लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 213, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ें१६८ भैम्याव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् प्र० विश्व विश्वौ विश्वे । प० विश्वस्मात् विश्वाभ्याम् विश्वेभ्य द्वि० विश्वम् ,, विश्वान् । प० विश्वस्य विश्वयो विश्वेषाम् तृ० विश्वेन विश्वाभ्याम् विश्वै । स० विश्वस्मिन् ,, विश्वेषु च० विश्वस्मै ,, विश्वेभ्य । स० हे विश्व ! हे विश्वौ ! हे विश्वे ! [लघु०] उभशब्दो नित्य द्विवचनान्त । उभौ २ । उभाभ्याम् ३ । उभयोः । उभयो । तस्येह पाठोऽकजर्थ ॥ व्याख्या—सर्वादिगण म विश्व शब्द के बाद 'उभ' शब्द आता है । इस का अर्थ है 'दोना' (Both) । अत यह सदा द्विवचनान्त ही प्रयुक्त होता है । एकवचन ओर बहुवचन प्रत्यया म असम्भव होन स इस का प्रयोग नही होता । इस की प्रक्रिया रामशब्दवत् समझनी चाहिये । सम्पूर्ण रूपमाला यथा— एकवचन द्विवचन बहुवचन | एकवचन द्विवचन बहुवचन प्र० ० उभौ ० | प० ० उभाभ्याम् ० द्वि० ० ,, ० | प० ० उभयो ० तृ० ० उभाभ्याम् ० | स० ० ,, ० च० ० ,, ० | स० ० हे उभौ ! ० अब यहा यह शङ्का उत्पन्न होती है कि उभशब्द मे सर्वनामसञ्ज्ञा का कोई कार्य नही किया गया, क्योकि सर्वनामसञ्ज्ञा के सब कार्य या तो बहुवचन मे होते हैं या एकवचन म । यथा जस शी (१५२), आमि सर्वनाम्नः सुँट् (१५५) ये बहुवचन मे होते हैं, सर्वनाम्न स्मै (१५३), ङसिङ्यो स्मात्स्मिनो (१५४) ये एकवचन मे होते है । द्विवचन मे कोई कार्य नही देखा जाता । तो पुन किम लिये 'उभ' शब्द को सर्वादिगण मे डाल कर उस की सर्वनामसञ्ज्ञा करने का प्रयत्न किया गया है ? इम शङ्का को मन म रख कर ग्रन्थकार उत्तर देते हैं कि— तस्येह पाठोऽकजर्थ । अर्थात् इस उभशब्द का सर्वादिगण मे पाठ कर इस की सर्वनामसञ्ज्ञा करने का प्रयोजन 'अकच्' प्रत्यय का विधान करना है। तात्पर्य यह है कि सर्वशब्द पर कहे गये जस शी (१५२) आदि कार्य ही केवल सर्वनामकार्य नही, किन्तु सर्वनामकार्य तो और भी हैं। यदि उभशब्द पर शी आदि कोई कार्य नही होता तो भले ही न हो, इस की सर्वनामाराञ्ज्ञा तो अन्य कार्य के लिये ही की गई है । तथाहि—अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक्टे (१२१६) अर्थात् अव्यय तथा सर्वनाम की टि से पूर्व अकच् प्रत्यय हो । उभशब्द की सर्वनामसञ्ज्ञा होने से उस की टि से पूर्व अकच् प्रत्यय हो कर—उम् अकच् अ+औ = 'उभकौ' रूप हो जाता है। यदि इस की सर्व- नामसञ्ज्ञा न होती तो अकच् न हो सकता । विशेष सिद्धान्त-कौमुदी मे देखें । [लघु०] उभयशब्दस्य द्विवचन नास्ति । डतर-डतमौ प्रत्ययौ । 'प्रत्यय-ग्रहणे तदन्तग्रहणम्' इति तदन्ता ग्राह्या । नेम इत्यर्धे । समः सर्वपर्याय । तुल्य- पर्यायस्तु न । 'यथासङ्ख्यमनुदेशः समानाम्' (२३) इति ज्ञापकात् ॥