लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् पूर्वापरावरपरा उत्तरो दक्षिणाधरौ । अन्तर चोपसंव्याने बहिर्योगे तथाऽपुरि ॥ ३ ॥ इन सब का विवेचन आगे यथास्थान मूल तथा व्याख्या मे किया जायेगा । सर्वनाम सञ्ज्ञा अन्वर्थ अर्थात् अर्थानुसारी है—सर्वेषां नामानि सर्वनामानि । इस गण मे पढ़े हुए शब्द यदि सभी' के वाचक होंगे तो तभी इन की सर्वनामसञ्ज्ञा होगी, अन्यथा नही । अत एव यदि किसी व्यक्तिविशेष का नाम 'सर्व' होगा तो वहा सर्वनामसञ्ज्ञा न होगी । इसी प्रकार सर्वम् अतिक्रान्त = अतिसर्वं, तस्मै = अतिसर्वाय' इत्यादि स्थानो पर गौण होने पर भी सर्वनामता न होगी । 'सर्वनाम' यह महासञ्ज्ञा करना इस मे प्रमाण है, अन्यथा घु टि भ के समान कोई छोटी सञ्ज्ञा भी कर सकते थे । इस विषय का विस्तार सिद्धान्त कौमुदी मे देखना चाहिये । सर्वादिगण के अजन्त शब्दा का प्राय जस्, ङे, ङसिं, आम् और ङि' इन पञ्च विभक्तिया मे रामशब्द की अपेक्षा अन्तर होता है। शेष विभक्तियो मे रामशब्दवत् रूप बनते हैं । अत इन पञ्च विभक्तिया मे ही रूप सिद्ध किये जायेंगे । सर्वशब्द का अर्थ 'सब' अर्थात् समूचा समुदाय है । समुदाय दो प्रकार का होता है—(१) उद्भूतावयव (२) अनुद्भूतावयव । जहा वक्ता की केवल समुदाय कहने की इच्छा होती है वहा अनुद्भूतावयव समुदाय होता है । जहा वक्ता का अभिप्राय समुदाय कहने के साथ २ तदन्तर्गत व्यक्तियो से भी हुआ करता है वहा उद्भूतावयव समुदाय होता है । अत अनुद्भूतावयवसमुदाय की विवक्षा मे एकवचन और उद्भूता- वयव की विवक्षा मे द्विवचन और बहुवचन होगा । सर्वशब्द के प्रथमा के एकवचन और द्विवचन मे रामशब्दवत् 'सर्व', सर्वो' प्रयोग बनते हैं । प्रथमा के बहुवचन मे 'जस्' प्रत्यय आ कर—सर्व + जस् । अथ सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) से 'सर्व' की सर्वनामसञ्ज्ञा हो कर अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१५२) जसः शी ।७।१।१७॥ अदन्तात् सर्वनाम्नो जस शी स्यात् । अनेकाल्त्वात् सर्वादेश —सर्वे ॥ अर्थ—अदन्त सर्वनाम मे परे जस के स्थान पर शी आदेश हो । व्याख्या—अत १५।१। (अतो भिस ऐस् से) । सर्वनाम्न १५।१। (सर्वनाम्नः स्मै मे) । जस ६।१।१। शी १।१।१। 'सर्वनाम्न' का विशेषण होने से 'अत' से तदन्तविधि होती है। अर्थ —(अत ) अदन्त (सर्वनाम्न ) सर्वनाम से परे (जस ) जस् के स्थान पर (शी) शी आदेश होता है। प्रत्यय (१२०) के अधिकार मे न पढे जाने से शी की प्रत्ययसञ्ज्ञा नहीं है । परन्तु ह्वा' जब वह जस् के स्थान पर हो चुकता है तब स्थानिवद्भाव (१४४) से उस की प्रत्ययसञ्ज्ञा हो जाती है। तात्पर्य यह है कि जब तक जस् के स्थान पर शी आदेश नही होता तब तक वह प्रत्ययसञ्ज्ञक नही होता । प्रत्ययसञ्ज्ञक न होने से