पर (पूर्वपरयोः) पूर्व+पर के स्थान पर (एकः) एक (पूर्वम्) पूर्व वर्ण आदेश हो जाता है। 'राम + अम्' यहाँ मकारोत्तर अकार = अक् से परे अम् का अच् = अकार विद्यमान है। अतः प्रकृतसूत्र से पूर्व + पर के स्थान पर पूर्व = अकार का रूप हो कर — राम् 'अ' म् = 'रामम्' प्रयोग सिद्ध हुआ। द्वितीया के द्विवचन में 'राम + औट्' हुआ। टकार की हलन्त्यम् (१) से इत् सञ्ज्ञा हो कर तस्य लोपः (३) से लोप हो जाता है — राम + औ। अब प्रथमा के द्विवचन के समान पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध हो कर वृद्धि हो जाती है—रामौ। द्वितीया के बहुवचन में 'राम + शस्' हुआ। अब शकार की इत्सञ्ज्ञा करने के लिये अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१३६) लशक्वतद्धिते ।१।३।८॥ तद्धितवर्जप्रत्ययाद्या ल-श-कवर्गा इतः स्युः ॥ अर्थ —तद्धितभिन्न प्रत्यय के आदि में ल्, श् और कवर्ग इत् हों। व्याख्या प्रत्ययस्य ।६।१। (ष प्रत्ययस्य से)। आदिः ।१।१। (आदिर्ञिटुडवः से लिङ्गविपरिणाम द्वारा)। लशकु ।१।१। इतः ।१।१। (उपदेशेऽजनुनासिक इत् से)। अतद्धिते ।७।१। समास —लश्च शश्च कुश्च एषां समाहारः, लशकु, समाहारद्वन्द्वः। न तद्धिते = अतद्धिते, नञ्समासः। अर्थ —(प्रत्ययस्य) प्रत्यय के (आदि) आदि में स्थित (लशकु) लकार, शकार और कवर्ग (इत्) इत्सञ्ज्ञक होते हैं (अतद्धिते) परन्तु तद्धित में नहीं होने। तद्धितप्रत्यय में निषेध होने से कपु, ण, घिनुन्, घ, शस्, लच् आदि में इत्सञ्ज्ञा न होगी। यथा—व्यूढोरस्क, वाग्मी, लोमश, चूडाल आदि। 'राम+शस्' यहाँ 'शस्' तद्धित नहीं अतः प्रकृत सूत्र से इस के आदि में स्थित शकार की इत्सञ्ज्ञा हुई और लोप हो गया—राम + अस्। अब प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) से पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर 'रामास्' बन गया। इस अवस्था में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१३७) तस्माच्छसो नः पुंसि ।६।१।१०३॥ पूर्वसवर्णदीर्घात् परो यः शसः सस्तस्य नः स्यात् पुंसि ॥ अर्थ —पूर्वसवर्ण-दीर्घ से परे जो शस् का सकार उस के स्थान पर नकार हो जाता है पुंलिङ्ग में। व्याख्या—तस्मात् ।५।१। शसः ।६।१। नः ।१।१। पुंसि ।७।१। नकारादकार उच्चारणार्यः। 'तद्' शब्द पूर्व का बोध कराया करता है। इस सूत्र से पूर्व प्रथमयोः
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १७७ पूर्वसवर्णः (१२६) में पूर्वसवर्णदीर्घ का विधान है। अतः यहां 'तस्मात्' शब्द से भी 'पूर्वसवर्णदीर्घात्' का ग्रहण होगा। अर्थः- (तस्मात् = पूर्वसवर्णदीर्घात्) उस पूर्वविहित पूर्वसवर्णदीर्घ से परे¹ (शसः) शस् के स्थान पर (नः) न् हो जाता है (पुंसि) पुँल्- लिङ्ग में। अलोऽन्त्यस्य (२१) से यह नकार आदेश शस् के अन्त्य अल् सकार को ही होगा। 'रामास्' यहां मकारोत्तर आकार पूर्वसवर्णदीर्घ है अतः इस से परे शस् के सकार को नकार हो कर - 'रामान्' बना। अब यहां अनिष्ट णत्व प्राप्त होता है। उस का परिहार करने के लिये ग्रन्थ- कार प्रथम णत्वविधायक सूत्र लिखते हैं- [लघु०] विधि-सूत्रम् - (१३८) अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि ।८।४।२॥ अट्, कवर्ग, पवर्ग, आङ्, नुम् एतैर्व्यस्तैर्यथासम्भवं मिलितैश्च व्यव- धानेऽपि रषाभ्यां परस्य नस्य णः समानपदे। इति प्राप्ते- अर्थः-अट् प्रत्याहार, कवर्ग, पवर्ग, आङ् और नुम् इन का अलग २ या यथासम्भव दो तीन अथवा चारों का मिल कर व्यवधान होने पर भी समानपद में रेफ और षकार से परे नकार को णकार हो जाता है। इस सूत्र के प्राप्त होने पर [अग्रिम- सूत्र निषेध करता है]। व्याख्या-अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवाये ।७।१। अपि इत्यव्ययपदम्। समानपदे ।७।१। रषाभ्याम् ।५।२। नः ।६।१। णः ।१।१। (रषाभ्यां नो णः समानपदे से)। णकारादकार उच्चारणार्थः। इस सूत्र से पूर्व अष्टाध्यायी में रषाभ्यां नो णः समानपदे सूत्र पढ़ा गया है। वह सूत्र समानपद में रेफ और षकार से परे अव्यवहित (व्यवधान-रहित) नकार को णकार करता है। यथा-चतुर्णाम्, पुष्णाति आदि। परन्तु यह सूत्र 'नरा- णाम्, पुरुषेण' प्रभृति प्रयोगों में व्यवहित नकार को णकार करने के लिये रचा गया है। समासः-अट् च कुश्च पुश्च आङ् च नुम् च = अट्कुप्वाङ्नुमः, इतरेतरद्वन्द्वः। तैर्व्यवायः (व्यवधानम्) = अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायः, तृतीयातत्पुरुषः। तस्मिन् = अट्- कुप्वाङ्नुम्व्यवाये, भावसप्तमी। अर्थः - (अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवाये) अट्प्रत्याहार, कवर्ग, पवर्ग, आङ् और नुम् इन से व्यवधान होने पर (अपि) भी (रषाभ्याम्) रेफ और षकार से परे (नः) न् के स्थान पर (णः) ण् हो जाता है (समानपदे) समानपद अर्थात् अखण्ड पद में। जिस पद के खण्ड अर्थात् टुकड़े कर उन का स्वतन्त्र रूप से प्रयोग न किया जा सके उसे समानपद या अखण्डपद कहते हैं। 'रामान्' अखण्डपद है, इस के खण्ड नहीं किये जा सकते। इसलिये यहां णकार प्राप्त है। 'रघुनाथः, रमानाथः, रामनाम' १. जहां पूर्वसवर्णदीर्घ न होगा, वहां पर पुंल्लिङ्ग में भी शस् के स् को न् न होगा। जैसे-गाः। 'गो+शस्' यहां पर ओतोऽम्शसोः (२१४) से पूर्व+पर के स्थान पर 'आ' आदेश हुआ है, अतः पूर्वसवर्णदीर्घ न होने से न् भी न हुआ। ल० प्र० (१२)
१७८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ये अखण्डपद नहीं इनके खण्ड हो सकते हैं। रघु और नाथ इन दोनों खण्डों का स्व- तन्त्र प्रयोग किया जा सकता है। इसलिये इन में णत्व नहीं हुआ। अब यहां यह विचार उपस्थित होता है कि क्या अट्, कवर्ग आदि सब का व्यवधान हो तो णत्व होता है ? या इन में से किसी एक का व्यवधान होने पर णत्व होता है ? पहला पक्ष असम्भव है क्योंकि संस्कृतसाहित्य में ऐसा कोई शब्द नहीं जिस में रेफ या षकार से परे अट्, कवर्ग आदि सब से व्यवहित णकार हो। अतः लक्ष्य (उदाहरण) न मिलने के कारण 'सब का व्यवधान हो तो णत्व होता है' यह पक्ष असङ्गत है। दूसरा पक्ष ठीक है। इस से 'नराणाम्, कराणाम्, पुरुषेण' आदि प्रयोगों की सिद्धि हो जाती है। करणे यज (८०७), स्तोकान्तिकदूरार्थकृच्छ्राणि क्तेन (६२६) इत्यादि पाणिनिसूत्रों से भी इस पक्ष की पुष्टि होती है। इन सूत्रों में मुनि ने एक २ का व्यवधान होने पर णकार आदेश किया है। किञ्च - इस पक्ष के अतिरिक्त एक अन्य पक्ष भी महामुनि के सूत्रपाठ में पुष्ट होता है। वह यह है कि 'अट्, कवर्ग आदियों में चाहे जितने वर्णों का व्यवधान हो णत्व हो जाय। मुनि ने—सरूपाणाम् एकशेष एकविभक्तौ (१२५), कर्मणि द्वितीया (८६१), इन्हन्पूषार्यम्णां शौ (२८४) इत्यादि सूत्रों में यथासम्भव अनेकों का व्यवधान होने पर भी णकार आदेश किया है। ग्रन्थकार ने इन दोनों पक्षों का—एतैर्व्यस्तैैर्यथासम्भवं मिलितैश्च इन शब्दों में वर्णन किया है। इन के उदाहरण यथा— अट्—वरणम्, हरणम्, करिणा, कुरुणा, गिरीणाम्, अर्हेण इत्यादि। कवर्ग—अर्केण, मूर्खाणाम्, गर्गेण, अर्घेण इत्यादि। पवर्ग—दर्पेण, रेफेण, गर्मेण, चर्मणा, वर्मणा इत्यादि। आङ्—पर्याणद्धम्, निराणद्धम् इत्यादि¹। नुम्—बृंहणम्, तृंहणम् इत्यादि। यहां 'नुम्' से अनुस्वार अभिप्रेत है। वह अनुस्वार चाहे 'नुँम्' के स्थान पर हुआ हो या स्वाभाविक हो इस में कुछ प्रयोजन नहीं। यथा—'बृंहणम्' यहां नुँम् के स्थान पर अनुस्वार हुआ है। 'तृंहणम्' यहां स्वाभाविक अनुस्वार है। सूचना—सम्पूर्ण णत्वप्रकरण में रेफ और षकार की तरह ऋवर्ण को भी णत्व में निमित्त समझना चाहिये। अत एव ऋतॄन्तॄच्—प्रशास्तॄणाम् (२०६) इत्यादि मुनिवर के निर्देश उपलब्ध होते हैं। आगे चल कर ग्रन्थकार ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम् (वा० २१) इस वार्तिक को स्वयं ही उद्धृत करेंगे। रामान् = र् + आ + म् + आ + न्। यहां रेफ से पर आ = अट्, म् = पवर्ग, १ इस सूत्र की अनुवृत्ति उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य (४५६) सूत्र में जाती है। अतः पर्याणद्धम् आदि में उस से णत्व हो जाता है। पदव्यवायेऽपि (८।४।३७) द्वारा निषेध नहीं होता। यही आङ् के ग्रहण का प्रयोजन है। इस पर विस्तृत विचार व्याकरण के उच्च ग्रन्थों में देखें।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १७६ आ=अट् इन तीन वर्णों से व्यवहित नकार है अतः अट्कु० सूत्र से णकार प्राप्त होता है। अब इस का अग्रिमसूत्र से निषेध करते है— [लघु०] निषेध-सूत्रम् (१३६) पदान्तस्य ।८।४।३६॥ नस्य णो न। रामान् ॥ अर्थ:—पदान्त नकार को णकार नहीं होता। व्याख्या—पदान्तस्य ६।१। नः ।६।१। णः ।१।१। (रषाभ्यां नो णः समान- पदे से) । न इत्यव्ययपदम् (न भाभूपू० से)। अर्थः—(पदान्तस्य) पद के अन्त वाले (नः) न् के स्थान पर (णः) ण् आदेश (न) नहीं होता। 'रामान्' यह सुबन्त होने से सुप्तिङन्तं पदम् (१४) के अनुसार पदसञ्ज्ञक है। यहां 'न्' पदान्त है। अतः प्रकृत पदान्तस्य से नकार को णकार होने का निषेध हो गया तो 'रामान्' प्रयोग सिद्ध हुआ। तृतीया के एकवचन में—राम+टा। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१४०) टाङसिँङसामिनात्स्याः ।७।१।१२॥ अदन्तात् टादीनामिनादयः स्युः। णत्वम्—रामेण॥ अर्थ:—अदन्त (अङ्ग) से परे टा को इन, ङसिँ को आत् और ङस् को स्य आदेश होता है। व्याख्या—अतः ।५।१। (अतो भिस ऐस् से)। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य यह अधिकृत है, इस का विभक्तिविपरिणाम हो जाता है)। टाङसिँङसाम् ।६।३। इनात्स्याः ।१।३। 'अङ्गात्' का विशेषण होने से 'अतः' से तदन्तविधि हो जाती है— अदन्ताद् अङ्गात्। अर्थः—(अतः=अदन्तात्) अदन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (टा- ङसिँ-ङसाम्) टा, ङसिँ, ङस् के स्थान पर (इनात्स्याः) इन, आत्, स्य आदेश हो जाते हैं। यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) के अनुसार टा को इन, ङसिँ को आत् तथा ङस् को स्य आदेश हो जाता है। ध्यान रहे कि इन और स्य आदेश अदन्त हैं। 'राम+टा' यहां 'राम' अदन्त अङ्ग है। इस से परे 'टा' को 'इन' आदेश हो जाता है। 'राम+इन' इस अवस्था में आद् गुणः (२७) से गुण एकादेश तथा अट्कु० (१३८) से नकार को णकार आदेश हो कर 'रामेण' रूप सिद्ध होता है। स्मरण रहे कि यहां पदान्तस्य (१३६) द्वारा णत्व का निषेध नहीं होता, क्योंकि यहां न्- पदान्त नही, पदान्त 'अ' है। तृतीया के द्विवचन में राम+भ्याम्। अब अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१४१) सुँपि च ।७।३।१०२॥ यञादौ सुँपि अतोऽङ्गस्य दीर्घः। रामाभ्याम् ॥ अर्थ:—यञादि सुँप् परे होने पर अदन्त अङ्ग को दीर्घ हो जाता है। व्याख्या—सुँपि ।७।१। च इत्यव्ययपदम्। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। अतः ।६।१। दीर्घः ।१।१। यञि ।७।१। (अतो दीर्घो यञि से)। 'यञि' पद 'सुँपि' पद का विशेषण है और अल् है इस लिये इस से तदादिविधि हो कर 'यञादौ सुँपि' बन
१८० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् जायेगा। 'अत' यह 'अङ्गस्य' का विशेषण है अत इस से तदन्तविधि होकर 'अदन्तस्य अङ्गस्य' हो जायेगा। अर्थ — (यञि) यञादि (सुपि) सुँप् परे होने पर (अत ) अदन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (दीर्घ ) दीर्घ हो जाता है। यञ् एक प्रत्याहार है, यञादि सुँप् — भ्याम्, भ्यस् आदि हैं। अलोऽन्त्यपरिभाषा द्वारा यह दीर्घ आदेश अदन्त अङ्ग के अन्त्य अल् = अत् के स्थान पर ही होता है। 'राम + भ्याम्' यहां 'भ्याम्' यञादि सुँप् है, अत इस के परे होने पर 'राम' इस अदन्त अङ्ग को दीर्घ हो — 'रामाभ्याम्' प्रयोग सिद्ध हुआ। तृतीया के बहुवचन में 'भिस्' प्रत्यय आकर 'राम + भिस्' हुआ। सुपि च (१४१) से दीर्घ के प्राप्त होने पर उस का बाध कर वक्ष्यमाण बहुवचने झल्येत् (१४५) सूत्र से अदन्त अङ्ग को एकार प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१४२) अतो भिस ऐस् ।७।१।९॥ अदन्ताद् अङ्गात् परस्य भिस ऐस् स्यात्। अनेकाल्शित्सर्वस्य (४५) —रामैः ॥ अर्थ — अदन्त अङ्ग से परे भिस् के स्थान पर ऐस् आदेश हो। व्याख्या—अत ।५।१। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य यह अधिकृत है, इस की विभक्ति का यहां विपरिणाम हो जाता है)। भिस ।६।१। ऐस् ।१।१। 'अङ्गात्' का विशेषण होने से 'अतः' से तदन्तविधि हो जायेगी। अर्थ — (अतः = अदन्तात्) अदन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (भिस ) भिस् के स्थान पर (ऐस्) ऐस् हो जाता है। यह आदेश तस्मादित्युत्तरस्य (७१) द्वारा अदन्त अङ्ग से परे भिस् को होना है। 'भिस' यह षष्ठीनिर्दिष्ट है। अत अलोऽन्त्यस्य (२१) से उस के अन्त्य अल् सकार को यह आदेश होना चाहिये। पर उस के बाधक आदे परस्य (७२) द्वारा भिस् के आदि अल् = भकार को ही प्राप्त होता है। इस पर अनेकाल्शित्सर्वस्य (४५) द्वारा उस का भी बाध कर सम्पूर्ण भिस् के स्थान पर ऐस् आदेश हो जाता है। 'राम + भिस्' यहां 'राम' यह अदन्त अङ्ग है अत इस से परे प्रकृत सूत्र द्वारा भिस् के स्थान पर ऐस् सर्वादेश होकर —राम + ऐस्। अब वृद्धिरेचि (३३) से पूर्व+पर के स्थान पर 'ऐ' वृद्धि हो रुँत्व विसर्ग करने से—'रामैः' प्रयोग सिद्ध होता है। अब रामशब्द के चतुर्थी विभक्ति के रूप सिद्ध किये जाते हैं। चतुर्थी के एक- वचन में 'राम + ङे' हुआ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१४३) ङेर्यः ।७।१।१३॥ अतोऽङ्गात् परस्य ङेर्यादेश ॥ अर्थ.—अदन्त अङ्ग से परे 'ङे' के स्थान पर 'य' आदेश हो। व्याख्या—अत ।५।१। (अतो भिस ऐस् से)। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य यह
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १८१ अविकृत है। यहां विभक्तिविपरिणाम हो जाता है)। ङे: ।६।१। (ङे + ङस् = ङे + अस् = ङेस् = ङेः, ङसिङसोश्चेति पूर्वरूपम्) । यः ।१।१। अर्थः— (अतः = अदन्तात्) अदन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (ङेः) ङे के स्थान पर (यः) 'य' आदेश होता है। ध्यान रहे कि 'य' आदेश सस्वर है। 'राम + ङे' यहां 'राम' यह अदन्त अङ्ग है अतः इस से परे ङे को 'य' आदेश हो—'राम + य' हुआ। यहां 'य' यञादि तो है पर सुँप् नहीं। सुँप् तो 'ङे' था, वह अब रहा नहीं। अतः सुपि च (१४१) से दीर्घ प्राप्त नहीं हो सकता। इस पर 'य' में सुँप्त्त्व धर्म लाने के लिये अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] अतिदेश-सूत्रम्—(१४४) स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ ।१।१।५५॥ आदेशः स्थानिवत् स्यात्, न तु स्थान्यलाश्रयविधौ। इति स्थानि- वत्त्वात् 'सुपि च' (१४१) इति दीर्घः—रामाय। रामाभ्याम्॥ अर्थः—आदेश स्थानी के समान होता है, परन्तु यदि स्थानी अल् के आश्रित कार्य करना हो तो वह स्थानिवत् नहीं होता। इति स्थानिवत्त्वात्० इस सूत्र से यकार के स्थानिवत् हो जाने से सुपि च (१४१) से दीर्घ हो कर 'रामाय' हुआ। व्याख्या—स्थानिवत् इत्यव्ययपदम्। आदेशः ।१।१। अनल्विधौ ।७।१। समासः- स्थानिना तुल्यम् इति स्थानिवत्, तेन तुल्यं क्रिया चेद् वतिः (११४८) इति वतिप्रत्ययः। (१) अला विधिः = अल्विधिः, तृतीयातत्पुरुषः। (२) अलः (परस्य) विधिः = अल्विधिः। पञ्चमी- तत्पुरुषः। (३) अलः (स्थाने) विधिः = अल्विधिः, षष्ठीतत्पुरुषः। (४) अलि (परे) विधिः = अल्विधिः, सप्तमीतत्पुरुषः। न अल्विधिः = अनल्विधिः, तस्मिन् = अनल्विधौ, नञ्तत्पुरुषः। अल् प्रत्याहार में सब वर्ण आ जाते हैं अतः अल् वर्ण का पर्याय है। यहां अल् स्थानी या स्थानी का अवयव ही ग्रहण किया जाता है। अर्थः— (आदेशः) आदेश (स्थानिवत्) स्थानी के समान होता है। परन्तु (अनल्विधौ) स्थान्यल् द्वारा, स्थान्यल् से परे, स्थान्यल् के स्थान पर या स्थान्यल् के परे होने पर विधि करनी हो तो वह स्थानिवत् नहीं होता। भाव—जिस के स्थान पर कुछ किया जाये उसे 'स्थानी' कहते हैं। यथा—ङेर्यः (१४३) द्वारा 'ङे' के स्थान पर 'य' किया जाता है अतः 'ङे' स्थानी है। इको यणचि (१५) द्वारा इक् के स्थान पर यण् किया जाता है अतः इक् स्थानी है। जो स्थानी के स्थान पर किया जाता है उसे 'आदेश' कहते हैं। यथा—ङेर्यः (१४३) में य और इको यणचि (१५) में यण् आदेश है। आदेश स्थानिवत् = स्थानी के समान = स्थानी के तुल्य धर्मवाला होता है अर्थात् जो कार्य स्थानी के होने से सिद्ध होते हैं वे आदेश के होने से भी सिद्ध हो जाते हैं। उदाहरण यथा— 'राम + य' यहां 'य' यञादि तो है पर सुँप् नहीं, अतः सुपि च (१४१) से दीर्घ प्राप्त नहीं हो सकता। अब प्रकृत सूत्र द्वारा आदेश 'य' के स्थानिवत् = ङेवत् होने से 'य' में सुप्त्व धर्म आ जाने के कारण सुपि च से दीर्घ हो—'रामाय' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। निम्नलिखित अवस्थाओं में आदेश स्थानिवत् न होगा—
१८२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
(१) यदि स्थानी अल् के द्वारा कोई विधि करनी हो तो आदेश स्थानिवत् नहीं होता । यथा— व्यूढोरस्केन' [व्यूढम् उरो यस्य स व्यूढोरस्कः, तेन = व्यूढोर- स्केन । बहुव्रीहिसमास १] यहां विसर्ग के स्थान पर सोऽपदादौ (८-३-३८) से सकार हुआ है । वार्त्तिककार एवं भाष्यकार ने विसर्ग का अट् प्रत्याहार में पाठ माना है । अब यदि इस सकार को स्थानिवद्भाव से विसर्ग मान लें तो यह अट् प्रत्याहार के अन्तर्गत हो जायगा । तब अट्कुप्वाङ्० (१३८) द्वारा नकार को णकार प्राप्त होगा जो अनिष्ट है । यहां स्थानी = विसर्ग = अल् के द्वारा णत्वविधि करनी है अतः आदेश = स् स्थानिवत् = विसर्गवत् न होगा । (२) यदि स्थानी अल् से परे कोई विधि करनी हो तो आदेश स्थानिवत् नहीं होता । यथा = द्यौः । 'दिव्' शब्द से सु प्रत्यय लाने पर दिव औत् (२६४) सूत्र द्वारा व्' को 'औ' हो—'दि औ स्' बना । अब यहां औ' इस आदेश को स्थानिवत् अर्थात् वकारवत् हल् मानने से हल्ङ्याब्भ्यो ० (१७६) द्वारा सकार का लोप प्राप्त होता है जो अनिष्ट है। यहां स्थानी अल् = वकार से परे लोपविधि करनी है अतः आदेश (औ) स्थानिवत् (वकारवत्) न होगा । (३) यदि स्थानी अल् के स्थान पर कोई विधि करनी हो तो आदेश स्था- निवत् नहीं होता । यथा— द्युकाम (दिव् कामयते, दिवि कामोऽस्येति वा) । यहां 'दिव् + काम' में दिव उत् (२६५) सूत्र द्वारा 'व्' को 'उ' होता है । यदि इस 'उ' आदेश को स्थानिवत् = वकारवत् मानें तो उस के वल् प्रत्याहार के अन्तर्गत होने के कारण लोपो व्योर्वलि (४२६) द्वारा वकारलोप प्राप्त होता है जो अनिष्ट है । यहां स्थानी अल् = वकार के स्थान पर लोपविधि करनी है अतः आदेश (उ) स्थानिवत् (वकारवत्) न होगा । (४) यदि स्थानी अल् के परे होने पर उस से पूर्व कोई विधि करनी हो तो भी आदेश स्थानिवत् नहीं होता । यथा—क इष्टः । 'इष्ट' यहां यज् धातु के यकार के स्थान पर सम्प्रसारण इकार किया गया है । 'कस् + इष्ट' यहां ससजुपो रुं (१०५) से रुं आदेश कर अनुबन्धलोप किया तो—'कर् + इष्ट' हुआ । अब यहां 'इष्ट' के इकार आदेश को स्थानिवत् = यकारवत् हश्प्रत्याहारान्तर्गत मानें तो हशि च (१०७) से रेफ के स्थान पर उत्व प्राप्त होता है जो अनिष्ट है । यहां स्थानी अल् यकार है; उस के परे होने पर उस से पूर्व रेफ को उत्वविधि करनी है अतः आदेश (इ) स्थानि- वत् (यकारवत्) न होगा ।१ नोट- इस सूत्र पर उपयोगी सब बातें हम ने लिख दी हैं । विद्यार्थियों को इस सूत्र का खूब अभ्यास कर लेना चाहिये, आगे इस का बहुत उपयोग होगा । १.-यहां प्रकृत 'रामाय' की सिद्धि में अलविधि की आशङ्का नहीं करनी चाहिये । यहां हम स्थानिवद्भाव से 'य' को सुप् समझ कर दीर्घ करने चले हैं । सुप्त्त्व धर्म केवल अल् से ही नहीं रहता बल्कि भ्याम्, भिस् आदि समुदायों में भी रहता है जो स्पष्टतः अल् नहीं ।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १८३ चतुर्थी के द्विवचन में 'रामाभ्याम्' पूर्ववत् सिद्ध होता है । चतुर्थी के बहुवचन में 'भ्यस्' प्रत्यय आ कर 'राम + भ्यस्' हुआ । अब सुपि च (१८४) के प्राप्त होने पर उस का अपवाद अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] विधि-सूत्रम्-(१८४) बहुवचने झल्येत् ।७।३।१०३॥ झलादौ बहुवचने सुंपि अतोऽङ्गस्यैकारः। रामेभ्यः। सुंपि किम् ? पचध्वम् ॥ अर्थः-झलादि बहुवचन सुँप् परे हो तो अदन्त अङ्ग के स्थान पर एकार आदेश हो। व्याख्या-अतः।६।१।(अतो दीर्घो यञि से)। अङ्गस्य ।६।१।(यह अधिकृत है)। बहुवचने ।७।१। झलि ।७।१। सुँपि ।७।१। (सुपि च से) । एत् ।१।१। 'अङ्गस्य' का विशेषण होने से 'अतः' से तदन्तविधि तथा 'सुँपि' का विशेषण होने से 'झलि' से यस्मिन्विधिस्तदा दावल्ग्रहणे द्वारा तदादिविधि हो जाती है। अर्थः- (झलि = झलादी) झलादि (बहुवचने) बहुवचन (सुँपि) सुँप् परे हो तो (अतः=अदन्तस्य) अदन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (एत्) 'ए' आदेश हो जाता है। अलोऽन्त्यस्य (२१) परिभाषा द्वारा यह 'ए' आदेश अन्त्य अल् = अत् के स्थान पर ही होता है। 'राम+भ्यस्' यहां 'भ्यस्' बहुवचन है, इस के आदि में भकार झल् है और यह सुँप् भी है। अतः इस के परे होने से प्रकृत सूत्र द्वारा मकारोत्तर अकार को एकार हो सकार को रुत्व विसर्ग करने से 'रामेभ्यः' प्रयोग सिद्ध होता है। 'सुंपि' कथन से इस सूत्र की प्रवृत्ति सुँप् में ही होती है। अन्यथा 'पचध्वम्' (तुम सब पकाओ) यहां भी एकार आदेश हो 'पचेध्वम्' ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता । 'ध्वम्' झलादि बहुवचन तो है पर सुँप् नहीं, तिङ् है। इस की साधनप्रक्रिया तिङन्त- प्रकरण में स्पष्ट होगी । 'बहुवचने' कहने से 'रामस्य' आदि में एत्व नहीं होता । अब रामशब्द के पञ्चमी के एकवचन में ङसिँ प्रत्यय आ कर 'राम + ङसिँ' बना । इस अवस्था में टाङसिं० (१४०) द्वारा ङसिँ को आत् आदेश हो सवर्णदीर्घ करने पर-रामात् । अब तकार झल् के पदान्त होने से झलां जशोऽन्ते (६७) द्वारा तकार को दकार करने से- रामाद् । अब विरामोऽवसानम् (१२४) सूत्र से दकार की अवसानसञ्ज्ञा हो कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] विधि-सूत्रम्-(१४६) वाऽवसाने ।८।४।५५॥ अवसाने झलां चरो वा । रामात्, रामाद् । रामाभ्याम् । रामेभ्यः । रामस्य ॥ अर्थः-अवसान में झलों को चर् विकल्प से हों । व्याख्या-अवसाने ।७।१। झलाम् ।६।३। (झलां जश्झशि से) । चर् ।१।१। (अभ्यासे चर्च से) । वा इत्यव्ययपदम् । अर्थः- (अवसाने) अवसान में (झलाम्) झलों के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (चर्) चर् हो जाते हैं। झल्-चर्-विषयक विस्तृत विवेचन पीछे (७४) सूत्र पर कर चुके हैं वहीं देखें ।
१८४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
‘रामाद्’ यहां अवसान म इस सूत्र से दकार = झल् को तकार = चर् विकल्प से आदेश करने पर—‘रामात्, रामाद्’ ये दो रूप सिद्ध होते हैं। नोट—अनेक वैयाकरण वाऽवसाने (१४६) सूत्र को झलां जशोऽन्ते (६७) सूत्र का अपवाद मानते हैं। अत ‘रामात्’ में प्रथम वाऽवसाने (१४६) से तकार को तकार कर पक्ष म झलां जशोऽन्ते (६७) द्वारा दकार किया करते हैं। किञ्च जहां २ कौमुदी म जश्त्व-चर्त्वे [जश्त्व और चर्त्व होते हैं] लिखा रहता है, वे वहा ‘जश् तु अचर्वे’ [चर्त्वाभावपक्ष म जश् हो जाता है] ऐसा पदच्छेद स्वीकार किया करते हैं। परन्तु हमें यह मत युक्त प्रतीत नहीं होता। क्योकि ऐसा मानने से ‘रत्नमुष्’ शब्द के ‘रत्नमुट्, रत्नमुड्’ ये दो रूप न बन सकेंगे। तथाहि—प्रथम चर्त्व करने से षकार को पकार हो कर—‘रत्नमुप्’ बनेगा। तदनन्तर जश्त्व हो—रत्नमुब्। इस प्रकार ‘रत्नमुप् रत्नमुद्’ ये दो रूप बन जायेंगे, ‘रत्नमुट्’ रूप न बन सकेगा। यद्यपि वे इस का ष्णान्ता षट् (२६७) आदि निर्देशो से परिहार करते हैं, तथापि उन कल्पनाओं के करने की अपेक्षा प्रथम जश्त्व कर तदनन्तर चर्त्व करने मे ही लाघव है। इस का विशेष विवरण हमारे नवीन मुद्रित शोधग्रन्थ न्यासपर्यालोचन मे पृष्ठ (२८६) पर देखें। पञ्चमी के द्विवचन मे पूर्ववत् ‘रामाभ्याम्’ प्रयोग सिद्ध होता है। बहुवचन मे चतुर्थी विभक्ति के बहुवचन के समान ‘रामेभ्यः’ प्रयोग बनता है। षष्ठी के एकवचन म ‘ङस्’ प्रत्यय हो कर टाङसिङसामिनात्स्या० (१४०) से उसे सर्वादेश ‘स्य’ हो ‘रामस्य’ प्रयोग सिद्ध होता है। षष्ठी के द्विवचन मे ‘ओस्’ प्रत्यय आकर—राम+ओस्। अब वृद्धि का बाध कर अतो गुणे (२७४) से पररूप प्राप्त होने पर अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१४७) ओसि च ॥७।३।१०४॥ (ओसि परे) अतोऽङ्गस्यैकारः। रामयोः ॥ अर्थ—ओस् परे होने पर अदन्त अङ्ग के स्थान पर एकार आदेश हो। व्याख्या—ओसि ।७।१। च इत्यव्ययपदम्। अतः ।६।१। (अतो दीर्घो यञि से)। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। एत् ।१।१। (बहुवचने झल्येत् से)। ‘अङ्गस्य’ का विशेषण होने से ‘अत’ में तदन्तविधि हो जाती है। अर्थ—(ओसि) ओस् परे होने पर (अत ) अदन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (एत्) ‘ए’ आदेश हो जाता है। अलोऽन्त्यपरिभाषा से अङ्ग के अन्त्य अल् अकार को ही एकार आदेश होगा। ‘राम + ओस्’ यहां अदन्त अङ्ग ‘राम’ है। उस से परे ‘ओस्’ है। अत ओसि च से अङ्ग के अन्त्य अकार को एकार हो कर ‘रामे + ओस्’ इस अवस्था मे एचोऽय- वायावः (२२) से एकार के स्थान पर अय् आदेश हो जाता है—रामयोस्। अब सकार को रुत्व विसर्ग करने से ‘रामयो’ प्रयोग सिद्ध होता है। षष्ठी के बहुवचन में ‘आम्’ प्रत्यय आकर ‘राम + आम्’ हुआ। अब सवर्ण- दीर्घ के प्राप्त होने पर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है—
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १८५ [लघु०] विधि-सूत्रम्— (१४८) ह्रस्वनद्यापो नुट् ।७।१।५४॥ ह्रस्वान्ताद् नद्यन्ताद् आवन्ताच्चाङ्गात् परस्यामो नुँडागमः ॥ अर्थः—ह्रस्वान्त, नद्यन्त तथा आवन्त अङ्गों से परे आम् का अवयव नुट् हो जाता है। व्याख्या—ह्रस्वनद्यापः ।५।१। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य यह अधिकृत है। यहां विभक्ति का विपरिणाम हो जाता है)। आमः ।६।१। (आमि सर्वनाम्नः सुँट् से विभक्ति- विपरिणाम कर के)। नुट् ।१।१। समासः—ह्रस्वश्च नदी च आप् च = ह्रस्वनद्याप्, तस्मात् = ह्रस्वनद्यापः । समाहारद्वन्द्वः। यह 'अङ्गात्' का विशेषण है अतः इस से तदन्तविधि हो जाती है। 'नदी' एक संज्ञा है इस का वर्णन यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) सूत्र में आगे किया जायेगा। टाप्, डाप्, चाप्—इन स्त्रीप्रत्ययो के आद्य अनुबन्धों का लोप कर 'आप्' शेष रहता है उसी का यहां ग्रहण है। अर्थः—(ह्रस्वनद्यापः) ह्रस्वान्त, नद्यन्त तथा आवन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (आमः) आम् का अवयव (नुट्) नुँट् हो जाता है। 'नुट्' टित् है अतः आद्यन्तौ टकितौ (८५) द्वारा 'आम्' का आद्यवयव होगा। 'राम + आम्' यहां 'राम' ह्रस्वान्त अङ्ग है, इस से परे आम् विद्यमान है। अतः प्रकृतसूत्र से आम् का आद्यवयव नुट् हो गया—'राम + नुट् आम्'। नुट् में टकार हलन्त्यम् (१) द्वारा इत्सञ्ज्ञक है, उकार उच्चारणार्थ है; न् अवशिष्ट रहता है। 'राम + नाम्' इस अवस्था में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्— (१४६) नामि ।६।४।३॥ (नामि परे) अजन्ताङ्गस्य दीर्घः। रामाणाम्। रामे। रामयोः। एत्त्वे कृते— अर्थः—नाम् परे हो तो अजन्त अङ्ग के स्थान पर दीर्घ हो जाता है। एत्त्वे कृते—सप्तमी के बहुवचन में एत्त्व करने पर (अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है)। व्याख्या—नामि ।७।१। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। दीर्घः ।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से)। अचश्च (१.२.२८) परिभाषा द्वारा 'अचः' पद उपस्थित हो कर 'अङ्गस्य' का विशेषण बन जाता है अतः इस से तदन्त-विधि हो कर 'अजन्तस्य' बन जायेगा। अर्थः—(नामि) नाम् परे होने पर (अचः) अजन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ हो जाता है। अलोऽन्त्यपरिभाषा द्वारा यह दीर्घ अजन्त अङ्ग के अन्त्य अल् = अच् को ही होगा। 'राम + नाम्' यहां नाम् परे होने से अजन्त अङ्ग 'राम' के अन्त्य अकार को दीर्घ हो कर 'रामा + नाम्'। अब इस अवस्था में अट्कुप्वाङ्० (१३८) से आ = अट्, म् = पवर्ग, आ = अट् के व्यवधान होने पर भी नकार के स्थान पर णकार हो कर— 'रामाणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। सप्तमी के एकवचन में 'ङि' प्रत्यय आ कर 'राम + ङि' हुआ। ङकार की {
१८६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
लशक्वतद्धिते (१३६) से इत् सञ्ज्ञा हो लोप करने पर 'राम + इ' बना । अब आद् गुण (२७) से गुण एकादेश हो कर 'रामे' प्रयोग सिद्ध होता है। सप्तमी के द्विवचन में रामयो रूप षष्ठी के द्विवचन की तरह सिद्ध होता है। सप्तमी के बहुवचन में राम + सुप् यहां पकार की इत्सञ्ज्ञा और लोप हो कर बहुवचने झल्येत् (१४५) सूत्र से मकारोत्तर अकार को एकार आदेश करने पर 'रामे
- सु' हुआ । अब अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्—(१५०) आदेश-प्रत्यययोः ।८।३।५९॥ इण्कोभ्यां परस्याऽपदान्तस्यादेशः, प्रत्ययावयवश्च यः सस्तस्य मूर्द्धन्या- देशः । ईषद्विवृतस्य सस्य तादृश एव षः । रामेषु । एवं कृष्णादयोऽप्यदन्ताः ॥ अर्थ—इण् प्रत्याहार या कवर्ग से परे अपदान्त जो आदेश रूप सकार अथवा प्रत्यय का अवयव जो सकार उस के स्थान पर मूर्द्धन्य (मूर्द्धास्थान वाला) आदेश हो। ईषद्विवृतस्य—ईषद्विवृतप्रयत्न वाले सकार के स्थान पर वैसा ईषद्विवृत षकार ही होगा । इसी प्रकार कृष्ण आदि अदन्त (पुल्लिङ्ग) शब्दों के रूप बनेंगे। व्याख्या—इण्कोः ।५।१। (यह अधिकृत है) । आदेश प्रत्यययोः ।६।२। अप- दान्तस्य ।६।१। (अपदान्तस्य मूर्द्धन्य यह अधिकृत है) । सः ।६।१। (सहेः साडः सः म्) । मूर्द्धन्यः ।१।१। समास—इण् च कुश्च=इण्कू, तस्मात्=इण्कोः, समाहारद्वन्द्वः । पुंस्त्वमार्षम् । आदेशश्च प्रत्ययश्च=आदेश प्रत्ययौ, तयोः=आदेश प्रत्यययोः, इतरेतर- द्वन्द्वः । यहां व्याख्यान द्वारा 'आदेश' के साथ अभेदात्मिका षष्ठी और 'प्रत्यय' के साथ अवयवषष्ठी है। अर्थात् 'आदेशस्य = आदेश का सकार' इस का तात्पर्य होगा— 'आदेशरूप सकार' । 'प्रत्ययस्य = प्रत्यय का सकार' इस का तात्पर्य होगा='प्रत्यय का अवयव सकार' । यदि 'आदेशस्य' यहां अभेदात्मिका षष्ठी न मान कर अवयवषष्ठी मानते हैं तो 'तिसृणाम्' यहां भी 'तिसृ' आदेश के अवयव सकार को इण् से परे मूर्द्धन्य प्राप्त होता है जो अनिष्ट है। अभेदात्मिका षष्ठी मानने से कोई दोष नहीं आता, क्योंकि 'तिसृ' में सकार आदेशरूप नहीं, आदेश का अवयव है। आदेशरूप तो 'तिसृ' सम्पूर्ण है। इसी प्रकार यदि 'प्रत्ययस्य' यहां अवयवषष्ठी न मान कर अभेदात्मिका षष्ठी मानें तो रामेषु, हरिषु करोषि, चिनोषि आदि प्रयोग तथा हलि सर्वेषाम् (१०६), बहुषु बहुवचनम् (१२८), लिङ्सिचावात्मनेपदेषु (५८६) इत्यादि पाणिनि के निर्देश अनुपपन्न होंगे। तब सात्पदाद्योः (१२४१) सूत्र द्वारा सात् को षत्व करने का निषेध भी अयुक्त हो जायेगा। अतः 'प्रत्ययस्य' में अवयव षष्ठी ही युक्तियुक्त, कार्यसाधिका तथा पाणिन्यनुमोदिता है। अर्थ—(इण्कोः) इण् प्रत्याहार या कवर्ग से परे (आदेश- प्रत्यययोः) आदेशरूप या प्रत्यय के अवयव (अपदान्तस्य) अपदान्त (सः) स् के स्थान पर (मूर्द्धन्यः) मूर्द्धास्थानीय वर्ण आदेश होता है। यहां इण्प्रत्याहार (११) सूत्र पर लिखी व्यवस्थानुसार पर अर्थात् लँण् (प्रत्याहारसूत्र ६) के णकार तक ग्रहण किया जाता है। मूर्ध्नि भवः = मूर्द्धन्यः, जा
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १८७ वर्ण मूर्धा-स्थान से निष्पन्न हो उसे मूर्धन्य कहते हैं । मूर्धन्य वर्ण आठ हैं—ऋ, ट्, ठ्, ड्, ढ्, ण्, र्, ष् । यहां स्थानीय सकार के साथ इन में से किसी का स्थान तुल्य हो यह असम्भव है । अब शेष रहा यत्न । सकार का 'ईषद्विवृत' आभ्यन्तर-यत्न तथा 'विवार, श्वास, अघोष' बाह्ययत्न है । मूर्धन्य वर्णों में इस प्रकार के यत्न वाला 'ष्' के अति- रिक्त अन्य कोई वर्ण नहीं अतः सकार के स्थान पर षकार ही मूर्धन्य आदेश होगा ।¹ 'रामे + सु' यहां मकारोत्तर एकार इण् है । इस से परे 'सु' प्रत्यय के अवयव अपदान्त सकार को इस सूत्र से मूर्धन्य षकार हो कर—'रामेषु' प्रयोग सिद्ध होता है । आदेशरूप सकार के उदाहरण—'सुष्वाप' प्रभृति हैं । इण् कवर्ग से परे षत्व- विधान करने से—'रामस्य, पुरुषस्य' इत्यादियों में सकार को षकार नहीं होता । एवम् 'अपदान्त' कहने से—'कविस्तिष्ठति, हरिस्तत्र' इत्यादियों में पदान्त सकार को षकार नहीं होता । रामशब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा—
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | रामः | रामौ | रामाः |
| द्वितीया | रामम् | " | रामान् |
| तृतीया | रामेण | रामाभ्याम् | रामैः |
| चतुर्थी | रामाय | " | रामेभ्यः |
| पञ्चमी | रामात्, रामाद् | " | " |
| षष्ठी | रामस्य | रामयोः | रामाणाम् |
| सप्तमी | रामे | " | रामेषु |
| सम्बोधन | हे राम ! | हे रामौ ! | हे रामाः ! |
यद्यपि ग्रन्थकार ने सम्बोधनविभक्ति को प्रथमाविभक्ति के अनन्तर रखा है; १. यद्यपि 'मूर्धन्यः' के स्थान पर 'षः' लिखने में लाघव था; तथापि इणः षीध्वम्० (५१४) आदि सूत्रों में 'षः' की अनुवृत्ति जाने से अनिष्टापत्ति हो जाती; क्योंकि 'एधाञ्चकृढ्वे' में मूर्धन्य ढ् अभीष्ट है ष् नहीं—अतः 'मूर्धन्यः' लिखा गया है ।
१८८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् तथापि आजकल यह सब विभक्तियों के अन्त में प्रचलित है। यहां हम ने लौकिकक्रम का अनुसरण किया है। इस प्रकार सब अकारान्त पुंल्लिङ्गों के उच्चारण होते हैं। जिन में कुछ विशेषता है उन का कथन आगे मूल में स्वयं ग्रन्थकार करेंगे। हम यहां रामवत् कुछ उपयोगी शब्दों का अर्थ सहित सङ्ग्रह दे रहे हैं। जिन शब्दों के आगे '' इस प्रकार का चिह्न है उन में णत्वविधि जान लेनी चाहिये। [अथ पशुपक्षिकीटादयः] | शब्द = अर्थ | शब्द = अर्थ शब्द = अर्थ | चरणायुध = मुर्गा | मार्जार = बिल्ला अश्व = घोड़ा | चाष* = नीलकण्ठ | मूषिक* = चूहा उल्लूक = उल्लू | चिल्ल = चील | मृग* = हरिण उष्ट्र* = ऊँट | छाग = बकरा | मृगादन = चीता कपोत = कबूतर | ताम्रचूड = मुर्गा | मेष* = मेढ़ा काक = कौआ | तुरङ्ग* = घोड़ा | वक = बगुला कीट = कीटा | दिवान्ध = उल्लू | वराह* = सूअर कीर* = तोता | द्विरद = हाथी | वर्तक = बटेर कीश = वानर | ध्वाङ्क्ष* = कौआ | वानर* = बन्दर कुक्कुट = मुर्गा | नकुल = नेवला | वायस = कौआ कुक्कुर* = कुत्ता | नक्र* = नाका | वृक* = भेड़िया कुञ्जर* = हाथी | पारावत = कबूतर | वृश्चिक = बिच्छू कुरङ्ग* = हरिण | पिक = कोयल | वृषभ* = बैल कूर्म* = कछुआ | बर्हिण = मोर | शलभ = पतङ्ग कृकलास = गिरगिट | भालुक = रीछ | शशक = खरगोश कोक = चकवा | भृङ्ग* = भ्रमर | शाखामृग* = बन्दर कोल = सूअर | भेक = मेढक | शुक = तोता कौशिक = उल्लू | भ्रमर* = भौंरा | शृगाल = गीदड़ खग = पक्षी | मकर* = मगरमच्छ | श्येन = बाज खद्योत = जुगनू | मण्डूक = मेढक | षट्पद = भ्रमर खर* = गधा | मत्कुण = खटमल | सर्प* = सांप गज = हाथी | मत्स्य = मच्छ | सारङ्ग* = पपीहा गण्डक = गण्डा | मधुप = भौंरा | सारमेय* = कुत्ता गर्दभ = गधा | मयूर* = मोर | हरिण = मृग गृध्र* = गीध | मर्कट = बन्दर | [अथ सम्बन्धवाचकाः] घोटक = घोड़ा | मशक = मच्छर | अग्रज = बड़ा भाई चकोर* = चकोर | महिष* = भैंसा | आवुत्त = बहनोई
अजन्त-पुल्लिङ्ग-प्रकरणम् १८६ स्तम्भ १ शब्द = अर्थ जनक = पिता तनय = पुत्र देवर* = देवर दौहित्र* = दोहता धव = पति पितामह = दादा पितृव्य* = चाचा पौत्र* = पोता प्रपितामह = परदादा प्रपौत्र* = परपोता भागिनेय = भांजा भ्रातृव्य* = भतीजा, शत्रु भ्रात्रीय* = भतीजा - मातामह = नाना मातुल = मामा मातुलेय = मामे का पुत्र श्याल = साला श्वशुर* = ससुर सोदर* = सगा भाई स्वस्रीय* = भांजा [अथ खाद्यान्नादिवाचकाः] अपूप = पूआ आम्र* = आम का वृक्ष कुलत्थ = कुलथी कोविदार* = कचनार गुड = गुड़ गृञ्जन = गाजर गोधूम = गेहूं चणक = चना चम्पक = चम्पावृक्ष तिल = तिल दाडिम = अनारवृक्ष नारिकेल = नारियल पेड़ निम्ब = नीम (पेड़) स्तम्भ २ शब्द = अर्थ पटोल = परवल माष* = उड़द मुद्ग = मूंग सर्षप* = सरसों संयाव = हलुआ [अथ मनुष्यवर्गस्थ-शब्दाः] अकिञ्चन = निर्धन अज्ञ = मूर्ख अध्यापक = अध्यापक अध्वनीन = मुसाफिर अन्ध = अन्धा अर्चक = पुजारी अशिक्षित = अनपढ़ अश्वारोह* = घुड़सवार कर्णेजप = चुगलखोर काण = काना कृतघ्न = अकृतज्ञ कृतज्ञ = शुक्रगुजार कृपण = कंजूस केशव = श्रीकृष्ण कोविद = पण्डित क्षत्रिय* = क्षत्रिय खल = दुष्ट गर्धन = लोभी गुप्तचर* = दूत घस्मर* = पेटू चिकित्सक = वैद्य चिरक्रिय* = सुस्त जागरूक* = सावधान जिह्म = कुटिल तस्कर* = चोर तूष्णीक = चुप दर्शक = दर्शक दानव = दैत्य स्तम्भ ३ शब्द = अर्थ दुर्विनीत = अनम्र देव = देवता धनिक = धनी नट = नटवा नर्मद = मसखरा नापित = नाई नाविक = मल्लाह निशाचर* = राक्षस निःसङ्ग = बेहोश निःस्व = निर्धन नृप* = राजा न्यायाधीश = जज पथिक = मुसाफिर परिचारक* = सेवक पाचक = रसोइया पुरन्दर* = इन्द्र वधिर* = वहरा भारक* = कुली मन्मथ = कामदेव मल्ल = पहलवान मायिक = मायावी मितम्पच = कञ्जूस याचक = भिक्षुक याष्टीक = लाठीधारी रथिक = रथी रुग्ण = रोगी वक्र* = टेढ़ा विप्र* = ब्राह्मण वैश्य = वैश्य वैहासिक = मसखरा शाक्तीक = शक्तिधारी शूद्र* = शूद्र सतीर्थ्य = सहपाठी स्तावक = स्तुतिकर्ता
१६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
शब्द = अर्थ स्वच्छन्द = स्वतन्त्र [ अथ व्यावसायिक-शब्दा ] अधमर्ण = ऋणी अयस्कार* = लोहार आपणिक = दुकानदार उत्तमर्ण = ऋणदाता कान्दविक = हलवाई कुम्भकार* = कुम्हार कुविन्द = जुलाहा चर्मकार* = चमार तन्तुवाय = जुलाहा निर्णेजक = धोबी पटकार* = जुलाहा पश्यतोहर* = सुनार मालाकार* = माली रजक = रङ्गरेज रथकार* = बढ़ई सुवर्णकार* = सुनार सूचीकार* = दरजी [ अथ विविध-शब्दा. ] अनुग्रह* = कृपा अपराध = कसूर अब्द = वर्ष अभ्युदय = उन्नति अरघट्ट = रेंहट अर्क* = सूर्य अर्घ* = मूल्य अर्णव = समुद्र असुर* = दैत्य आकर* = खान आखण्डल = इन्द्र आतप = धूप आपण = बाज़ार आभीर* = अहीर
शब्द = अर्थ आय = आमदनी आलय = घर आविष्कार* = ईजाद आश्विन = असोज मास आषाढ = आषाढ मास आसार* = जोर की वर्षा उदन्त = खबर उद्भव = उत्पत्ति उपद्रव* = उपद्रव उपयोग = इस्तेमाल उपाय = तरीका एक = अकेला कन्दर* = गुफा कपर्द = शिव-जटा खलङ्क = धूप कवल = ग्रास कारावास = जेलखाना कार्तिक = कार्तिक कुप्रबन्ध = दुर्व्यवस्था कुबेर* = कुबेर कूप = कूंआ कोलाहल = शोरगुल कोष* = खज़ाना क्रम* = सिलसिला क्षय* = नाश खेद = दुःख गर्व* = अभिमान चन्द्र* = चान्द चैत्र* = चैत मास जय = जीत ज्येष्ठ = जेठ मास तड़ाग = तालाब तार्क्ष्य* = गरुड त्रास = भय
शब्द = अर्थ त्रिदिव = स्वर्ग दाव = वनाग्नि नाक = स्वर्ग नाद = शब्द नाश = नाश निकष* = कसौटी निर्झर* = झरना न्याय = इन्साफ पङ्क = कीचड़ पाखण्ड = ढकोसला पावक = अग्नि पाषाण = पत्थर पौष* = पौष मास प्रणय = प्रेम प्रत्यूष* = प्रातः काल प्रदीप* = मशाल प्रहर* = पहर फाल्गुन = फागुन मास भाद्रपद = भादो मास भूधर* = पर्वत मध्याह्न = दोपहर मयूख = किरण माघ = माघ मास मारुत = वायु मार्गशीर्ष* = अगहन मास मित्र* = सूर्य मुकुर* = दर्पण मृदङ्ग = तबला याम = पहर रय* = वेग रुद्र* = शिव वध = हत्या वसन्त = बसन्त ऋतु विद्यालय = स्कूल
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १६१
शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ विनायक = गणेश | व्यायाम = कसरत | समीर* = वायु विमर्श = विचार | शक्र* = इन्द्र | संवत्सर** = वर्ष विलम्ब = देर | शिशिर* = शिशिर ऋतु | स्कन्द = कार्तिकेय विलाप = रोना | शैल = पर्वत | स्वभाव = आदत विवाह = शादी | श्रावण = श्रावण मास | हठ = जिद्द विश्रम्भ* = विश्वास | सङ्केत = इशारा | हायन = वर्ष वैशाख = वैशाख मास | सत्कार* = सम्मान | हृषीकेश = श्रीकृष्ण वैश्वानर** = अग्नि | संदंशक = चिमटा | हेमन्त = हेमन्त ऋतु व्यय = खर्च | सन्देह = शक | हेरम्ब* = गणेश व्याज = बहाना | सन्दोह = समूह | ह्रद' = तालाब
इत्सञ्ज्ञकों के विषय में विशेष स्मरणीय सूचना— सुँङस्योरुकारेकारौ जशटङपाश्चेतः (सि० कौ०) । जकारश्च शकारश्च टकारश्च ङपावपि । सुँङस्योरुदितौ चैव सुपि सप्त स्मृता इतः ॥ अर्थ:—सुँ और ङसिँ के अन्त्य उकार इकार की तथा अन्यत्र सुपों में जकार शकार, टकार, ङकार और पकार की इत्सञ्ज्ञा होती है। इत्सञ्ज्ञा का प्रयोजन यथा— सुँ—मे उकार अनुबन्ध का यह प्रयोजन है कि अर्वणस्त्रसावनञः (२६२) सूत्र में 'असौ' कथन में 'सुँ' का निषेध हो जाये । यदि उकार अनुबन्ध न करते तो हमें 'असि' कहना पड़ता । तब 'सादि प्रत्यय में निषेध हो' ऐसा अर्थ हो जाने से सप्तमी के बहुवचन 'सुप्' में भी निषेध हो जाता जो अनिष्ट था । जस्, शस्—में जकार और शकार परस्पर के भेद के लिये हैं । अत एव दीर्घा- ज्जसि च (१६२), तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) आदि उपपन्न हो जाते हैं । औट्—में टकार 'सुँट्' प्रत्याहार के लिये है । सुँट् प्रत्याहार का उपयोग सुँडनपुंसकस्य (१६३) सूत्र में होता है । टा—में टकार द्वितीयाटौस्स्वेनः (२८०) सूत्र में ग्रहण के लिये है । अन्यथा— द्वितीयौस्स्वेनः सूत्र होने पर 'आ' का कही पता भी न चलता । ङे, ङसिँ, ङस्, ङि—इन में ङकार तीयस्य ङित्सु वा (वा० १६) तथा
१. इस सङ्ग्रह में रुग्ण, कृतज्ञ, कृतघ्न, अन्ध आदि कई शब्द त्रिलिङ्गी भी हैं । उन का लिङ्ग विशेष्य के अनुसार होना है । विशेष्य के पुंल्लिङ्ग होने पर ही उन का रामशब्दवत् उच्चारण समझना चाहिये । इसी प्रकार पङ्क, हायन आदि कुछ शब्द नपुंसक में भी प्रयुक्त होते हैं । इस के अतिरिक्त कुछ शब्दों के अन्य भी अनेक अर्थ होते हैं—यह सब कोशग्रन्थों का विषय है, उन में देखे ।
१६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् घेर्डिति (१७२) प्रभृति टित्कार्यों के लिये है। 'ङसिँ' में इकार 'ङस्' से भेद करने के लिये है। भेद का प्रयोजन – टाङसिँङसाम्० (१४०) से भिन्न २ आदेश करना है। सुप् -म पकार सुँप्' प्रत्याहार के लिये किया गया है। ङम के अतिरिक्त जस्, शस्, भिस्, भ्यस्, ङस्, ओस्, अम्, भ्याम्, आम् प्रत्ययों के अन्त्य सकार मकार की हलन्त्यम् (१) द्वारा इत्सञ्ज्ञा नहीं होती, न विभक्तौ तुस्मा (१३१) से निषेध हो जाता है— सकारो जश्शसोरोसि ङसि भ्यसि न चेद् भिसि । मकारश्च तथा ज्ञेय आमि भ्यामि स्थितस्त्वमि ॥ अभ्यास (२६) (१) व्युत्पत्ति और अव्युत्पत्ति पक्षों का सोदाहरण विवेचन करते हुए यह लिखें कि किस सूत्र से किस पक्ष में प्रातिपदिकसञ्ज्ञा होती है ? (२) कृत्तद्धित० सूत्र की व्याख्या करते हुए 'समास' ग्रहण पर प्रकाश डालें। (३) निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दें— (क) 'डेयं' यहां 'डे' में कौन सी विभक्ति है ? (ख) 'रामान्' यहां नकार को णकारादेश क्यों नहीं होता ? (ग) 'जस्' के सकार की इत्सञ्ज्ञा क्यों नहीं होती ? (घ) 'शम्' के सकार को कौन नकारादेश करता है ? (ङ) सुँपो में किस किस की किस किस सूत्र से इत्सञ्ज्ञा होती है ? (४) इन में कहां णत्व शुद्ध और कहां अशुद्ध है ? सहेतुक लिखें— १ मृगेण । २ हरिणानाम् । ३ गर्वेन । ४ इष्टानाम् । ५ सदश्वेण । ६ अशिक्षितेन । ७ नृणाम् । ८ पाषाणानाम् । ९ रामणाम् । १० कारावामेन । ११ द्राघिमानम् । १२ षट्पदानाम् । १३ मूर्छणा । १४ वृषमेन । १५ केशवेन । १६ विमर्शणीयम् । १७ चौरानाम् । १८ वैदुष्येन । १६ परवीयेन । २० श्येन । २१ मुष्टिना । २२. वर्तवेण । २३ दर्शवेण । २४ शक्रवेण । २५ प्राज्ञानाम् । २६ शिक्ष- तेन । २७ सरटेन । २८ रूप्यवेन । २६ ग्रन्थीनाम् । ३० धूर्जटिणा । (५) इन में णत्वविधि का निमित्त बताए— १ दृष्ट्रेण । २ ताक्ष्याणाम् । ३. धृतराष्ट्रेण । ४ प्रहारेण । (६) णत्वविधि में मत्र का व्यवधान आवश्यक है या एक एक का ? (७) क्या वाऽवसाने सूत्र झलां जशोऽन्ते सूत्र का अपवाद है ? (८) यज्ञदत्तस्तस्कर, देवस्य—इत्यादि में षत्व क्यों न हो ? (६) निम्नलिखित रूपों की ससूत्र सिद्धि करें— १ राम । २ राम । ३ रामयो । ४ रामै । ५ रामस्य । ६.
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १६३ रामाय। ७. रामेषु। ८. रामाणाम्। ९. रामम्। १०. रामाः। ११. रामौ। १२. रामेण। १३. रामान्। (१०) क्या दोष होगा यदि — बहुवचने झल्येत् में 'बहुवचने' न हो; स्थानिवत्सूत्र में 'अनल्विधौ' न हो; अर्थवत्सूत्र में 'अप्रत्ययः' न हो; एङ्घ्रस्वात्० में 'अङ्ग' का अध्या- हार न हो। (११) निम्नस्थ सूत्रों की विस्तृत व्याख्या करें— सरूपाणामेक०, अट्कुप्वाङ्०, यस्मात्प्रत्यय०, आदेशप्रत्यययोः, प्रथमयोः पूर्व०, स्थानिवदादेशो०। ————:: ० ::———— जिन अकारान्त शब्दों में 'राम' शब्द की अपेक्षा कुछ अन्तर होता है अब उन का वर्णन करते हैं। उन में सर्वादिगण के शब्द मुख्य हैं; अतः प्रथम सर्वादि-गण दर्शाते हैं— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१५१) सर्वादीनि सर्वनामानि १।१।२६॥ सर्वादीनि शब्दस्वरूपाणि सर्वनामसञ्ज्ञानि स्युः। सर्व। विश्व। उभ। उभय। डतर। डतम। अन्य। अन्यतर। इतर। त्वत्। त्व। नेम। सम। सिम। पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायामसंज्ञायाम्। स्व- मज्ञातिधनाख्यायाम्। अन्तरं बहिर्योगोपसंव्यानयोः। त्यद्। तद्। यद्। एतद्। इदम्। अदस्। एक। द्वि। युष्मद्। अस्मद्। भवतुँ। किम्। [इति पञ्चत्रिंशत् सर्वोदयः] ॥ अर्थः—सर्व आदि शब्दस्वरूप सर्वनामसञ्ज्ञक होते हैं। व्याख्या—सर्वादीनि ।१।३। (नपुंसकलिङ्ग के कारण 'शब्दस्वरूपाणि' विशेष्य का अध्याहार किया जाता है)। सर्वनामानि ।१।३। समासः—सर्वः (सर्वशब्दः) आदिः (आद्यवयवः) येषां (शब्दस्वरूपाणाम्) तानि सर्वादीनि। तद्गुणसंविज्ञानबहुव्रीहि- समासः। अतः सर्वेषाम् (५५७), हलि सर्वेषाम् (१०६) प्रभृति सूत्रों में सर्वशब्द से भी सर्वनामकार्य (सुट्) देखा जाता है अतः सर्वशब्द की भी सर्वनामसञ्ज्ञा करने के लिये यहां 'तद्गुणसंविज्ञानबहुव्रीहि' समास मानना ही युक्त है। अर्थः—(सर्वादीनि) सर्व आदि शब्द (सर्वनामानि) सर्वनामसंज्ञक होते हैं। सर्वादिगण में पैंतीस (३५) शब्द आते हैं, जो ऊपर मूल में दिये हुए हैं। इन का श्लोकों में सङ्ग्रह यथा— सर्वान्यविश्वोभयनेमयत्तदः, किँयुष्मदस्मद्विभवत्त्यदेतदः । उभत्वतौ विज्ञजनैरुदीरितौ, समः सिमत्वान्यतरेतरा अपि ॥ १ ॥ एकैदमदसो ज्ञेया डतरो डतमस्तथा । स्वमज्ञातिधनेऽनाम्नि कालदिग्देशवृत्तयः ॥ २ ॥ ल० प्र० (१३)