लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
१६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् पूर्वापरावरपरा उत्तरो दक्षिणाधरौ । अन्तर चोपसंव्याने बहिर्योगे तथाऽपुरि ॥ ३ ॥ इन सब का विवेचन आगे यथास्थान मूल तथा व्याख्या मे किया जायेगा । सर्वनाम सञ्ज्ञा अन्वर्थ अर्थात् अर्थानुसारी है—सर्वेषां नामानि सर्वनामानि । इस गण मे पढ़े हुए शब्द यदि सभी' के वाचक होंगे तो तभी इन की सर्वनामसञ्ज्ञा होगी, अन्यथा नही । अत एव यदि किसी व्यक्तिविशेष का नाम 'सर्व' होगा तो वहा सर्वनामसञ्ज्ञा न होगी । इसी प्रकार सर्वम् अतिक्रान्त = अतिसर्वं, तस्मै = अतिसर्वाय' इत्यादि स्थानो पर गौण होने पर भी सर्वनामता न होगी । 'सर्वनाम' यह महासञ्ज्ञा करना इस मे प्रमाण है, अन्यथा घु टि भ के समान कोई छोटी सञ्ज्ञा भी कर सकते थे । इस विषय का विस्तार सिद्धान्त कौमुदी मे देखना चाहिये । सर्वादिगण के अजन्त शब्दा का प्राय जस्, ङे, ङसिं, आम् और ङि' इन पञ्च विभक्तिया मे रामशब्द की अपेक्षा अन्तर होता है। शेष विभक्तियो मे रामशब्दवत् रूप बनते हैं । अत इन पञ्च विभक्तिया मे ही रूप सिद्ध किये जायेंगे । सर्वशब्द का अर्थ 'सब' अर्थात् समूचा समुदाय है । समुदाय दो प्रकार का होता है—(१) उद्भूतावयव (२) अनुद्भूतावयव । जहा वक्ता की केवल समुदाय कहने की इच्छा होती है वहा अनुद्भूतावयव समुदाय होता है । जहा वक्ता का अभिप्राय समुदाय कहने के साथ २ तदन्तर्गत व्यक्तियो से भी हुआ करता है वहा उद्भूतावयव समुदाय होता है । अत अनुद्भूतावयवसमुदाय की विवक्षा मे एकवचन और उद्भूता- वयव की विवक्षा मे द्विवचन और बहुवचन होगा । सर्वशब्द के प्रथमा के एकवचन और द्विवचन मे रामशब्दवत् 'सर्व', सर्वो' प्रयोग बनते हैं । प्रथमा के बहुवचन मे 'जस्' प्रत्यय आ कर—सर्व + जस् । अथ सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) से 'सर्व' की सर्वनामसञ्ज्ञा हो कर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१५२) जसः शी ।७।१।१७॥ अदन्तात् सर्वनाम्नो जस शी स्यात् । अनेकाल्त्वात् सर्वादेश —सर्वे ॥ अर्थ—अदन्त सर्वनाम मे परे जस के स्थान पर शी आदेश हो । व्याख्या—अत १५।१। (अतो भिस ऐस् से) । सर्वनाम्न १५।१। (सर्वनाम्नः स्मै मे) । जस ६।१।१। शी १।१।१। 'सर्वनाम्न' का विशेषण होने से 'अत' से तदन्तविधि होती है। अर्थ —(अत ) अदन्त (सर्वनाम्न ) सर्वनाम से परे (जस ) जस् के स्थान पर (शी) शी आदेश होता है। प्रत्यय (१२०) के अधिकार मे न पढे जाने से शी की प्रत्ययसञ्ज्ञा नहीं है । परन्तु ह्वा' जब वह जस् के स्थान पर हो चुकता है तब स्थानिवद्भाव (१४४) से उस की प्रत्ययसञ्ज्ञा हो जाती है। तात्पर्य यह है कि जब तक जस् के स्थान पर शी आदेश नही होता तब तक वह प्रत्ययसञ्ज्ञक नही होता । प्रत्ययसञ्ज्ञक न होने से
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १९५ लशक्वतद्धिते (१३६) द्वारा उसके शकार की इत् सञ्ज्ञा भी नहीं होगी; क्योंकि उस सूत्र से प्रत्यय के ही आदि शकार की इत् सञ्ज्ञा की जाती है। अतः आदेश करते समय शिद्भाव के कारण शी सर्वादेश नहीं होता, किन्तु अनेकाल् (श् + ई) होने से अनेकालशित् सर्वस्य (४५) द्वारा सर्वादेश हो जाता है। आदेशकरणात्पूर्वं यतः शीति न प्रत्ययः। तस्मात्तस्य शकारस्तु लशक्वेति न ही-ड्भवेत् ॥ १॥ सर्वादेशो न शिद्भावात् ततो भवितुमर्हति । अनेकाल्त्वाद् भवेदेव विज्ञैरेतदुदीरितम् ॥ २॥ 'सर्व + जस्' यहां प्रकृतसूत्र से जस् के स्थान पर शी आदेश हो स्थानिवद्भाव के कारण शी में प्रत्ययत्व लाने से लशक्वतद्धिते (१३६) द्वारा शकार की इत्सञ्ज्ञा हो जाती है; तब शकार का लोप करने पर 'सर्व + ई' इस स्थिति में आद् गुणः (२७) से गुण एकादेश हो कर 'सर्वे' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि यहां यद्यपि ह्रस्व 'शि' आदेश करने से भी आद् गुणः (२७) द्वारा गुण एकादेश हो कर 'सर्वे' प्रयोग सिद्ध हो सकता है; तथापि अग्रिम नपुंसकाच्च (२३५) आदि सूत्रों में अनुवृत्ति के लिये उसे दीर्घ रखा गया है। अन्यथा—'वारिणी, मधुनी' आदि दीर्घघटित प्रयोग न बन सकते (देखो २४५ सूत्र)। द्वितीया और तृतीया विभक्ति में रामशब्दवत् रूप बनते हैं। द्वितीया—सर्वम्, सर्वौ, सर्वान् । तृतीया—सर्वेण, सर्वाभ्याम्, सर्वैः । चतुर्थी के एकवचन में 'सर्व + ङे' इस अवस्था में (१५१) सूत्र से सर्वनामसञ्ज्ञा हो कर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् — (१५३) सर्वनाम्नः स्मै ।७।१।१४॥ अतः सर्वनाम्नो 'ङे' इत्यस्य स्मैः स्यात् । सर्वस्मै ॥ अर्थः— अदन्त सर्वनाम से परे 'ङे' के स्थान पर 'स्मै' आदेश हो। व्याख्या— अतः ।५।१। (अतो भिस ऐस् से) । सर्वनाम्नः ।५।१। ङेः ।६।१। (ङेर्यः से) । स्मै ।१।१। (विभक्तिलोप आर्षः) । 'अतः' यह 'सर्वनाम्नः' का विशेषण है; इस लिये इस से तदन्तविधि हो जाती है। अर्थः— (अतः) अदन्त (सर्वनाम्नः) सर्वनाम से परे (ङेः) ङे के स्थान पर (स्मै) स्मै आदेश होता है। यह सूत्र ङेर्यः (१४३) सूत्र का अपवाद है। 'सर्व + ङे' यहां अदन्त सर्वनाम 'सर्व' है। इस से परे 'ङे' वर्तमान है। अतः प्रकृत-सूत्र से ङे के स्थान पर स्मै आदेश हो कर 'सर्वस्मै' प्रयोग सिद्ध होता है। चतुर्थी के द्विवचन और बहुवचन में क्रमशः 'सर्वाभ्याम्, सर्वेभ्यः' सिद्ध होते हैं। पञ्चमी के एकवचन में 'ङसिँ' प्रत्यय आ कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् — (१५४) ङसिँङ्योः स्मात्स्मिनौ ।७।१।१५॥ अतः सर्वनाम्नो ङसिँङ्योरेतौ स्तः। सर्वस्मात् ॥ अर्थः—अदन्त सर्वनाम से परे ङसिँ और ङि के स्थान पर क्रमशः स्मात् और स्मिन् आदेश होते हैं।
[Page Header: १६६ | भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्]
व्याख्या—अतः ५।१। (अतो भिस ऐस् से) । सर्वनाम्नः ५।१। (सर्वनाम्नः स्मै से) । ङसिँङ्योः ६।२। स्मात्स्मिनौ १।२। 'सर्वनाम्नः' के विशेषण होने से 'अतः' से तदन्तविधि होगी । अर्थ—(अतः) अदन्त (सर्वनाम्नः) सर्वनाम से परे (ङसिँ- ङ्योः) ङसिँ और ङि के स्थान पर (स्मात्स्मिनौ) स्मात् और स्मिन् आदेश होते हैं । यथासंख्यपरिभाषा से ङसिँ को स्मात् और ङि को स्मिन् होगा । ध्यान रहे कि स्मात् और स्मिन् के अन्त्य तकार और नकार की हलन्त्यम् (१) द्वारा इत्-सञ्ज्ञा न होगी, न विभक्तौ तुस्माः (१३१) से निषेध हो जायेगा । 'सर्व + ङसिँ' यहां अदन्त-सर्वनाम 'सर्व' से परे ङसिँ मौजूद है । अतः प्रकृत- सूत्र से ङसिँ के स्थान पर स्मात् सर्वादेश होकर 'सर्वस्मात्' प्रयोग सिद्ध होता है । षष्ठी के एकवचन और द्विवचन में रामशब्दवत्—सर्वस्य, सर्वयोः । षष्ठी के बहुवचन में—सर्व + आम् । अत्र सर्वनाम-सञ्ज्ञा कर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१५५) आमि सर्वनाम्नः सुँट् ।७।१।५२॥ अवर्णान्तात् परस्य सर्वनाम्नो विहितस्यामः सुँडागमः । एत्वषत्वे— सर्वेषाम् । सर्वस्मिन् । शेषं रामवत् ॥ अर्थ—अवर्णांन्त (अङ्ग) से परे सर्वनाम से विहित आम् प्रत्यय को सुँट् का आगम हो । व्याख्या—आत् ५।१। (आज्जसेरसुक् से) । अङ्गात् ५।१। (अङ्गस्य इस अधिकृत का पञ्चमी में विपरिणाम हो जाता है) । सर्वनाम्नः ५।१। आमि ७।१। सुँट् १।१। 'आत्' पद 'अङ्गात्' पद का विशेषण है, अतः येन विधिस्तदन्तस्य द्वारा तदन्तविधि हो कर—'अवर्णांन्ताद् अङ्गात्' बनेगा । अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि सुँट् किस का अवयव हो ? यह तो ज्ञात है कि आद्यन्तौ टकितौ (८५) द्वारा यह आद्यवयव होता है, परन्तु किस का आद्यवयव हो ? यह यहां ज्ञातव्य है । 'अङ्गात्' में पञ्चमी का निर्देश किया गया है, अतः तस्मादित्युत्तरस्य (७१) के अनुसार सुँट् अङ्ग से परे आम् का अवयव होना चाहिये । परन्तु 'आमि' में सप्तमी का निर्देश किया गया है अतः तस्मिन्निति० (१६) के अनुसार सुँट् आम् से पूर्व अङ्ग का अव- यव होना चाहिये । तो अब सुँट् किस का अवयव हो ? ऐसी शङ्का होने पर उभय- निर्देशे पञ्चमीनिर्देशो बलीयान् के अनुसार पञ्चमी निर्देश के बलवान् होने से सुँट्, अङ्ग से परे=आम् का ही अवयव ठहरता है । तो इस प्रकार 'आमि' पद को 'आमः' बना कर सम्बन्ध में षष्ठी स्वीकार करेंगे । यहां स्पष्ट 'आमः' न कह कर 'आमि' कहने का प्रयोजन आगे ह्रस्वनद्य० (१६२) आदि सूत्रों में उस का अनुवर्त्तन करना ही है । अर्थ—(आतः) अवर्णान्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (सर्वनाम्नः) सर्वनाम से विहित (आमः) आम् का अवयव (सुँट्) सुँट् हो जाता है । प्रश्न—आप ने अवर्णान्त सर्वनाम से परे आम् को सुँट् का आगम हो ऐसा सरल अर्थ न कर यह अपूर्व अर्थ क्या किया है ?
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १६७ उत्तर—यदि आप वाला अर्थ करते तो 'येषाम्, तेषाम्' यदि प्रयोग सिद्ध न हो सकते । तथाहि—यद् और तद् सर्वनाम से आम् प्रत्यय कर त्यदादीनामः (१६३) से दकार को अकार और अतो गुणे (२७४) मे पररूप करने पर 'त + आम्, य + आम्' हुआ । अब यहां आप का अर्थ मानने से सुँट् प्राप्त नही हो सकता । क्योंकि यहां अवर्णान्त सर्वनाम से परे आम् वर्त्तमान नही । जो अवर्णान्त है वह सर्वनाम नही और जो सर्वनाम है वह अवर्णान्त नहीं । सर्वनामसञ्ज्ञा 'यद्, तद्' आदि दकारान्तों की ही की गई है । परन्तु—हमारे उपर्युक्त अर्थ से कोई दोष नहीं आता । यथा— यहां अवर्णान्त अङ्ग 'य, त' हैं, इन से परे यद्, तद् सर्वनाम से विहित आम् विद्यमान है; अतः इसे सुँट् का आगम हो जायेगा । यह अर्थ जसः शी (१५२), सर्वनाम्नः स्मै (१५३) आदि सूत्रों में भी समझ लेना चाहिये; अन्यथा 'ये, यस्मै, यस्मात्' आदि में शी आदि सर्वनामकार्य न हो सकेंगे । 'सर्व + आम्' यहां अवर्णान्त अङ्ग है 'सर्व' । इस से परे, सर्वनाम (सर्व) से विहित 'आम्' विद्यमान है । अतः इसे सुँट् का आगम हो—सर्व + सुँट् आम् । सुँट् में टकार इत् है और उकार उच्चारणार्थ है; अतः स् अवशिष्ट रहता है—सर्व + साम् । सुँट् का आगम आम् को कहा गया है । जिमे आगम होता है वह उस का अवयव माना जाता है । उस के ग्रहण से उस का भी ग्रहण हो जाता है । जैसा कि कहा भी है—यदागमास्तद्गुणीभूतास्तद्ग्रहणेन गृह्यन्ते । अतः 'साम्' आम् से भिन्न नहीं । इस से 'साम्' झलादि बहुवचन ठहरता है; इस के परे होने से बहुवचने झल्येत् (१४५) द्वारा अकार को एकार तथा आदेशप्रत्यययोः (१५०) से साम् प्रत्यय के अवयव सकार को मूर्धन्य षकार करने से 'सर्वेषाम्' प्रयोग सिद्ध होता है । सप्तमी के एकवचन में 'सर्व + ङि' हुआ । यहां ङसिँङ्योः स्मात्स्मिनौ (१५४) से 'ङि' को स्मिन् आदेश हो कर 'सर्वस्मिन्' प्रयोग सिद्ध होता है । सर्वशब्द की रूप- माला यथा— प्र० सर्वः सर्वौ सर्वे | प० सर्वस्मात् सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः द्वि० सर्वम् ,, सर्वान् | ष० सर्वस्य सर्वयोः सर्वेषाम् तृ० सर्वेण सर्वाभ्याम् सर्वैः | स० सर्वस्मिन् ,, सर्वेषु च० सर्वस्मै ,, सर्वेभ्यः | सं० हे सर्व ! हे सर्वौ ! हे सर्वे ! [लघु०] एवं विश्वादयोऽप्यदन्ताः ॥ व्याख्या—अब अन्य अदन्त पुंल्लिङ्ग सर्वनामों के विषय में कहते हैं कि— विश्व आदि अदन्त (सर्वनाम) भी इसी तरह होते हैं । 'विश्व' शब्द का अर्थ 'सम्पूर्ण' है । सर्वादिगण में पाठ होने से सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) द्वारा सर्वनामसञ्ज्ञा हो कर शी, स्मै आदि सर्वनामकार्य हो जाएंगे । शेष रामवत् प्रक्रिया होगी । सम्पूर्ण रूपमाला यथा—
१६८ भैम्याव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् प्र० विश्व विश्वौ विश्वे । प० विश्वस्मात् विश्वाभ्याम् विश्वेभ्य द्वि० विश्वम् ,, विश्वान् । प० विश्वस्य विश्वयो विश्वेषाम् तृ० विश्वेन विश्वाभ्याम् विश्वै । स० विश्वस्मिन् ,, विश्वेषु च० विश्वस्मै ,, विश्वेभ्य । स० हे विश्व ! हे विश्वौ ! हे विश्वे ! [लघु०] उभशब्दो नित्य द्विवचनान्त । उभौ २ । उभाभ्याम् ३ । उभयोः । उभयो । तस्येह पाठोऽकजर्थ ॥ व्याख्या—सर्वादिगण म विश्व शब्द के बाद 'उभ' शब्द आता है । इस का अर्थ है 'दोना' (Both) । अत यह सदा द्विवचनान्त ही प्रयुक्त होता है । एकवचन ओर बहुवचन प्रत्यया म असम्भव होन स इस का प्रयोग नही होता । इस की प्रक्रिया रामशब्दवत् समझनी चाहिये । सम्पूर्ण रूपमाला यथा— एकवचन द्विवचन बहुवचन | एकवचन द्विवचन बहुवचन प्र० ० उभौ ० | प० ० उभाभ्याम् ० द्वि० ० ,, ० | प० ० उभयो ० तृ० ० उभाभ्याम् ० | स० ० ,, ० च० ० ,, ० | स० ० हे उभौ ! ० अब यहा यह शङ्का उत्पन्न होती है कि उभशब्द मे सर्वनामसञ्ज्ञा का कोई कार्य नही किया गया, क्योकि सर्वनामसञ्ज्ञा के सब कार्य या तो बहुवचन मे होते हैं या एकवचन म । यथा जस शी (१५२), आमि सर्वनाम्नः सुँट् (१५५) ये बहुवचन मे होते हैं, सर्वनाम्न स्मै (१५३), ङसिङ्यो स्मात्स्मिनो (१५४) ये एकवचन मे होते है । द्विवचन मे कोई कार्य नही देखा जाता । तो पुन किम लिये 'उभ' शब्द को सर्वादिगण मे डाल कर उस की सर्वनामसञ्ज्ञा करने का प्रयत्न किया गया है ? इम शङ्का को मन म रख कर ग्रन्थकार उत्तर देते हैं कि— तस्येह पाठोऽकजर्थ । अर्थात् इस उभशब्द का सर्वादिगण मे पाठ कर इस की सर्वनामसञ्ज्ञा करने का प्रयोजन 'अकच्' प्रत्यय का विधान करना है। तात्पर्य यह है कि सर्वशब्द पर कहे गये जस शी (१५२) आदि कार्य ही केवल सर्वनामकार्य नही, किन्तु सर्वनामकार्य तो और भी हैं। यदि उभशब्द पर शी आदि कोई कार्य नही होता तो भले ही न हो, इस की सर्वनामाराञ्ज्ञा तो अन्य कार्य के लिये ही की गई है । तथाहि—अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक्टे (१२१६) अर्थात् अव्यय तथा सर्वनाम की टि से पूर्व अकच् प्रत्यय हो । उभशब्द की सर्वनामसञ्ज्ञा होने से उस की टि से पूर्व अकच् प्रत्यय हो कर—उम् अकच् अ+औ = 'उभकौ' रूप हो जाता है। यदि इस की सर्व- नामसञ्ज्ञा न होती तो अकच् न हो सकता । विशेष सिद्धान्त-कौमुदी मे देखें । [लघु०] उभयशब्दस्य द्विवचन नास्ति । डतर-डतमौ प्रत्ययौ । 'प्रत्यय-ग्रहणे तदन्तग्रहणम्' इति तदन्ता ग्राह्या । नेम इत्यर्धे । समः सर्वपर्याय । तुल्य- पर्यायस्तु न । 'यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम्' (२३) इति ज्ञापकात् ॥
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १६६ अर्थः—'उभय' शब्द का द्विवचन नहीं होता। डतर और डतम प्रत्यय हैं। 'प्रत्यय के ग्रहण में तदन्त का ग्रहण हो' इस परिभाषा से तदन्त अर्थात् डतरान्त और डतमान्त शब्दों का ही ग्रहण करना चाहिये। नेम शब्द अर्ध (आधा) अर्थ में सर्वादि- गण में समझना चाहिये। सर्वपर्याय अर्थात् 'सर्व' अर्थ के वाचक 'सम' शब्द का सर्वा- दियों में पाठ है, तुल्यपर्याय—समान अर्थ के वाचक का नही। इसमें ज्ञापक पाणिनि का यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) सूत्र है। व्याख्या—सर्वादिगण में 'उभ' शब्द के वाद 'उभय' शब्द आता है। यह शब्द उभशब्द से 'अयच्' प्रत्यय करने पर सिद्ध होता है। वार्त्तिककार कात्यायन के अनु- सार इस का द्विवचन-प्रत्ययों में प्रयोग नहीं किया जाता। इस का अर्थ है—दो अवयवों वाला। यथा—उभयो मणिः (दो हिस्सों वाली मणि), उभये मणयः (दो हिस्सों वाली मणियां)। इस की रूपमाला यथा— एकवचन द्विवचन बहुवचन | एकवचन द्विवचन बहुवचन प्र० उभयः ० उभये | प० उभयस्मात् ० उभयेभ्यः द्वि० उभयम् ० उभयान् | प० उभयस्य ० उभयेषाम् तृ० उभयेन ० उभयैः | स० उभयस्मिन् ० उभयेषु च० उभयस्मै ० उभयेभ्यः | सं० हे उभय ! ० हे उभये ! सर्वादि-गण में उभयशब्द के वाद, 'डतर, डतम' का नम्बर आता है। ये दोनों प्रत्यय हैं। इन के विधायक तीन तद्धितसूत्र हैं। १. कियत्तदोर्निर्धारणे द्वयोरेकस्य डतरच् (१२३२), २. वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने डतमच् (१२३३), ३. एकाच्च प्राचाम् (५.३.६४)। किम्, यद्, तद् और एक इन चार सर्वनामों से परे डतर और डतम प्रत्यय हो कर आठ शब्द बनते हैं—(१) कतर, (२) कतम, (३) यतर, (४) यतम, (५) ततर (६) ततम, (७) एकतर, (८) एकतम। सर्वादिगण में 'डतर, डतम' के पाठ से इन आठ शब्दों का ही ग्रहण होता है। क्योंकि कहा है कि '—न केवला प्रकृतिः प्रयोक्तव्या, न केवलः प्रत्ययः अर्थात् न केवल प्रकृति का प्रयोग करना चाहिये और न केवल प्रत्यय का—इस सिद्धान्त के अनुसार केवल डतर डतम का कहीं प्रयोग नहीं हो सकता। किञ्च—प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् (प्रत्यय का ग्रहण होने पर तदन्त अर्थात् वह प्रत्यय जिस के अन्त में है उस के सहित उस प्रत्यय का ग्रहण करना चाहिये) इस नियम से डतरप्रत्ययान्त और डतमप्रत्ययान्त उपर्युक्त आठ शब्दों का ही सर्वनामसञ्ज्ञा में ग्रहण है। प्रश्न—आचार्य पाणिनि को यदि यह प्रत्ययग्रहण-परिभाषा अभीष्ट होती तो वे सुप्तिङन्तं पदम् (१४) सूत्र के स्थान पर 'सुप्तिङ् पदम्' ऐसा छोटा सूत्र रचते; क्योंकि सुँप् और तिङ् के प्रत्यय होने से सुबन्त और तिङन्त का सुतरां ग्रहण हो जाता ? उत्तर—सुप्तिङन्तं पदम् (१४) सूत्र में मुनि के 'अन्त' ग्रहण का प्रयोजन यह जतलाना है कि—सञ्ज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणं नास्ति अर्थात् जहां प्रत्यय की सञ्ज्ञा की जा रही हो वहां प्रत्ययग्रहण-परिभाषा प्रवृत्त नहीं होती।
२०० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् प्रश्न—यदि ऐसा है तो यहां डतर और डतम प्रत्ययों की सर्वनामसञ्ज्ञा करने पर वह परिभाषा क्यों प्रवृत्त हो रही है ? यहां भी उसे प्रवृत्त नहीं होना चाहिये । उत्तर—यह बात सत्य है । परन्तु यहां केवल उन प्रत्ययों की सञ्ज्ञा करने का कुछ भी प्रयोजन न होने से उपर्युक्त प्रत्ययग्रहण परिभाषा की प्रवृत्ति स्वीकार कर ली जाती है । क्योंकि जब इस लोक में मन्दबुद्धि पुरुष भी प्रयोजन के बिना किसी कार्य में प्रवृत्त नहीं होता तो क्या महाबुद्धिमान् आचार्य पाणिनि व्यर्थ के लिये इन की सर्वनाम- सञ्ज्ञा करेंगे ? कदापि नहीं । कतर आदि शब्दों की रूपमाला पुँल्लिङ्ग में 'सर्व' शब्द की तरह होती है । कतर (दो में कौन) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० कतर कतरौ कतरे । प० कतरस्मात् कतराभ्याम् कतरेभ्य द्वि० कतरम् ,, कतरान् । ष० कतरस्य कतरयो कतरेषाम् तृ० कतरेण कतराभ्याम् कतरै । स० कतरस्मिन् ,, कतरेषु च० कतरस्मै ,, कतरेभ्य । स० हे कतर ! हे कतरौ ! हे कतरे ! इसी प्रकार—कतम (बहुतों में कौन), यतर (दो में जो), यतम (बहुतों में जो), ततर (दो में वह), ततम (बहुतों में वह), एकतर (दो में एक), एकतम (बहुतों में एक) शब्द भी समझने चाहियें । डतर, डतम के अनन्तर सर्वादिगण में 'अन्य' (दूसरा) शब्द आता है । इस की रूपमाला सर्वशब्दवत् होती है यथा— प्र० अन्य अन्यौ अन्ये । प० अन्यस्मात् अन्याभ्याम् अन्येभ्य द्वि० अन्यम् ,, अन्यान् । ष० अन्यस्य अन्ययो अन्येषाम् तृ० अन्येन अन्याभ्याम् अन्यै । स० अन्यस्मिन् ,, अन्येषु च० अन्यस्मै ,, अन्येभ्य । स० हे अन्य ! हे अन्यौ ! हे अन्ये ! अन्यशब्द के बाद 'अन्यतर' शब्द आता है । इस का अर्थ है—दोनों में से एक । इसे डतरप्रत्ययान्त नहीं समझना चाहिये । इसी प्रकार का एक 'अन्यतम' शब्द भी लोक में देखा जाता है । इस का अर्थ है—बहुतों में से एक । इसे भी डतमप्रत्ययान्त नहीं समझना चाहिये । ये दोनों शब्द अव्युत्पन्न हैं । इन में से प्रथम 'अन्यतर' शब्द का सर्वादिगण में पाठ है अतः इस की सर्वनामसञ्ज्ञा हो जाती है । दूसरे 'अन्यतम' शब्द का गण में पाठ नहीं अतः इस की सर्वनामसञ्ज्ञा न होगी, रामशब्दवत् उच्चारण होगा । 'अन्यतर' शब्द की रूपमाला सर्वशब्दवत् होती है । यथा— प्र० अन्यतर, अन्यतरौ, अन्यतरे । द्वि० अन्यतरम्, अन्यतरौ, अन्यतरान् । तृ० अन्यतरेण, अन्यतराभ्याम्, अन्यतरै । च० अन्यतरस्मै, अन्यतराभ्याम्, अन्य- तरेभ्य । प० अन्यतरस्मात्, अन्यतराभ्याम्, अन्यतरेभ्य । ष० अन्यतरस्य, अन्यतरयो, अन्यतरेषाम् । स० अन्यतरस्मिन्, अन्यतरयो, अन्यतरेषु । स० हे अन्यतर !, हे अन्य- तरौ !, हे अन्यतरे ! ।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २०१ अन्यतरशब्द के बाद 'इतर' शब्द आता है। इस का अर्थ 'भिन्न' है। इस की रूपमाला सर्वशब्दवत् होती है— प्र० इतरः इतरौ इतरे | प० इतरस्मात् इतराभ्याम् इतरेभ्यः द्वि० इतरम् ,, इतरान् प० इतरस्य इतरयोः इतरेषाम् तृ० इतरेण इतराभ्याम् इतरैः स० इतरस्मिन् ,, इतरेषु च० इतरस्मै ,, इतरेभ्यः सं० हे इतर ! हे इतरौ ! हे इतरे! इतर के अनन्तर सर्वादिगण में अदन्त शब्द 'त्व' आता है। इस का अर्थ भी 'भिन्न' है। यह वेद में प्रयुक्त होता है। इस की रूपमाला सर्वशब्दवत् है— प्र० त्वः त्वौ त्वे | प० त्वस्मात् त्वाभ्याम् त्वेभ्यः द्वि० त्वम् ,, त्वान् ष० त्वस्य त्वयोः त्वेषाम् तृ० त्वेन त्वाभ्याम् त्वैः स० त्वस्मिन् ,, त्वेषु च० त्वस्मै ,, त्वेभ्यः सं० हे त्व ! हे त्वौ ! हे त्वे ! त्वशब्द के अनन्तर अदन्त सर्वनाम 'नेम' शब्द आता है। अर्ध (आधा) अर्थ में इस का सर्वादिगण में पाठ अभीष्ट है। अवधि आदि अर्थों में पाठ न होने से सर्वनाम- सञ्ज्ञा नहीं होगी। तब रामवत् उच्चारण होगा। अर्धवाची सर्वनाम नेमशब्द का विशेष विवेचन प्रथमचरम० (१६०) सूत्र पर देखें। सर्वादिगण में नेमशब्द के बाद 'सम' आता है। इस के 'सर्व' और 'तुल्य' दो अर्थ होते हैं। 'सर्व' अर्थ में इस की सर्वनामसञ्ज्ञा इष्ट है; 'तुल्य' अर्थ में नहीं। इस का कारण यह है कि आचार्य ने यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) सूत्र में 'समानाम्' कहा है। यहां समशब्द तुल्यवाचक है। यदि इस अर्थ में इस का सर्वादिगण में पाठ होता तो 'समानाम्' की बजाय 'समेषाम्' होता। सर्वनामसञ्ज्ञक समशब्द की रूप- माला यथा— प्र० समः समौ समे | प० समस्मात् समाभ्याम् समेभ्यः द्वि० समम् ,, समान् ष० समस्य समयोः समेषाम् तृ० समेन समाभ्याम् समैः स० समस्मिन् ,, समेषु च० समस्मै ,, समेभ्यः सं० हे सम ! हे समौ ! हे समे ! इस के बाद 'सिम' (सर्व) शब्द आता है। इस की रूपमाला भी सर्ववत् है— प्र० सिमः सिमौ सिमे | प० सिमस्मात् सिमाभ्याम् सिमेभ्यः द्वि० सिमम् ,, सिमान् ष० सिमस्य सिमयोः सिमेषाम् तृ० सिमेन सिमाभ्याम् सिमैः स० सिमस्मिन् ,, सिमेषु च० सिमस्मै ,, सिमेभ्यः सं० हे सिम ! हे सिमौ ! हे सिमे! इसके बाद पूर्व-परावर-दक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायाम् असंज्ञायाम् यह गण-सूत्र आता है। इस का अर्थ है—सञ्ज्ञाभिन्न व्यवस्था अर्थ हो तो 'पूर्व, पर, अवर,
२०२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर' ये सात शब्द सर्वादिगण में समझे जावें। इस गणसूत्र की विशेष व्याख्या तथा पूर्वादि शब्दों की रूपमाला आगे (१५६) सूत्र पर देखें। पूर्वादियों के अनन्तर स्वम् अज्ञातिधनाख्यायाम् यह गणसूत्र आता है। इस का अर्थ है - बन्धु और धन अर्थ से भिन्न अन्य अर्थ वाला स्वशब्द सर्वादिगण में समझा जाय। इसका विशेष व्याख्यान आगे (१५७) सूत्र पर देखें। स्वशब्द के बाद अन्तरं बहिर्योगोपसंव्यानयोः यह गणसूत्र आता है। इस का अर्थ है--बाह्य और परिधानीय अर्थ वाला 'अन्तर' शब्द सर्वादिगण में समझा जाय। इस का विशेष विवरण भी आगे (१५८) सूत्र पर देखें। अन्तरशब्द के बाद त्यदादिगण आता है। त्यदादिगण सर्वादिगण के अन्तर्गत एक उपगण है, नया गण नहीं। इस में त्यद्, तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदस्, एक, द्वि, युष्मद्, अस्मद्, भवतु, किम् ये बारह शब्द आते हैं। त्यदादियों में केवल 'एक' शब्द ही अदन्त है। यदि 'एक' शब्द सङ्ख्येयवाचक हो तो वह नित्य एकवचनान्त होता है और यदि अन्य, प्रधान, प्रथम, केवल, साधारण, समान, अल्प अर्थों¹ का वाचक हो तो इस से द्विवचन तथा बहुवचन प्रत्यय भी होते हैं। यथा- यजुष्येकेषाम् (८।३।१०२)। इस की सर्वनामसंज्ञा प्रत्येक अवस्था में होती है। प्रथम सङ्ख्येयवाची 'एक' शब्द की रूपमाला यथा- एकवचन द्विवचन बहुवचन | एकवचन द्विवचन बहुवचन प्र० एक ० ० | प० एकस्मात् ० ० द्वि० एकम् ० ० | ष० एकस्य ० ० तृ० एकेन ० ० | स० एकस्मिन् ० ० च० एकस्मै ० ० | त्यदादियों का प्रायः सम्बोधन नहीं होता। अन्य, प्रधान आदि अर्थों में 'एक' शब्द की रूपमाला यथा- एकवचन द्विवचन बहुवचन | एकवचन द्विवचन बहुवचन प्र० एक एकौ एके | प० एकस्मात् एकाभ्याम् एकेभ्यः द्वि० एकम् ,, एकान् | ष० एकस्य एकयोः एकेषाम् तृ० एकेन एकाभ्याम् एकैः | स० एकस्मिन् ,, एकेषु च० एकस्मै ,, एकेभ्यः | स० हे एक ! हे एकौ ! हे एके ! [लघु०] संज्ञा-सूत्रम्- (१५६) पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायामसंज्ञायाम् ।१।१।३४॥ एतेषां व्यवस्थायामसंज्ञायां सर्वनामसंज्ञा गणसूत्रात् सर्वत्र या प्राप्ता सा जसि वा स्यात्। पूर्वे, पूर्वाः। असंज्ञायां किम् ? उत्तराः कुरवः। १ एकोऽन्यार्थे प्रधाने च प्रथमे केवले तथा । साधारणे समानेऽल्पे सङ्ख्यायाञ्च प्रयुज्यते ॥ (इति कोष )
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २०३ स्वाभिधेयापेक्षावधिनियमो व्यवस्था। व्यवस्थायां किम् ? दक्षिणा गायकाः, कुशला इत्यर्थः ॥ अर्थः—(१) पूर्व, (२) पर, (३) अवर, (४) दक्षिण, (५) उत्तर, (६) अपर, (७) अधर—इन सात शब्दों की सञ्ज्ञाभिन्न व्यवस्था अर्थ में गण-सूत्र से जो सर्वनामसञ्ज्ञा सब जगह प्राप्त थी वह जस् परे होने पर विकल्प से हो। व्याख्या—पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि ।१।३। व्यवस्थायाम् ।७।१। असञ्ज्ञायाम् ।७।१। विभाषा ।१।१। जसि ।७।१। (विभाषा जसि से) । सर्वनामानि ।१।३। (सर्वादीनि सर्वनामानि से) । समासः—पूर्वञ्च परञ्च अवरञ्च दक्षिणञ्च उत्तरञ्च अपरञ्च अधरञ्च (यहां नपुंसकलिङ्ग 'शब्दस्वरूपम्' इस विशेष्य के कारण लगाया गया है) = पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि, इतरेतरद्वन्द्वः । न सञ्ज्ञा = असञ्ज्ञा, तस्याम् = असञ्ज्ञायाम्, नञ्तत्पुरुषः । अर्थः—(असञ्ज्ञायाम्) सञ्ज्ञाभिन्न (व्यवस्थायाम्) व्यवस्था अर्थ हो तो (पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि) पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर ये सात शब्द (जसि) जस् परे होने पर (विभाषा) विकल्प कर के (सर्वनामानि) सर्वनामसञ्ज्ञक हों। सञ्ज्ञाभिन्न व्यवस्था अर्थ में पूर्वादि सातों शब्दों की पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापरा- धराणि व्यवस्थायामसञ्ज्ञायाम् इस गण सूत्र से (यह गणसूत्र सर्वादिगण में पीछे आ चुका है) सर्वनामसञ्ज्ञा की जा चुकी है। अब वही सर्वत्र प्राप्ता सर्वनामसञ्ज्ञा जस् में विकल्प कर के की जाती है। प्रश्न—यह सूत्र एक बार सर्वादिगण में पढ़ा जा चुका है; पुनः यहां सूत्रपाठ में इसे अविकल पढ़ने की आवश्यकता नही। केवल जस् में विकल्प करने के लिए 'पूर्व- परावरदक्षिणोत्तरापराधराणि' इतना ही पर्याप्त है। 'व्यवस्थायामसञ्ज्ञायाम्' इस अंश के ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? उत्तर—वैसा करने से गणसूत्र से तो इन की सञ्ज्ञाभिन्न व्यवस्था में ही सर्व- नामसञ्ज्ञा होगी और यहां सञ्ज्ञा होने तथा व्यवस्था न होने पर भी सर्वनामसञ्ज्ञा हो जायेगी। अतः यहां भी 'व्यवस्थायामसञ्ज्ञायाम्' कहना आवश्यक है। अब हमें यह जानना है कि 'व्यवस्था' क्या है। व्यवस्था का लक्षण है— स्वाभिधेयापेक्षावधिनियमो व्यवस्था। अपेक्ष्यत इत्यपेक्षः, कर्मणि घञ्। स्वस्य (पूर्वादिशब्दस्य) अभिधेयेन (वाच्येन) अपेक्ष्यस्य (अपेक्ष्यमाणस्य) अवधेर्नियमो व्यवस्था। अर्थः—जहां पूर्व आदि शब्दों के अपने अर्थों से अवधि के नियम की अपेक्षा हो वहां व्यवस्था समझनी चाहिये। उदाहरण यथा— काशी पूर्वा। कुतः ? प्रयागात्। यहां 'पूर्वा' शब्द का अर्थ पूर्वदिशास्थित काशी देश है। इस अर्थ से अवधि के नियम की आकाङ्क्षा होती है। अर्थात् 'काशी पूर्व है' यह कहने पर जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि किस से पूर्व है ? इस पर उत्तर मिलता है कि 'प्रयाग से'। तो यहां पूर्वाशब्द का अर्थ क्योंकि अवधि के नियम (प्रया- गात्) की अपेक्षा = आकाङ्क्षा करता है; अतः यहां व्यवस्था है।
२०४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् पूर्वे रावणादय । केभ्य ? कंसादिभ्य । यहाँ पूर्वशब्द का अर्थ पूर्वकाल- स्थित रावण आदि व्यक्ति हैं। इन अर्थों से अवधि के नियम की अपेक्षा = आकाङ्क्षा = जिज्ञासा होती है कि किस से रावण आदि पूर्व हुए हैं ? इस पर उत्तर मिलता है कि 'कंस आदि से'। तो यहाँ पूर्वशब्द का अर्थ क्वापि अवधि के नियम ('कंसादिभ्य') की अपेक्षा करता है, अतः यहाँ व्यवस्था है। पूर्वस्या रविरुदेति । यहाँ पूर्वाशब्द का अर्थ दिशा-विशेष है। दिशाविशेषों का सङ्केत सुमेरुपर्वत की अपेक्षा से अनादिकाल से चला आ रहा है। तो इस प्रकार यहाँ भी व्यवस्था है। तात्पर्य यह हुआ कि जहाँ पूर्व आदि शब्दों के प्रयोग होने पर 'कहाँ से ?', 'किस से ?', 'किन से ?' इत्यादि प्रकारेण जिज्ञासा हो वहाँ व्यवस्था समझनी चाहिये। ध्यान रहे कि व्यवस्था में पूर्वादि शब्द तीन प्रकार के होते हैं। (१) देश- वाची, यथा-काशी पूर्वा। (२) कालवाची, यथा-पूर्वे रावणादय । (३) दिशा- वाची, यथा-पूर्वस्या रविरुदेति । इन तीनों से अतिरिक्त पूर्वादि शब्द होंगे तो वहाँ व्यवस्था न होगा। यथा-अधरे राग (निचले होठ पर लाली है)। व्यवस्थायां किम् ? दक्षिणा गायकाः । दक्षिणा गायका (चतुर गायक)। यहाँ दक्षिणशब्द का अर्थ 'चतुर' है। इस से अवधि के नियम की आकाङ्क्षा नहीं होती। अतः यहाँ व्यवस्था न होने से इस की सर्वनामसञ्ज्ञा न होगी। सर्वनामसञ्ज्ञा न होने से पक्ष में जस शी (१५२) द्वारा शी आदेश न होगा। इसी प्रकार-'अय बाल उत्तरे प्रत्युत्तरे शक्त' (यह बालक जवाब सवाल में चतुर है) यहाँ 'उत्तर' शब्द का अर्थ 'जवाब' तथा 'प्रत्युत्तर' शब्द का अर्थ 'जवाब का जवाब' है। इन अर्थों से किसी प्रकार के अवधि के नियम की जिज्ञासा नहीं होती। अतः व्यवस्था में वर्तमान न होने के कारण इन की सर्वनामसञ्ज्ञा न होगी। इस से पक्ष में पूर्वादिभ्यो नवभ्यो वा (१५६) सूत्र प्रवृत्त न होगा। असञ्ज्ञायां किम् ? उत्तरा कुरव । व्यवस्था होने पर भी पूर्वादि शब्द किसी की सञ्ज्ञा नहीं होने चाहियें। यदि ये किसी की सञ्ज्ञा होंगे तो व्यवस्था में वर्त्तमान होने पर भी इन की सर्वनामसञ्ज्ञा न होगी। यथा-उत्तरा कुरव (उत्तरकुरुदेश)१। सुमेरुपर्वत को अवधि मान कर 'उत्तर कुरु' इस प्रकार देशव्यवस्था की गई है। अतः यहाँ 'उत्तर' शब्द व्यवस्था में वर्त्तमान है। परन्तु 'उत्तर कुरु' इस प्रकार कुरु देश की सञ्ज्ञा होने से उत्तरशब्द की सर्वनामसञ्ज्ञा न होगी। जहाँ पूर्व आदि शब्द किसी की सञ्ज्ञा न होंगे और व्यवस्था में वर्त्तमान होंगे वहाँ निम्नप्रकारेण प्रयोगसिद्धि होगी- १ कुरुशब्दो देशविशेषे बहुवचनान्त प्रयुज्यते । सम्प्रति रूस का यूक्रेनप्रदेश 'उत्तर- कुरु' देश है-ऐसा विचारकों का मत है। परन्तु अन्य लोग 'कुरुक्षेत्र' को ही 'उत्तरकुरु' देश मानते हैं।
अजन्त-पुंल्लिङ्गप्रकरणम् २०५ 'पूर्व + जस्' यहां सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) सूत्र से पूर्वशब्द की नित्य सर्वनामसञ्ज्ञा प्राप्त होने पर प्रकृतसूत्र से जस् में वह विकल्प कर के हो जाती है। सर्वनामपक्ष में जसः शी (१५२) से जस् को शी, अनुबन्धलोप तथा गुण एकादेश करने पर 'पूर्वे' प्रयोग सिद्ध होता है। सर्वनाम के अभाव में रामशब्दवत् पूर्वसवर्ण- दीर्घ हो कर 'पूर्वाः' प्रयोग बन जाता है। इसी प्रकार 'पर' आदि शब्दों के भी — परे, पराः। अवरे, अवराः। दक्षिणे, दक्षिणाः। उत्तरे, उत्तराः। अपरे, अपराः। अधरे, अधराः। ये दो-दो रूप बनते हैं। इन शब्दों की रूपमाला आगे (पृष्ठ २०७ पर) लिखेंगे। [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१५७) स्वमज्ञातिधनाख्यायाम्। १।१।३४॥ ज्ञातिधनान्यवाचिनः स्वशब्दस्य प्राप्ता सञ्ज्ञा जसि वा। स्वे, स्वाः। आत्मीया आत्मान इति वा। ज्ञातिधनवाचिनस्तु स्वाः = ज्ञातयोऽर्था वा ॥ अर्थः—ज्ञाति (बान्धव) और धन अर्थ से भिन्न अन्य अर्थ वाले स्वशब्द की प्राप्त सर्वनामसञ्ज्ञा जस् में विकल्प से हो। व्याख्या—स्वम् १।१। ('शब्द-स्वरूपम्' की दृष्टि से नपुंसक लिखा गया है)। अज्ञातिधनाख्यायाम् ७।१। विभाषा १।१। जसि ७।१। (विभाषा जसि से)। सर्व- नाम १।१। (सर्वादीनि सर्वनामानि से वचनविपरिणाम द्वारा)। समासः—ज्ञातिश्च धनञ्च = ज्ञातिधने, तयोर् आख्या (सञ्ज्ञा) = ज्ञातिधनाख्या, तस्याम् = ज्ञातिधना- ख्यायाम्, द्वन्द्वगर्भषष्ठीतत्पुरुषः। न ज्ञातिधनाख्यायाम् = अज्ञातिधनाख्यायाम्, नञ्तत्- पुरुषः। अर्थः—(अज्ञातिधनाख्यायाम्) ज्ञाति और धन अर्थ से भिन्न अर्थों में (जसि) जस् परे होने पर (स्वम्) स्वशब्द (विभाषा) विकल्प कर के (सर्वनाम) सर्वनाम- सञ्ज्ञक होता है। सर्वादिगण में भी यह सूत्र पढ़ा गया है। उस से ज्ञाति और धन अर्थ से भिन्न अर्थों में स्वशब्द की सर्वनामसञ्ज्ञा सर्वत्र प्राप्त थी। पुनः इस सूत्र से उस प्राप्त सर्व- नामसञ्ज्ञा का जस् में विकल्प किया गया है। स्वशब्द के चार अर्थ होते हैं—(१) आत्मा (खुद अथवा स्वयम्), (२) आत्मीय (खुद का = अपना), (३) ज्ञाति (बान्धव = रिश्तेदार), (४) धन। इन चार अर्थों में से प्रथम दो अर्थों में स्वशब्द की सर्वनामसञ्ज्ञा होती है, पिछले दो अर्थों में नहीं। प्रकृतसूत्र से वही सर्वत्र प्राप्त सर्वनामसञ्ज्ञा जस् में विकल्प कर के की जाती है। सर्वनामपक्ष में जस् को शी, अनुबन्धलोप तथा गुण एकादेश हो कर 'स्वे' प्रयोग बना। सर्वनामाभावपक्ष में रामशब्दवत् 'स्वाः' रूप सिद्ध हुआ। ज्ञाति और धन अर्थ में सर्वनामसञ्ज्ञा न होने से 'स्व' शब्द का रामशब्दवत् उच्चारण होगा। अतः जस् में केवल 'स्वाः' ही बनेगा। ज्ञातिरात्मा तथात्मीयश्चतुर्थं धनमेव च। अर्थाः प्रोक्ताः स्वशब्दस्य कोपे बुद्धिमतां वरैः॥ १ ॥ आत्मात्मीयार्थयोरेव सर्वनाम स्मृतं बुधैः। यो ज्ञातिधनवाची स्यात् सर्वनाम न कीर्त्यते ॥ २ ॥
२०६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१५८) अन्तरं बहिर्योगोपसंव्यानयो । १।१।३५॥ बाह्ये परिधानीये चार्थेऽन्तरशब्दस्य प्राप्ता सञ्ज्ञा जसि वा। अन्तरे, अन्तरा वा गृहाः, बाह्या इत्यर्थः । अन्तरे, अन्तरा वा शाटकाः, परिधानीया इत्यर्थः ॥ अर्थ —बाह्य और परिधानीय अर्थ में अन्तरशब्द की सर्वत्र प्राप्त सर्वनाम- सञ्ज्ञा जस् में विकल्प से हो । व्याख्या—अन्तरम् ।१।१। बहिर्योगोपसंव्यानयोः ।७।२। जसि ।७।१। विभाषा ।१।१।१। (विभाषा जसि से) । सर्वनाम ।१।१।१। (सर्वादीनि सर्वनामानि से) । समास — बहिः=अनावृतो देशः तेन योगः=सम्बन्धो यस्य स बहिर्योगः, बहुव्रीहि समास । उपसंव्रीयते=परिधीयते इत्युपसंव्यानम् । अन्तरोयोपसंव्यानपरिधानान्यधोंऽशुके इत्यमरः । बहिर्योगश्च उपसंव्यानञ्च=बहिर्योगोपसंव्याने। तयोः=बहिर्योगोपसंव्या- नयोः । इतरेतरद्वन्द्व । अर्थ —(बहिर्योगोपसंव्यानयोः) बाहर से सम्बद्ध वस्तु अर्थ में तथा नीचे पहनने योग्य वस्त्रादि अर्थ में (अन्तरम्) अन्तरशब्द (जसि) जस् परे होने पर (विभाषा) विकल्प कर के (सर्वनाम) सर्वनामसञ्ज्ञक होता है । बाह्य अर्थात् बाहरस्थित तथा नीचे पहनने योग्य वस्त्रादिक अर्थ में अन्तरशब्द की इसी प्रकार के गणसूत्र द्वारा जो सर्वनामसञ्ज्ञा सर्वत्र प्राप्त थी उसी का यहां जस् में विकल्प किया गया है। सर्वनामपक्ष में जस् को शी, अनुबन्धलोप तथा गुण एकादेश हो—'अन्तरे' बनेगा। तदभावपक्ष में पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेश करने पर—'अन्तरा ' सिद्ध होगा। अन्तरे, अन्तरा वा गृहाः (बाहरस्थित घर। प्रायः चाण्डाल आदियों के घर नगर की चारदिवारी से बाहर ही हुआ करते हैं । देखें मनुस्मृति—१०।५१) । अन्तरे अन्तरा वा शाटकाः (नीचे पहनने योग्य वस्त्र=धोती आदि) । बहिर्योगोपसंव्यानयोः किम् ? अनयोर्ग्रामयोर् अन्तरे तापसः प्रतिवसति (इन दो गांवों के मध्य तपस्वी रहता है) । यहां 'अन्तर' शब्द का अर्थ 'मध्यदेश' है। अतः सर्वनामसञ्ज्ञा न होने से सर्वनाम-कार्य न होंगे। [यह प्रत्युदाहरण गणसूत्र का ही है । एवम्—आवयोरन्तरे जाताः पर्वताः सरितो द्रुमाः ( ) ।] इसी प्रकार—'इमे अत्यन्तरा मम'। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१५६) पूर्वादिभ्यो नवभ्यो वा ।७।१।१६॥ एभ्यो ङसिंङ्योः स्मात्स्मिनौ वा स्तः । पूर्वस्मात्, पूर्वात् । पूर्वस्मिन्, पूर्वे । एवम्परादीनाम् । शेषं सर्ववत् ॥ अर्थ —पूर्व आदि नौ शब्दों से परे ङसिं और ङि को क्रमशः स्मात् और स्मिन् आदेश विकल्प से हों। व्याख्या —पूर्वादिभ्यः ।५।३। नवभ्यः ।५।३। ङसिंङ्योः ।६।२। स्मात्स्मिनौ ।१।२। (ङसिंङ्योः स्मात्स्मिनौ से) । वा इत्यव्ययपदम् । अर्थ —(पूर्वादिभ्यः) पूर्व आदि (नवभ्यः) नौ शब्दों से परे (ङसिंङ्योः) ङसिं और ङि के स्थान पर (वा) विकल्प कर के (स्मात्स्मिनौ) स्मात् और स्मिन् आदेश होते हैं ।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २०७ पूर्वोक्त त्रिसूत्री (१५६, १५७, १५८) में स्थित पूर्व आदि नौ शब्दों का उन्हीं अर्थों में यहां ग्रहण है। गणसूत्रों द्वारा नित्य सर्वनामसञ्ज्ञा विहित होने से इन से परे स्मात् और स्मिन् आदेश (१५४) नित्य प्राप्त होते थे। अब इस सूत्र से विकल्प किया जाता है। पूर्वस्मात्, पूर्वस्मिन्। पक्ष में रामवत् प्रक्रिया होकर— पूर्वात्, पूर्वे। इन सब की रूपमाला यथा— (१) पूर्व (प्रथम आदि) (२) पर (दूसरा आदि) प्र० पूर्वः पूर्वौ { पूर्वे प्र० परः परौ { परे पूर्वाः पराः द्वि० पूर्वम् " पूर्वान् द्वि० परम् " परान् तृ० पूर्वेण पूर्वाभ्याम् पूर्वैः तृ० परेण पराभ्याम् परैः च० पूर्वस्मै " पूर्वेभ्यः च० परस्मै " परेभ्यः प० { पूर्वस्मात् " " प० { परस्मात् " " पूर्वात् परात् ष० पूर्वस्य पूर्वयोः पूर्वेषाम् ष० परस्य परयोः परेषाम् स० { पूर्वस्मिन् " पूर्वेषु स० { परस्मिन् " परेषु पूर्वे परे सं० हे पूर्व ! हे पूर्वौ ! { हे पूर्वे ! सं० हे पर ! हे परौ ! { हे परे ! हे पूर्वाः ! हे पराः ! (३) अवर (न्यून आदि) (४) दक्षिण (दाहिना आदि) प्र० अवरः अवरौ { अवरे प्र० दक्षिणः दक्षिणौ { दक्षिणे अवराः दक्षिणाः द्वि० अवरम् " अवरान् द्वि० दक्षिणम् " दक्षिणान् तृ० अवरेण अवराभ्याम् अवरैः तृ० दक्षिणेन दक्षिणाभ्याम् दक्षिणैः च० अवरस्मै " अवरेभ्यः च० दक्षिणस्मै " दक्षिणेभ्यः प० { अवरस्मात् " " प० { दक्षिणस्मात् " " अवरात् दक्षिणात् ष० अवरस्य अवरयोः अवरेषाम् ष० दक्षिणस्य दक्षिणयोः दक्षिणेपाम् स० { अवरस्मिन् " अवरेषु स० { दक्षिणस्मिन् " दक्षिणेपु अवरे दक्षिणे सं० हे अवर ! हे अवरौ ! { हे अवरे ! सं० हे दक्षिण ! हे दक्षिणौ ! { हे दक्षिणे ! हे अवराः ! हे दक्षिणाः ! (५) उत्तर (अगला आदि) (६) अपर (दूसरा आदि) प्र० उत्तरः उत्तरौ { उत्तरे प्र० अपरः अपरौ { अपरे उत्तराः अपराः द्वि० उत्तरम् " उत्तरान् द्वि० अपरम् " अपरान्
२०८ भैम्यिाख्ययोपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् तृ० उत्तरेण उत्तराभ्याम् उत्तरै | तृ० अपरेण अपराभ्याम् अपरै च० उत्तरस्मै ,, उत्तरेभ्य | च० अपरस्मै ,, अपरेभ्य प० {उत्तरस्मात् ,, ,, | प० {अपरस्मात् ,, ,, {उत्तरात् | {अपरात् ष० उत्तरस्य उत्तरयो उत्तरेषाम् | ष० अपरस्य अपरयो अपरेषाम् स० {उत्तरस्मिन् ,, उत्तरेषु | स० {अपरस्मिन् ,, अपरेषु {उत्तरे | {अपरे स० हे उत्तर ! हे उत्तरौ ! {हे उत्तरे ! | स० हे अपर ! हे अपरौ ! {हे अपरे ! {हे उत्तरा ! | {हे अपरा ! (७) अधर (नीचा आदि) | (८) स्व (आत्मा, आत्मीय) प्र० अधर अधरौ {अधरे | प्र० स्व स्वौ {स्वे {अधरा | {स्वा द्वि० अधरम् ,, अधरान् | द्वि० स्वम् ,, स्वान् तृ० अधरेण अधराभ्याम् अधरै | तृ० स्वेन स्वाभ्याम् स्वै च० अधरस्मै ,, अधरेभ्य | च० स्वस्मै ,, स्वेभ्य प० {अधरस्मात् ,, ,, | प० {स्वस्मात् ,, ,, {अधरात् | {स्वात् ष० अधरस्य अधरयो अधरेषाम् | ष० स्वस्य स्वयो स्वेषाम् स० {अधरस्मिन् ,, अधरेषु | स० {स्वस्मिन् ,, स्वेषु {अधरे | {स्वे स० हे अधर ! हे अधरौ ! {हे अधरे ! | स० हे स्व ! हे स्वौ ! {हे स्वे ! {हे अधरा ! | {हे स्वा ! (९) अन्तर (बाह्य या परिधानीय) प्र० अन्तर अन्तरौ {अन्तरे | ष० अन्तरस्य अन्तरयो अन्तरेषाम् {अन्तरा | स० {अन्तरस्मिन् ,, अन्तरेषु द्वि० अन्तरम् ,, अन्तरान् | {अन्तरे तृ० अन्तरेण अन्तराभ्याम् अन्तरै | स० हे अन्तर ! हे अन्तरौ ! {हे अन्तरे ! च० अन्तरस्मै ,, अन्तरेभ्य | {हे अन्तरा ! प० {अन्तरस्मात् ,, ,, | यहां पूर्व आदि ६ शब्द समाप्त होते हैं ॥ {अन्तरात् [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१६०) प्रथमचरमतयाल्पाद्धंकतिपयनेमाश्च ।१।१।३२ ॥ एते जसि उक्तसञ्ज्ञा वा स्यु । प्रथमे, प्रथमा । तय प्रत्यय —द्वितये, द्वितया । शेषं रामवत् । नेमे, नेमा । शेष सर्ववत् ॥
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २०६ अर्थः—प्रथम, चरम, तयप्रत्ययान्त, अल्प, अर्ध, कतिपय और नेम—ये शब्द जस् परे होने पर विकल्प कर के सर्वनाम-सञ्ज्ञक हों । व्याख्या—प्रथमचरमतयाल्पार्धकतिपयनेमाः ।१।३। च इत्यव्ययपदम् । जसि ।७।१। विभाषा ।१।१। (विभाषा जसि से) । सर्वनामानि ।१।३। (सर्वादीनि सर्व- नामानि से) । समासः—प्रथमश्च चरमश्च तयश्च अल्पश्च अर्धश्च कतिपयश्च नेमश्च =प्रथमचरमतयाल्पार्धकतिपयनेमाः, इतरेतरद्वन्द्वः । अर्थः—(प्रथम—नेमाः) प्रथम, चरम, तय, अल्प, अर्ध, कतिपय और नेम ये शब्द (जसि) जस् परे होने पर (विभाषा) विकल्प कर के (सर्वनामानि) सर्वनामसञ्ज्ञक होते हैं । इन शब्दों में ‘नेम’ शब्द के अतिरिक्त अन्य किसी शब्द का सर्वादिकण में पाठ नहीं, अतः शेष सब शब्दों की जस् को छोड़ अन्य विभक्तियों में रामशब्दवत् प्रक्रिया होगी । जस् में सर्वनामपक्ष में जसः शी (१५२) आदि कार्य होंगे । तदभावपक्ष में रामवत् प्रक्रिया जाननी चाहिये । इन की रूपमाला यथा— प्रथम (पहला) | चरम (अन्तिम) प्र० प्रथमः प्रथमो { प्रथमे | प्र० चरमः चरमो { चरमे { प्रथमाः | { चरमाः द्वि० प्रथमम् ,, प्रथमान् | द्वि० चरमम् ,, चरमान् तृ० प्रथमेन प्रथमाभ्याम् प्रथमैः | तृ० चरमेण चरमाभ्याम् चरमैः च० प्रथमाय ,, प्रथमेभ्यः | च० चरमाय ,, चरमेभ्यः प० प्रथमात् ;; ,, | प० चरमात् ,, ,, ष० प्रथमस्य प्रथमयोः प्रथमानाम् | ष० चरमस्य चरमयोः चरमाणांम् स० प्रथमे ,, प्रथमेषु | स० चरमे ,, चरमेषु सं० हे प्रथम! हे प्रथमौ! { हे प्रथमे ! | सं० हे चरम! हे चरमौ! { हे चरमे! { हे प्रथमाः! | { हे चरमाः! चरमशब्द के बाद ‘तय’ आता है । ‘तय’ प्रत्यय है । प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् इस परिभाषानुसार तयप्रत्ययान्तों का ही ग्रहण किया जायेगा । यद्यपि सञ्ज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणं नास्ति इस ज्ञापक से तदन्तों का ग्रहण नहीं होना चाहिये था; तथापि केवल तय प्रत्यय की सञ्ज्ञा करना निष्प्रयोजन होने से तदन्तों का ग्रहण हो जाता है । तयप्रत्ययान्त शब्द—द्वितय, त्रितय, चतुष्टय, पञ्चतय, षट्तय, सप्ततय, अष्टतय, नवतय, दशतय आदि जानने चाहियें । किञ्च—द्वि और त्रि शब्दों से परे तयप् को द्वित्रिभ्यां तयस्यायज्वा (११६६) सूत्र से अयच् आदेश हो कर ‘द्वय’ और ‘त्रय’ शब्द भी बन जाते हैं । ये भी स्थानिवद्भाव से तयप्रत्ययान्त होने के कारण जस् में प्रकृत सूत्र द्वारा विकल्प से सर्वनामसञ्ज्ञक होते हैं । द्वितय (द्वौ अवयवौ यस्य, दो अवयवों वाला—जोड़ा) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० द्वितयः द्वितयौ { द्वितये | द्वि० द्वितयम् द्वितयौ द्वितयान् { द्वितयाः | ल० प्र० (१४)
२१० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् तृ० द्वितयेन द्वितयाभ्याम् द्वितयैः । ष० द्वितयस्य द्वितययोः द्वितयानाम् च० द्वितयाय ,, द्वितयेभ्यः । स० द्वितये ,, द्वितयेषु प० द्वितयात् द्वितयाभ्याम् द्वितयेभ्यः । सं० हे द्वितय ! हे द्वितयौ ! { हे द्वितये ! { हे द्वितयाः ! इसी प्रकार—द्वय, त्रितय, त्रय, चतुष्टय, पञ्चतय प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं। अल्प (थोड़ा) | अर्ध (आधा) प्र० अल्पः अल्पौ { अल्पे | प्र० अर्धः अर्धौ { अर्धे { अल्पाः | { अर्धाः द्वि० अल्पम् ,, अल्पान् | द्वि० अर्धम् ,, अर्धान् तृ० अल्पेन अल्पाभ्याम् अल्पैः | तृ० अर्धेन अर्धाभ्याम् अर्धैः च० अल्पाय ,, अल्पेभ्यः | च० अर्धाय ,, अर्धेभ्यः प० अल्पात् ,, ,, | प० अर्धात् ,, ,, ष० अल्पस्य अल्पयोः अल्पानाम् | ष० अर्धस्य अर्धयोः अर्धानाम् स० अल्पे ,, अल्पेषु | स० अर्धे ,, अर्धेषु सं० हे अल्प ! हे अल्पौ ! { हे अल्पे ! | सं० हे अर्ध ! हे अर्धौ ! { हे अर्धे ! { हे अल्पाः ! | { हे अर्धाः ! कतिपय (कुछ) प्रथमा कतिपयः कतिपयौ कतिपये, कतिपयाः द्वितीया कतिपयम् ,, कतिपयान् तृतीया कतिपयेन कतिपयाभ्याम् कतिपयैः चतुर्थी कतिपयाय ,, कतिपयेभ्यः पञ्चमी कतिपयात् ,, ,, षष्ठी कतिपयस्य कतिपययोः कतिपयानाम् सप्तमी कतिपये ,, कतिपयेषु सम्बोधन हे कतिपय ! हे कतिपयौ ! हे कतिपये ! कतिपयाः ! 'कतिपय' शब्द के अनन्तर 'नेम' शब्द आता है। अर्धवाचक नेमशब्द सर्वनाम- संज्ञक होता है—यह पीछे कह आये हैं। उसी का प्रकृतसूत्र में ग्रहण समझना चाहिये, अन्य का नहीं। रूपमाला यथा— प्र० नेमः नेमौ नेमे, नेमाः | प० नेमस्मात् नेमाभ्याम् नेमेभ्यः द्वि० नेमम् ,, नेमान् | ष० नेमस्य नेमयोः नेमेषाम् तृ० नेमेन नेमाभ्याम् नेमैः | स० नेमस्मिन् ,, नेमेषु च० नेस्मै ,, नेमेभ्यः | सं० हे नेम ! हे नेमौ ! हे नेमे ! नेमाः ! [लघु०] वा०—(१६) तीयस्य ङित्सु वा ॥ द्वितीयस्मै, द्वितीयाय इत्यादि । एवं तृतीया ॥
अजन्तपुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २११ अर्थः- ङित् विभक्तियों के परे होने पर तीयप्रत्ययान्तों की विकल्प कर के सर्वनामसञ्ज्ञा होती है। व्याख्या—तीयस्य ।६।१। डित्सु ।७।३। वा इत्यव्ययपदम्। सर्वनामता ।१।१। (प्रकरण-प्राप्त) । 'तीय' यह एक प्रत्यय है। केवल इस की सञ्ज्ञा का कोई प्रयोजन नहीं; अतः सञ्ज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणं नास्ति इस निषेध के होते हुए भी प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् परिभाषा से तीयप्रत्ययान्तों का ही ग्रहण किया जायेगा। द्वेस्तीयः (११७५) तथा त्रेः सम्प्रसारणं च (११७६) सूत्रों द्वारा 'द्वि' और 'त्रि' शब्दों से तीय- प्रत्यय हो कर द्वितीय और तृतीय ये दो तीयप्रत्ययान्त शब्द निष्पन्न होते हैं। इन दो का ही यहां ग्रहण अभीष्ट है। ङ् इत् यस्य असौ = ङित्, जिस के ङकार की इत्सञ्ज्ञा हो उसे ङित् कहते हैं। ङित् विभक्तियां चार हैं—ङे, ङसिं, ङस्, ङि। अर्थः—(ङित्सु) ङित् प्रत्ययों के परे होने पर (तीयस्य) तीयप्रत्ययान्त शब्दों की (सर्वनामना) सर्व- नाम संज्ञा (वा) विकल्प से हो जाती है। तीयप्रत्ययान्तों का पाठ सर्वादिगण में नहीं आया अतः वहां सर्वनामसंज्ञा अप्राप्त है। प्रकृत वार्त्तिक मे केवल ङित् विभक्तियों में उस का वैकल्पिक विधान किया जा रहा है। ङे में सर्वनामसंज्ञा होने से सर्वनाम्नः स्मै (१५३) तथा ङसिं और ङि में सर्व- नामसञ्ज्ञा होने मे ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ (१५४) सूत्र प्रवृत्त होगा। ङस् में कुछ विशेष नहीं¹। पक्ष में जहां सर्वनामसञ्ज्ञा न होगी वहां रामशब्दवत् प्रक्रिया होगी। द्वितीय (दूसरा) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० द्वितीयः द्वितीयौ द्वितीयाः द्वि० द्वितीयम् ” द्वितीयान् तृ० द्वितीयेन द्वितीयाभ्याम् द्वितीयैः च० द्वितीयस्मै, द्वितीयाय ” द्वितीयेभ्यः प० द्वितीयस्मात्, द्वितीयात् ” ” ष० द्वितीयस्य द्वितीययोः द्वितीयानाम् स० द्वितीयस्मिन्, द्वितीये ” द्वितीयेषु सं० हे द्वितीय ! हे द्वितीयौ ! हे द्वितीयाः ! इसी प्रकार तृतीय (तीसरा) शब्द की रूपमाला जानें। अभ्यास (२७) (१) व्यवस्था का लक्षण लिख उस का सोदाहरण विस्तृत विवेचन करें। (२) (क) किस अर्थ में 'सम' की सर्वनामसञ्ज्ञा होती है और क्यों ? (ख) द्वितीय और द्वितय की रूपमालाओं का अन्तर सप्रमाण लिखें। १. यहां पुंल्लिङ्ग में यद्यपि सर्वनामसञ्ज्ञा का कोई फल नहीं, तथापि स्त्रीलिङ्ग में 'द्वितीयस्याः, तृतीयस्याः' प्रयोगों में सर्वनाम्नः स्याड्० (२२०) द्वारा स्याट् आगम तथा ह्रस्व होना फल है।
२१२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् (ग) जसः शी यहा 'शी' की बजाय ह्रस्व 'शि' क्यो नही किया ? (घ) 'उभ' शब्द की सर्वनामसञ्ज्ञा करने का क्या प्रयोजन है ? (ङ) 'स्व' शब्द की किस अर्थ मे सर्वनामसञ्ज्ञा है ? स्पष्ट करें । (३) आमिसर्वनाम्नः० का क्यों कैसे और कौन-सा अर्थ ग्रन्थकार ने किया है ? (४) तद्गुणसंविज्ञान और अतद्गुणसंविज्ञान का विवेचन करते हुए यह लिखें कि सर्वादीनि सर्वनामानि सूत्र मे किस का आश्रय उचित है ? (५) सर्वादिगणपठित त्रिसूत्री का पुन अष्टाध्यायी मे क्यो उल्लेख किया है ? (६) निम्नलिखित परिभाषाओ का सोदाहरण विवेचन करें - (१) प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् । (२) सञ्ज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्त- ग्रहण नास्ति । (३) यदागमास्तद्गुणीभूतास्तद्ग्रहणेन गृह्यन्ते । (४) उभयनिर्देशे पञ्चमीनिर्देशो बलीयान् । (५) न केवला प्रकृति. प्रयोक्तव्या, न केवल प्रत्यय । (७) (क) 'सर्व, अर्ध, तृतीय, नेम, सम' शब्दो के षष्ठी-बहुवचन मे रूप सिद्ध करें । (ख) 'उभ, अर्ध, द्वितय, द्वितीय, पूर्व, स्व, अन्तर, एक' शब्दो के पञ्चमी के एकवचन मे रूप सिद्ध करें । (ग) 'कतिपय, चरम, स्व, प्रथम' शब्दो की प्रथमा-बहुवचन मे सिद्धि करें। ───.०.─── रामशब्द की अपेक्षा विशिष्ट उच्चारण वाले शब्दो में 'निर्जर' शब्द का प्रमुख- स्थान है। अत अब यहा उस का वर्णन किया जाता है- निर्गतो जराया = निर्जर (निरादयः क्रान्ताद्यर्थे पञ्चम्या इति वार्त्तिकेन समास, उपसर्जनह्रस्व ) । देवता को 'निर्जर' कहते हैं, क्योकि वह जरा = बुढ़ापे से रहित होता है। प्रथमा के एकवचन मे रामशब्द के समान 'निर्जरः' रूप बनता है। प्रथमा के द्विवचन मे-- निर्जर + औ । यहा अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] विधि-सूत्रम् - (१६१) जराया जरसन्यतरस्याम् ।७।२।१०१॥ अजादौ विभक्तौ ॥ अर्थः-अजादि विभक्ति परे हो तो जरा शब्द को विकल्प से जरस् आदेश हो। व्याख्या--अचि ।७।१। (अचि र ऋत से) । विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से)। जराया ।६।१। जरस् ।१।१। अन्यतरस्याम् ।७।१। 'विभक्तौ' का विशेषण होने से यस्मिन्विधिरुत्तदादावल्ग्रहणे द्वारा 'अचि' पद से तदादिविधि हो 'अजादौ' बन जाता है । अर्थ -(अचि) अजादि (विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (अन्यतरस्याम्) एक अवस्था मे (जराया) जरा शब्द के स्थान पर (जरस्) जरस् आदेश हो। औ, जस् (अस्), अम्, औट् (औ), शस् (अस्), टा (आ), ङे (ए), ङसिं (अस्), ङस् (अस्), ओस्, आम्, ङि (इ), ओस्-ये तेरह अजादि विभक्तिया हैं।
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ९३ 'निर्जर+औ' यहां अजादि विभक्ति परे है 'औ'। परन्तु यहां जरा शब्द नहीं 'निर्जर' शब्द वर्त्तमान है अतः जरस् आदेश कैसे हो ? इस का समाधान अग्रिम- परिभाषा से करते हैं— [लघु०] पदाङ्गाधिकारे तस्य च तदन्तस्य च (प०) ॥ अर्थः—'पद' तथा 'अङ्ग' के अधिकार में जिस के स्थान पर जो आदेश विधान किया जाये वह आदेश उस के तथा तदन्त = वह जिसके अन्त में है उस समुदाय के भी स्थान पर हो जाता है । व्याख्या—पदस्य यह अष्टमाध्याय के प्रथमपाद का सोलहवां सूत्र है । यह अधिकार-सूत्र है। इस का अधिकार अपदान्तस्य मूर्धन्यः (८.३.५५) सूत्र तक जाता है। इसे पदाधिकार कहते हैं । [अलुगुत्तरपदे (६.३.१) इत्ययमुत्तरपदाधिकारोऽपि पदाधिकारग्रहणेन गृह्यते इति तत्त्वबोधिनीकाराः श्रीज्ञानेन्द्रस्वामिनः] । अङ्गस्य यह षष्ठाध्याय के चतुर्थ पाद का प्रथम-सूत्र है। यह भी अधिकार- सूत्र है। इस का अधिकार सातवें अध्याय की समाप्ति तक जाता है। इसे अङ्गाधिकार कहते हैं। इन दोनों अधिकारों में जिस के स्थान पर आदेश का विधान किया गया हो उस के तथा वह जिस समुदाय के अन्त में हो उस समुदाय के भी स्थान पर वह आदेश होता है । जराया जरसन्यतरस्याम् (१६१) सूत्र अङ्गाधिकार में पढ़ा गया है। इस सूत्र में जरस् आदेश जरा के स्थान पर विधान किया गया है। अतः वह आदेश अकेले जरा शब्द के स्थान पर भी होगा और जरा शब्द जिस के अन्त में होगा ऐसे 'निर्जर' प्रभृति शब्दों के स्थान पर भी होगा । जरस् आदेश अनेकाल् है अतः अनेकाल्शित् सर्वस्य (४५) सूत्र से सम्पूर्ण 'निर्जर' शब्द के स्थान पर वह प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम-परिभाषा प्रवृत्त होती है — [लघु०] निर्दिश्यमानस्याऽऽदेशा भवन्ति (प०) ॥ अर्थः—जिस का निर्देश किया गया हो उस के स्थान पर ही आदेश होते हैं। व्याख्या—सूत्र में जो साक्षात् निर्दिष्ट किया गया हो उस के स्थान पर ही आदेश करना चाहिये । अन्य के स्थान पर नहीं। जराया जरसन्यतरस्याम् (१६१) सूत्र में जरस् आदेश जरा के स्थान पर ही कहा गया है, अतः वह 'निर्जर' के अन्तर्गत 'जरा' के स्थान पर ही होगा सम्पूर्ण 'निर्जर' के स्थान पर नहीं । यहां यह शङ्का उत्पन्न होती है कि जब आदेश निर्दिश्यमान के स्थान पर ही करना अभीष्ट है तो पुनः पूर्वोक्त तदन्तग्रहण-परिभाषा का क्या लाभ ? इस का उत्तर यह है कि तदन्तग्रहणपरिभाषा से केवल इतना लाभ होता है कि प्रथम जो तदन्तों में आदेश की बिलकुल प्राप्ति नहीं होती थी सो अब हो जाती है। यथा—यदि तदन्त- ग्रहणपरिभाषा न होती तो 'निर्जर' शब्द में जरस् आदेश की बिलकुल प्राप्ति ही न