लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १६७ उत्तर—यदि आप वाला अर्थ करते तो 'येषाम्, तेषाम्' यदि प्रयोग सिद्ध न हो सकते । तथाहि—यद् और तद् सर्वनाम से आम् प्रत्यय कर त्यदादीनामः (१६३) से दकार को अकार और अतो गुणे (२७४) मे पररूप करने पर 'त + आम्, य + आम्' हुआ । अब यहां आप का अर्थ मानने से सुँट् प्राप्त नही हो सकता । क्योंकि यहां अवर्णान्त सर्वनाम से परे आम् वर्त्तमान नही । जो अवर्णान्त है वह सर्वनाम नही और जो सर्वनाम है वह अवर्णान्त नहीं । सर्वनामसञ्ज्ञा 'यद्, तद्' आदि दकारान्तों की ही की गई है । परन्तु—हमारे उपर्युक्त अर्थ से कोई दोष नहीं आता । यथा— यहां अवर्णान्त अङ्ग 'य, त' हैं, इन से परे यद्, तद् सर्वनाम से विहित आम् विद्यमान है; अतः इसे सुँट् का आगम हो जायेगा । यह अर्थ जसः शी (१५२), सर्वनाम्नः स्मै (१५३) आदि सूत्रों में भी समझ लेना चाहिये; अन्यथा 'ये, यस्मै, यस्मात्' आदि में शी आदि सर्वनामकार्य न हो सकेंगे । 'सर्व + आम्' यहां अवर्णान्त अङ्ग है 'सर्व' । इस से परे, सर्वनाम (सर्व) से विहित 'आम्' विद्यमान है । अतः इसे सुँट् का आगम हो—सर्व + सुँट् आम् । सुँट् में टकार इत् है और उकार उच्चारणार्थ है; अतः स् अवशिष्ट रहता है—सर्व + साम् । सुँट् का आगम आम् को कहा गया है । जिमे आगम होता है वह उस का अवयव माना जाता है । उस के ग्रहण से उस का भी ग्रहण हो जाता है । जैसा कि कहा भी है—यदागमास्तद्गुणीभूतास्तद्ग्रहणेन गृह्यन्ते । अतः 'साम्' आम् से भिन्न नहीं । इस से 'साम्' झलादि बहुवचन ठहरता है; इस के परे होने से बहुवचने झल्येत् (१४५) द्वारा अकार को एकार तथा आदेशप्रत्यययोः (१५०) से साम् प्रत्यय के अवयव सकार को मूर्धन्य षकार करने से 'सर्वेषाम्' प्रयोग सिद्ध होता है । सप्तमी के एकवचन में 'सर्व + ङि' हुआ । यहां ङसिँङ्योः स्मात्स्मिनौ (१५४) से 'ङि' को स्मिन् आदेश हो कर 'सर्वस्मिन्' प्रयोग सिद्ध होता है । सर्वशब्द की रूप- माला यथा— प्र० सर्वः सर्वौ सर्वे | प० सर्वस्मात् सर्वाभ्याम् सर्वेभ्यः द्वि० सर्वम् ,, सर्वान् | ष० सर्वस्य सर्वयोः सर्वेषाम् तृ० सर्वेण सर्वाभ्याम् सर्वैः | स० सर्वस्मिन् ,, सर्वेषु च० सर्वस्मै ,, सर्वेभ्यः | सं० हे सर्व ! हे सर्वौ ! हे सर्वे ! [लघु०] एवं विश्वादयोऽप्यदन्ताः ॥ व्याख्या—अब अन्य अदन्त पुंल्लिङ्ग सर्वनामों के विषय में कहते हैं कि— विश्व आदि अदन्त (सर्वनाम) भी इसी तरह होते हैं । 'विश्व' शब्द का अर्थ 'सम्पूर्ण' है । सर्वादिगण में पाठ होने से सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) द्वारा सर्वनामसञ्ज्ञा हो कर शी, स्मै आदि सर्वनामकार्य हो जाएंगे । शेष रामवत् प्रक्रिया होगी । सम्पूर्ण रूपमाला यथा—