भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 220

अजन्त-पुंल्लिङ्गप्रकरणम् २०५ 'पूर्व + जस्' यहां सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) सूत्र से पूर्वशब्द की नित्य सर्वनामसञ्ज्ञा प्राप्त होने पर प्रकृतसूत्र से जस् में वह विकल्प कर के हो जाती है। सर्वनामपक्ष में जसः शी (१५२) से जस् को शी, अनुबन्धलोप तथा गुण एकादेश करने पर 'पूर्वे' प्रयोग सिद्ध होता है। सर्वनाम के अभाव में रामशब्दवत् पूर्वसवर्ण- दीर्घ हो कर 'पूर्वाः' प्रयोग बन जाता है। इसी प्रकार 'पर' आदि शब्दों के भी — परे, पराः। अवरे, अवराः। दक्षिणे, दक्षिणाः। उत्तरे, उत्तराः। अपरे, अपराः। अधरे, अधराः। ये दो-दो रूप बनते हैं। इन शब्दों की रूपमाला आगे (पृष्ठ २०७ पर) लिखेंगे। [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(१५७) स्वमज्ञातिधनाख्यायाम्। १।१।३४॥ ज्ञातिधनान्यवाचिनः स्वशब्दस्य प्राप्ता सञ्ज्ञा जसि वा। स्वे, स्वाः। आत्मीया आत्मान इति वा। ज्ञातिधनवाचिनस्तु स्वाः = ज्ञातयोऽर्था वा ॥ अर्थः—ज्ञाति (बान्धव) और धन अर्थ से भिन्न अन्य अर्थ वाले स्वशब्द की प्राप्त सर्वनामसञ्ज्ञा जस् में विकल्प से हो। व्याख्या—स्वम् १।१। ('शब्द-स्वरूपम्' की दृष्टि से नपुंसक लिखा गया है)। अज्ञातिधनाख्यायाम् ७।१। विभाषा १।१। जसि ७।१। (विभाषा जसि से)। सर्व- नाम १।१। (सर्वादीनि सर्वनामानि से वचनविपरिणाम द्वारा)। समासः—ज्ञातिश्च धनञ्च = ज्ञातिधने, तयोर् आख्या (सञ्ज्ञा) = ज्ञातिधनाख्या, तस्याम् = ज्ञातिधना- ख्यायाम्, द्वन्द्वगर्भषष्ठीतत्पुरुषः। न ज्ञातिधनाख्यायाम् = अज्ञातिधनाख्यायाम्, नञ्तत्- पुरुषः। अर्थः—(अज्ञातिधनाख्यायाम्) ज्ञाति और धन अर्थ से भिन्न अर्थों में (जसि) जस् परे होने पर (स्वम्) स्वशब्द (विभाषा) विकल्प कर के (सर्वनाम) सर्वनाम- सञ्ज्ञक होता है। सर्वादिगण में भी यह सूत्र पढ़ा गया है। उस से ज्ञाति और धन अर्थ से भिन्न अर्थों में स्वशब्द की सर्वनामसञ्ज्ञा सर्वत्र प्राप्त थी। पुनः इस सूत्र से उस प्राप्त सर्व- नामसञ्ज्ञा का जस् में विकल्प किया गया है। स्वशब्द के चार अर्थ होते हैं—(१) आत्मा (खुद अथवा स्वयम्), (२) आत्मीय (खुद का = अपना), (३) ज्ञाति (बान्धव = रिश्तेदार), (४) धन। इन चार अर्थों में से प्रथम दो अर्थों में स्वशब्द की सर्वनामसञ्ज्ञा होती है, पिछले दो अर्थों में नहीं। प्रकृतसूत्र से वही सर्वत्र प्राप्त सर्वनामसञ्ज्ञा जस् में विकल्प कर के की जाती है। सर्वनामपक्ष में जस् को शी, अनुबन्धलोप तथा गुण एकादेश हो कर 'स्वे' प्रयोग बना। सर्वनामाभावपक्ष में रामशब्दवत् 'स्वाः' रूप सिद्ध हुआ। ज्ञाति और धन अर्थ में सर्वनामसञ्ज्ञा न होने से 'स्व' शब्द का रामशब्दवत् उच्चारण होगा। अतः जस् में केवल 'स्वाः' ही बनेगा। ज्ञातिरात्मा तथात्मीयश्चतुर्थं धनमेव च। अर्थाः प्रोक्ताः स्वशब्दस्य कोपे बुद्धिमतां वरैः॥ १ ॥ आत्मात्मीयार्थयोरेव सर्वनाम स्मृतं बुधैः। यो ज्ञातिधनवाची स्यात् सर्वनाम न कीर्त्यते ॥ २ ॥