लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १६६ अर्थः—'उभय' शब्द का द्विवचन नहीं होता। डतर और डतम प्रत्यय हैं। 'प्रत्यय के ग्रहण में तदन्त का ग्रहण हो' इस परिभाषा से तदन्त अर्थात् डतरान्त और डतमान्त शब्दों का ही ग्रहण करना चाहिये। नेम शब्द अर्ध (आधा) अर्थ में सर्वादि- गण में समझना चाहिये। सर्वपर्याय अर्थात् 'सर्व' अर्थ के वाचक 'सम' शब्द का सर्वा- दियों में पाठ है, तुल्यपर्याय—समान अर्थ के वाचक का नही। इसमें ज्ञापक पाणिनि का यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम् (२३) सूत्र है। व्याख्या—सर्वादिगण में 'उभ' शब्द के वाद 'उभय' शब्द आता है। यह शब्द उभशब्द से 'अयच्' प्रत्यय करने पर सिद्ध होता है। वार्त्तिककार कात्यायन के अनु- सार इस का द्विवचन-प्रत्ययों में प्रयोग नहीं किया जाता। इस का अर्थ है—दो अवयवों वाला। यथा—उभयो मणिः (दो हिस्सों वाली मणि), उभये मणयः (दो हिस्सों वाली मणियां)। इस की रूपमाला यथा— एकवचन द्विवचन बहुवचन | एकवचन द्विवचन बहुवचन प्र० उभयः ० उभये | प० उभयस्मात् ० उभयेभ्यः द्वि० उभयम् ० उभयान् | प० उभयस्य ० उभयेषाम् तृ० उभयेन ० उभयैः | स० उभयस्मिन् ० उभयेषु च० उभयस्मै ० उभयेभ्यः | सं० हे उभय ! ० हे उभये ! सर्वादि-गण में उभयशब्द के वाद, 'डतर, डतम' का नम्बर आता है। ये दोनों प्रत्यय हैं। इन के विधायक तीन तद्धितसूत्र हैं। १. कियत्तदोर्निर्धारणे द्वयोरेकस्य डतरच् (१२३२), २. वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने डतमच् (१२३३), ३. एकाच्च प्राचाम् (५.३.६४)। किम्, यद्, तद् और एक इन चार सर्वनामों से परे डतर और डतम प्रत्यय हो कर आठ शब्द बनते हैं—(१) कतर, (२) कतम, (३) यतर, (४) यतम, (५) ततर (६) ततम, (७) एकतर, (८) एकतम। सर्वादिगण में 'डतर, डतम' के पाठ से इन आठ शब्दों का ही ग्रहण होता है। क्योंकि कहा है कि '—न केवला प्रकृतिः प्रयोक्तव्या, न केवलः प्रत्ययः अर्थात् न केवल प्रकृति का प्रयोग करना चाहिये और न केवल प्रत्यय का—इस सिद्धान्त के अनुसार केवल डतर डतम का कहीं प्रयोग नहीं हो सकता। किञ्च—प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् (प्रत्यय का ग्रहण होने पर तदन्त अर्थात् वह प्रत्यय जिस के अन्त में है उस के सहित उस प्रत्यय का ग्रहण करना चाहिये) इस नियम से डतरप्रत्ययान्त और डतमप्रत्ययान्त उपर्युक्त आठ शब्दों का ही सर्वनामसञ्ज्ञा में ग्रहण है। प्रश्न—आचार्य पाणिनि को यदि यह प्रत्ययग्रहण-परिभाषा अभीष्ट होती तो वे सुप्तिङन्तं पदम् (१४) सूत्र के स्थान पर 'सुप्तिङ् पदम्' ऐसा छोटा सूत्र रचते; क्योंकि सुँप् और तिङ् के प्रत्यय होने से सुबन्त और तिङन्त का सुतरां ग्रहण हो जाता ? उत्तर—सुप्तिङन्तं पदम् (१४) सूत्र में मुनि के 'अन्त' ग्रहण का प्रयोजन यह जतलाना है कि—सञ्ज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणं नास्ति अर्थात् जहां प्रत्यय की सञ्ज्ञा की जा रही हो वहां प्रत्ययग्रहण-परिभाषा प्रवृत्त नहीं होती।