भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

१६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् घेर्डिति (१७२) प्रभृति टित्कार्यों के लिये है। 'ङसिँ' में इकार 'ङस्' से भेद करने के लिये है। भेद का प्रयोजन – टाङसिँङसाम्० (१४०) से भिन्न २ आदेश करना है। सुप् -म पकार सुँप्' प्रत्याहार के लिये किया गया है। ङम के अतिरिक्त जस्, शस्, भिस्, भ्यस्, ङस्, ओस्, अम्, भ्याम्, आम् प्रत्ययों के अन्त्य सकार मकार की हलन्त्यम् (१) द्वारा इत्सञ्ज्ञा नहीं होती, न विभक्तौ तुस्मा (१३१) से निषेध हो जाता है— सकारो जश्शसोरोसि ङसि भ्यसि न चेद् भिसि । मकारश्च तथा ज्ञेय आमि भ्यामि स्थितस्त्वमि ॥ अभ्यास (२६) (१) व्युत्पत्ति और अव्युत्पत्ति पक्षों का सोदाहरण विवेचन करते हुए यह लिखें कि किस सूत्र से किस पक्ष में प्रातिपदिकसञ्ज्ञा होती है ? (२) कृत्तद्धित० सूत्र की व्याख्या करते हुए 'समास' ग्रहण पर प्रकाश डालें। (३) निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दें— (क) 'डेयं' यहां 'डे' में कौन सी विभक्ति है ? (ख) 'रामान्' यहां नकार को णकारादेश क्यों नहीं होता ? (ग) 'जस्' के सकार की इत्सञ्ज्ञा क्यों नहीं होती ? (घ) 'शम्' के सकार को कौन नकारादेश करता है ? (ङ) सुँपो में किस किस की किस किस सूत्र से इत्सञ्ज्ञा होती है ? (४) इन में कहां णत्व शुद्ध और कहां अशुद्ध है ? सहेतुक लिखें— १ मृगेण । २ हरिणानाम् । ३ गर्वेन । ४ इष्टानाम् । ५ सदश्वेण । ६ अशिक्षितेन । ७ नृणाम् । ८ पाषाणानाम् । ९ रामणाम् । १० कारावामेन । ११ द्राघिमानम् । १२ षट्पदानाम् । १३ मूर्छणा । १४ वृषमेन । १५ केशवेन । १६ विमर्शणीयम् । १७ चौरानाम् । १८ वैदुष्येन । १६ परवीयेन । २० श्येन । २१ मुष्टिना । २२. वर्तवेण । २३ दर्शवेण । २४ शक्रवेण । २५ प्राज्ञानाम् । २६ शिक्ष- तेन । २७ सरटेन । २८ रूप्यवेन । २६ ग्रन्थीनाम् । ३० धूर्जटिणा । (५) इन में णत्वविधि का निमित्त बताए— १ दृष्ट्रेण । २ ताक्ष्याणाम् । ३. धृतराष्ट्रेण । ४ प्रहारेण । (६) णत्वविधि में मत्र का व्यवधान आवश्यक है या एक एक का ? (७) क्या वाऽवसाने सूत्र झलां जशोऽन्ते सूत्र का अपवाद है ? (८) यज्ञदत्तस्तस्कर, देवस्य—इत्यादि में षत्व क्यों न हो ? (६) निम्नलिखित रूपों की ससूत्र सिद्धि करें— १ राम । २ राम । ३ रामयो । ४ रामै । ५ रामस्य । ६.