भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 206

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १६१

शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ विनायक = गणेश | व्यायाम = कसरत | समीर* = वायु विमर्श = विचार | शक्र* = इन्द्र | संवत्सर** = वर्ष विलम्ब = देर | शिशिर* = शिशिर ऋतु | स्कन्द = कार्तिकेय विलाप = रोना | शैल = पर्वत | स्वभाव = आदत विवाह = शादी | श्रावण = श्रावण मास | हठ = जिद्द विश्रम्भ* = विश्वास | सङ्केत = इशारा | हायन = वर्ष वैशाख = वैशाख मास | सत्कार* = सम्मान | हृषीकेश = श्रीकृष्ण वैश्वानर** = अग्नि | संदंशक = चिमटा | हेमन्त = हेमन्त ऋतु व्यय = खर्च | सन्देह = शक | हेरम्ब* = गणेश व्याज = बहाना | सन्दोह = समूह | ह्रद' = तालाब


इत्सञ्ज्ञकों के विषय में विशेष स्मरणीय सूचना— सुँङस्योरुकारेकारौ जशटङपाश्चेतः (सि० कौ०) । जकारश्च शकारश्च टकारश्च ङपावपि । सुँङस्योरुदितौ चैव सुपि सप्त स्मृता इतः ॥ अर्थ:—सुँ और ङसिँ के अन्त्य उकार इकार की तथा अन्यत्र सुपों में जकार शकार, टकार, ङकार और पकार की इत्सञ्ज्ञा होती है। इत्सञ्ज्ञा का प्रयोजन यथा— सुँ—मे उकार अनुबन्ध का यह प्रयोजन है कि अर्वणस्त्रसावनञः (२६२) सूत्र में 'असौ' कथन में 'सुँ' का निषेध हो जाये । यदि उकार अनुबन्ध न करते तो हमें 'असि' कहना पड़ता । तब 'सादि प्रत्यय में निषेध हो' ऐसा अर्थ हो जाने से सप्तमी के बहुवचन 'सुप्' में भी निषेध हो जाता जो अनिष्ट था । जस्, शस्—में जकार और शकार परस्पर के भेद के लिये हैं । अत एव दीर्घा- ज्जसि च (१६२), तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) आदि उपपन्न हो जाते हैं । औट्—में टकार 'सुँट्' प्रत्याहार के लिये है । सुँट् प्रत्याहार का उपयोग सुँडनपुंसकस्य (१६३) सूत्र में होता है । टा—में टकार द्वितीयाटौस्स्वेनः (२८०) सूत्र में ग्रहण के लिये है । अन्यथा— द्वितीयौस्स्वेनः सूत्र होने पर 'आ' का कही पता भी न चलता । ङे, ङसिँ, ङस्, ङि—इन में ङकार तीयस्य ङित्सु वा (वा० १६) तथा


१. इस सङ्ग्रह में रुग्ण, कृतज्ञ, कृतघ्न, अन्ध आदि कई शब्द त्रिलिङ्गी भी हैं । उन का लिङ्ग विशेष्य के अनुसार होना है । विशेष्य के पुंल्लिङ्ग होने पर ही उन का रामशब्दवत् उच्चारण समझना चाहिये । इसी प्रकार पङ्क, हायन आदि कुछ शब्द नपुंसक में भी प्रयुक्त होते हैं । इस के अतिरिक्त कुछ शब्दों के अन्य भी अनेक अर्थ होते हैं—यह सब कोशग्रन्थों का विषय है, उन में देखे ।