भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 633 में से

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पृष्ठ 215

२०० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् प्रश्न—यदि ऐसा है तो यहां डतर और डतम प्रत्ययों की सर्वनामसञ्ज्ञा करने पर वह परिभाषा क्यों प्रवृत्त हो रही है ? यहां भी उसे प्रवृत्त नहीं होना चाहिये । उत्तर—यह बात सत्य है । परन्तु यहां केवल उन प्रत्ययों की सञ्ज्ञा करने का कुछ भी प्रयोजन न होने से उपर्युक्त प्रत्ययग्रहण परिभाषा की प्रवृत्ति स्वीकार कर ली जाती है । क्योंकि जब इस लोक में मन्दबुद्धि पुरुष भी प्रयोजन के बिना किसी कार्य में प्रवृत्त नहीं होता तो क्या महाबुद्धिमान् आचार्य पाणिनि व्यर्थ के लिये इन की सर्वनाम- सञ्ज्ञा करेंगे ? कदापि नहीं । कतर आदि शब्दों की रूपमाला पुँल्लिङ्ग में 'सर्व' शब्द की तरह होती है । कतर (दो में कौन) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० कतर कतरौ कतरे । प० कतरस्मात् कतराभ्याम् कतरेभ्य द्वि० कतरम् ,, कतरान् । ष० कतरस्य कतरयो कतरेषाम् तृ० कतरेण कतराभ्याम् कतरै । स० कतरस्मिन् ,, कतरेषु च० कतरस्मै ,, कतरेभ्य । स० हे कतर ! हे कतरौ ! हे कतरे ! इसी प्रकार—कतम (बहुतों में कौन), यतर (दो में जो), यतम (बहुतों में जो), ततर (दो में वह), ततम (बहुतों में वह), एकतर (दो में एक), एकतम (बहुतों में एक) शब्द भी समझने चाहियें । डतर, डतम के अनन्तर सर्वादिगण में 'अन्य' (दूसरा) शब्द आता है । इस की रूपमाला सर्वशब्दवत् होती है यथा— प्र० अन्य अन्यौ अन्ये । प० अन्यस्मात् अन्याभ्याम् अन्येभ्य द्वि० अन्यम् ,, अन्यान् । ष० अन्यस्य अन्ययो अन्येषाम् तृ० अन्येन अन्याभ्याम् अन्यै । स० अन्यस्मिन् ,, अन्येषु च० अन्यस्मै ,, अन्येभ्य । स० हे अन्य ! हे अन्यौ ! हे अन्ये ! अन्यशब्द के बाद 'अन्यतर' शब्द आता है । इस का अर्थ है—दोनों में से एक । इसे डतरप्रत्ययान्त नहीं समझना चाहिये । इसी प्रकार का एक 'अन्यतम' शब्द भी लोक में देखा जाता है । इस का अर्थ है—बहुतों में से एक । इसे भी डतमप्रत्ययान्त नहीं समझना चाहिये । ये दोनों शब्द अव्युत्पन्न हैं । इन में से प्रथम 'अन्यतर' शब्द का सर्वादिगण में पाठ है अतः इस की सर्वनामसञ्ज्ञा हो जाती है । दूसरे 'अन्यतम' शब्द का गण में पाठ नहीं अतः इस की सर्वनामसञ्ज्ञा न होगी, रामशब्दवत् उच्चारण होगा । 'अन्यतर' शब्द की रूपमाला सर्वशब्दवत् होती है । यथा— प्र० अन्यतर, अन्यतरौ, अन्यतरे । द्वि० अन्यतरम्, अन्यतरौ, अन्यतरान् । तृ० अन्यतरेण, अन्यतराभ्याम्, अन्यतरै । च० अन्यतरस्मै, अन्यतराभ्याम्, अन्य- तरेभ्य । प० अन्यतरस्मात्, अन्यतराभ्याम्, अन्यतरेभ्य । ष० अन्यतरस्य, अन्यतरयो, अन्यतरेषाम् । स० अन्यतरस्मिन्, अन्यतरयो, अन्यतरेषु । स० हे अन्यतर !, हे अन्य- तरौ !, हे अन्यतरे ! ।