भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 210

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् १९५ लशक्वतद्धिते (१३६) द्वारा उसके शकार की इत् सञ्ज्ञा भी नहीं होगी; क्योंकि उस सूत्र से प्रत्यय के ही आदि शकार की इत् सञ्ज्ञा की जाती है। अतः आदेश करते समय शिद्भाव के कारण शी सर्वादेश नहीं होता, किन्तु अनेकाल् (श् + ई) होने से अनेकालशित् सर्वस्य (४५) द्वारा सर्वादेश हो जाता है। आदेशकरणात्पूर्वं यतः शीति न प्रत्ययः। तस्मात्तस्य शकारस्तु लशक्वेति न ही-ड्भवेत् ॥ १॥ सर्वादेशो न शिद्भावात् ततो भवितुमर्हति । अनेकाल्त्वाद् भवेदेव विज्ञैरेतदुदीरितम् ॥ २॥ 'सर्व + जस्' यहां प्रकृतसूत्र से जस् के स्थान पर शी आदेश हो स्थानिवद्भाव के कारण शी में प्रत्ययत्व लाने से लशक्वतद्धिते (१३६) द्वारा शकार की इत्सञ्ज्ञा हो जाती है; तब शकार का लोप करने पर 'सर्व + ई' इस स्थिति में आद् गुणः (२७) से गुण एकादेश हो कर 'सर्वे' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि यहां यद्यपि ह्रस्व 'शि' आदेश करने से भी आद् गुणः (२७) द्वारा गुण एकादेश हो कर 'सर्वे' प्रयोग सिद्ध हो सकता है; तथापि अग्रिम नपुंसकाच्च (२३५) आदि सूत्रों में अनुवृत्ति के लिये उसे दीर्घ रखा गया है। अन्यथा—'वारिणी, मधुनी' आदि दीर्घघटित प्रयोग न बन सकते (देखो २४५ सूत्र)। द्वितीया और तृतीया विभक्ति में रामशब्दवत् रूप बनते हैं। द्वितीया—सर्वम्, सर्वौ, सर्वान् । तृतीया—सर्वेण, सर्वाभ्याम्, सर्वैः । चतुर्थी के एकवचन में 'सर्व + ङे' इस अवस्था में (१५१) सूत्र से सर्वनामसञ्ज्ञा हो कर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् — (१५३) सर्वनाम्नः स्मै ।७।१।१४॥ अतः सर्वनाम्नो 'ङे' इत्यस्य स्मैः स्यात् । सर्वस्मै ॥ अर्थः— अदन्त सर्वनाम से परे 'ङे' के स्थान पर 'स्मै' आदेश हो। व्याख्या— अतः ।५।१। (अतो भिस ऐस् से) । सर्वनाम्नः ।५।१। ङेः ।६।१। (ङेर्यः से) । स्मै ।१।१। (विभक्तिलोप आर्षः) । 'अतः' यह 'सर्वनाम्नः' का विशेषण है; इस लिये इस से तदन्तविधि हो जाती है। अर्थः— (अतः) अदन्त (सर्वनाम्नः) सर्वनाम से परे (ङेः) ङे के स्थान पर (स्मै) स्मै आदेश होता है। यह सूत्र ङेर्यः (१४३) सूत्र का अपवाद है। 'सर्व + ङे' यहां अदन्त सर्वनाम 'सर्व' है। इस से परे 'ङे' वर्तमान है। अतः प्रकृत-सूत्र से ङे के स्थान पर स्मै आदेश हो कर 'सर्वस्मै' प्रयोग सिद्ध होता है। चतुर्थी के द्विवचन और बहुवचन में क्रमशः 'सर्वाभ्याम्, सर्वेभ्यः' सिद्ध होते हैं। पञ्चमी के एकवचन में 'ङसिँ' प्रत्यय आ कर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम् — (१५४) ङसिँङ्योः स्मात्स्मिनौ ।७।१।१५॥ अतः सर्वनाम्नो ङसिँङ्योरेतौ स्तः। सर्वस्मात् ॥ अर्थः—अदन्त सर्वनाम से परे ङसिँ और ङि के स्थान पर क्रमशः स्मात् और स्मिन् आदेश होते हैं।