भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २०३ स्वाभिधेयापेक्षावधिनियमो व्यवस्था। व्यवस्थायां किम् ? दक्षिणा गायकाः, कुशला इत्यर्थः ॥ अर्थः—(१) पूर्व, (२) पर, (३) अवर, (४) दक्षिण, (५) उत्तर, (६) अपर, (७) अधर—इन सात शब्दों की सञ्ज्ञाभिन्न व्यवस्था अर्थ में गण-सूत्र से जो सर्वनामसञ्ज्ञा सब जगह प्राप्त थी वह जस् परे होने पर विकल्प से हो। व्याख्या—पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि ।१।३। व्यवस्थायाम् ।७।१। असञ्ज्ञायाम् ।७।१। विभाषा ।१।१। जसि ।७।१। (विभाषा जसि से) । सर्वनामानि ।१।३। (सर्वादीनि सर्वनामानि से) । समासः—पूर्वञ्च परञ्च अवरञ्च दक्षिणञ्च उत्तरञ्च अपरञ्च अधरञ्च (यहां नपुंसकलिङ्ग 'शब्दस्वरूपम्' इस विशेष्य के कारण लगाया गया है) = पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि, इतरेतरद्वन्द्वः । न सञ्ज्ञा = असञ्ज्ञा, तस्याम् = असञ्ज्ञायाम्, नञ्तत्पुरुषः । अर्थः—(असञ्ज्ञायाम्) सञ्ज्ञाभिन्न (व्यवस्थायाम्) व्यवस्था अर्थ हो तो (पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि) पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर ये सात शब्द (जसि) जस् परे होने पर (विभाषा) विकल्प कर के (सर्वनामानि) सर्वनामसञ्ज्ञक हों। सञ्ज्ञाभिन्न व्यवस्था अर्थ में पूर्वादि सातों शब्दों की पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापरा- धराणि व्यवस्थायामसञ्ज्ञायाम् इस गण सूत्र से (यह गणसूत्र सर्वादिगण में पीछे आ चुका है) सर्वनामसञ्ज्ञा की जा चुकी है। अब वही सर्वत्र प्राप्ता सर्वनामसञ्ज्ञा जस् में विकल्प कर के की जाती है। प्रश्न—यह सूत्र एक बार सर्वादिगण में पढ़ा जा चुका है; पुनः यहां सूत्रपाठ में इसे अविकल पढ़ने की आवश्यकता नही। केवल जस् में विकल्प करने के लिए 'पूर्व- परावरदक्षिणोत्तरापराधराणि' इतना ही पर्याप्त है। 'व्यवस्थायामसञ्ज्ञायाम्' इस अंश के ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? उत्तर—वैसा करने से गणसूत्र से तो इन की सञ्ज्ञाभिन्न व्यवस्था में ही सर्व- नामसञ्ज्ञा होगी और यहां सञ्ज्ञा होने तथा व्यवस्था न होने पर भी सर्वनामसञ्ज्ञा हो जायेगी। अतः यहां भी 'व्यवस्थायामसञ्ज्ञायाम्' कहना आवश्यक है। अब हमें यह जानना है कि 'व्यवस्था' क्या है। व्यवस्था का लक्षण है— स्वाभिधेयापेक्षावधिनियमो व्यवस्था। अपेक्ष्यत इत्यपेक्षः, कर्मणि घञ्। स्वस्य (पूर्वादिशब्दस्य) अभिधेयेन (वाच्येन) अपेक्ष्यस्य (अपेक्ष्यमाणस्य) अवधेर्नियमो व्यवस्था। अर्थः—जहां पूर्व आदि शब्दों के अपने अर्थों से अवधि के नियम की अपेक्षा हो वहां व्यवस्था समझनी चाहिये। उदाहरण यथा— काशी पूर्वा। कुतः ? प्रयागात्। यहां 'पूर्वा' शब्द का अर्थ पूर्वदिशास्थित काशी देश है। इस अर्थ से अवधि के नियम की आकाङ्क्षा होती है। अर्थात् 'काशी पूर्व है' यह कहने पर जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि किस से पूर्व है ? इस पर उत्तर मिलता है कि 'प्रयाग से'। तो यहां पूर्वाशब्द का अर्थ क्योंकि अवधि के नियम (प्रया- गात्) की अपेक्षा = आकाङ्क्षा करता है; अतः यहां व्यवस्था है।