लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Page Header: १६६ | भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्]
व्याख्या—अतः ५।१। (अतो भिस ऐस् से) । सर्वनाम्नः ५।१। (सर्वनाम्नः स्मै से) । ङसिँङ्योः ६।२। स्मात्स्मिनौ १।२। 'सर्वनाम्नः' के विशेषण होने से 'अतः' से तदन्तविधि होगी । अर्थ—(अतः) अदन्त (सर्वनाम्नः) सर्वनाम से परे (ङसिँ- ङ्योः) ङसिँ और ङि के स्थान पर (स्मात्स्मिनौ) स्मात् और स्मिन् आदेश होते हैं । यथासंख्यपरिभाषा से ङसिँ को स्मात् और ङि को स्मिन् होगा । ध्यान रहे कि स्मात् और स्मिन् के अन्त्य तकार और नकार की हलन्त्यम् (१) द्वारा इत्-सञ्ज्ञा न होगी, न विभक्तौ तुस्माः (१३१) से निषेध हो जायेगा । 'सर्व + ङसिँ' यहां अदन्त-सर्वनाम 'सर्व' से परे ङसिँ मौजूद है । अतः प्रकृत- सूत्र से ङसिँ के स्थान पर स्मात् सर्वादेश होकर 'सर्वस्मात्' प्रयोग सिद्ध होता है । षष्ठी के एकवचन और द्विवचन में रामशब्दवत्—सर्वस्य, सर्वयोः । षष्ठी के बहुवचन में—सर्व + आम् । अत्र सर्वनाम-सञ्ज्ञा कर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१५५) आमि सर्वनाम्नः सुँट् ।७।१।५२॥ अवर्णान्तात् परस्य सर्वनाम्नो विहितस्यामः सुँडागमः । एत्वषत्वे— सर्वेषाम् । सर्वस्मिन् । शेषं रामवत् ॥ अर्थ—अवर्णांन्त (अङ्ग) से परे सर्वनाम से विहित आम् प्रत्यय को सुँट् का आगम हो । व्याख्या—आत् ५।१। (आज्जसेरसुक् से) । अङ्गात् ५।१। (अङ्गस्य इस अधिकृत का पञ्चमी में विपरिणाम हो जाता है) । सर्वनाम्नः ५।१। आमि ७।१। सुँट् १।१। 'आत्' पद 'अङ्गात्' पद का विशेषण है, अतः येन विधिस्तदन्तस्य द्वारा तदन्तविधि हो कर—'अवर्णांन्ताद् अङ्गात्' बनेगा । अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि सुँट् किस का अवयव हो ? यह तो ज्ञात है कि आद्यन्तौ टकितौ (८५) द्वारा यह आद्यवयव होता है, परन्तु किस का आद्यवयव हो ? यह यहां ज्ञातव्य है । 'अङ्गात्' में पञ्चमी का निर्देश किया गया है, अतः तस्मादित्युत्तरस्य (७१) के अनुसार सुँट् अङ्ग से परे आम् का अवयव होना चाहिये । परन्तु 'आमि' में सप्तमी का निर्देश किया गया है अतः तस्मिन्निति० (१६) के अनुसार सुँट् आम् से पूर्व अङ्ग का अव- यव होना चाहिये । तो अब सुँट् किस का अवयव हो ? ऐसी शङ्का होने पर उभय- निर्देशे पञ्चमीनिर्देशो बलीयान् के अनुसार पञ्चमी निर्देश के बलवान् होने से सुँट्, अङ्ग से परे=आम् का ही अवयव ठहरता है । तो इस प्रकार 'आमि' पद को 'आमः' बना कर सम्बन्ध में षष्ठी स्वीकार करेंगे । यहां स्पष्ट 'आमः' न कह कर 'आमि' कहने का प्रयोजन आगे ह्रस्वनद्य० (१६२) आदि सूत्रों में उस का अनुवर्त्तन करना ही है । अर्थ—(आतः) अवर्णान्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (सर्वनाम्नः) सर्वनाम से विहित (आमः) आम् का अवयव (सुँट्) सुँट् हो जाता है । प्रश्न—आप ने अवर्णान्त सर्वनाम से परे आम् को सुँट् का आगम हो ऐसा सरल अर्थ न कर यह अपूर्व अर्थ क्या किया है ?