भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 219

२०४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् पूर्वे रावणादय । केभ्य ? कंसादिभ्य । यहाँ पूर्वशब्द का अर्थ पूर्वकाल- स्थित रावण आदि व्यक्ति हैं। इन अर्थों से अवधि के नियम की अपेक्षा = आकाङ्क्षा = जिज्ञासा होती है कि किस से रावण आदि पूर्व हुए हैं ? इस पर उत्तर मिलता है कि 'कंस आदि से'। तो यहाँ पूर्वशब्द का अर्थ क्वापि अवधि के नियम ('कंसादिभ्य') की अपेक्षा करता है, अतः यहाँ व्यवस्था है। पूर्वस्या रविरुदेति । यहाँ पूर्वाशब्द का अर्थ दिशा-विशेष है। दिशाविशेषों का सङ्केत सुमेरुपर्वत की अपेक्षा से अनादिकाल से चला आ रहा है। तो इस प्रकार यहाँ भी व्यवस्था है। तात्पर्य यह हुआ कि जहाँ पूर्व आदि शब्दों के प्रयोग होने पर 'कहाँ से ?', 'किस से ?', 'किन से ?' इत्यादि प्रकारेण जिज्ञासा हो वहाँ व्यवस्था समझनी चाहिये। ध्यान रहे कि व्यवस्था में पूर्वादि शब्द तीन प्रकार के होते हैं। (१) देश- वाची, यथा-काशी पूर्वा। (२) कालवाची, यथा-पूर्वे रावणादय । (३) दिशा- वाची, यथा-पूर्वस्या रविरुदेति । इन तीनों से अतिरिक्त पूर्वादि शब्द होंगे तो वहाँ व्यवस्था न होगा। यथा-अधरे राग (निचले होठ पर लाली है)। व्यवस्थायां किम् ? दक्षिणा गायकाः । दक्षिणा गायका (चतुर गायक)। यहाँ दक्षिणशब्द का अर्थ 'चतुर' है। इस से अवधि के नियम की आकाङ्क्षा नहीं होती। अतः यहाँ व्यवस्था न होने से इस की सर्वनामसञ्ज्ञा न होगी। सर्वनामसञ्ज्ञा न होने से पक्ष में जस शी (१५२) द्वारा शी आदेश न होगा। इसी प्रकार-'अय बाल उत्तरे प्रत्युत्तरे शक्त' (यह बालक जवाब सवाल में चतुर है) यहाँ 'उत्तर' शब्द का अर्थ 'जवाब' तथा 'प्रत्युत्तर' शब्द का अर्थ 'जवाब का जवाब' है। इन अर्थों से किसी प्रकार के अवधि के नियम की जिज्ञासा नहीं होती। अतः व्यवस्था में वर्तमान न होने के कारण इन की सर्वनामसञ्ज्ञा न होगी। इस से पक्ष में पूर्वादिभ्यो नवभ्यो वा (१५६) सूत्र प्रवृत्त न होगा। असञ्ज्ञायां किम् ? उत्तरा कुरव । व्यवस्था होने पर भी पूर्वादि शब्द किसी की सञ्ज्ञा नहीं होने चाहियें। यदि ये किसी की सञ्ज्ञा होंगे तो व्यवस्था में वर्त्तमान होने पर भी इन की सर्वनामसञ्ज्ञा न होगी। यथा-उत्तरा कुरव (उत्तरकुरुदेश)१। सुमेरुपर्वत को अवधि मान कर 'उत्तर कुरु' इस प्रकार देशव्यवस्था की गई है। अतः यहाँ 'उत्तर' शब्द व्यवस्था में वर्त्तमान है। परन्तु 'उत्तर कुरु' इस प्रकार कुरु देश की सञ्ज्ञा होने से उत्तरशब्द की सर्वनामसञ्ज्ञा न होगी। जहाँ पूर्व आदि शब्द किसी की सञ्ज्ञा न होंगे और व्यवस्था में वर्त्तमान होंगे वहाँ निम्नप्रकारेण प्रयोगसिद्धि होगी- १ कुरुशब्दो देशविशेषे बहुवचनान्त प्रयुज्यते । सम्प्रति रूस का यूक्रेनप्रदेश 'उत्तर- कुरु' देश है-ऐसा विचारकों का मत है। परन्तु अन्य लोग 'कुरुक्षेत्र' को ही 'उत्तरकुरु' देश मानते हैं।